1 राजाओं 22
प्राथमिक आयु (6 से 12 वर्ष) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी
व्याख्या
राजा अहाब को रामोत गिलाद शहर चाहिए था। यहूदा के राजा यहोशापात उनके साथ युद्ध में जाने को तैयार थे, पर उन्होंने पहले एक जरूरी बात कही, "आज यहोवा की इच्छा मालूम कर ले।" यह बहुत अच्छी बात थी। समस्या यह हुई कि अहाब ने चार सौ भविष्यद्वक्ताओं को बुलाया, और उन सभी ने वही कहा जो राजा सुनना चाहता था, "चढ़ाई कर, तू जीतेगा।"
यहोशापात को कुछ खटका। उन्होंने पूछा, क्या यहोवा का कोई और नबी नहीं है? अहाब ने झिझकते हुए कहा कि एक है, मीकायाह, पर मैं उससे घृणा करता हूं क्योंकि वह हमेशा बुरी बात ही कहता है। सोचिए, अहाब नबी से इसलिए नाराज था क्योंकि वह सच बोलता था।
जब मीकायाह को बुलाया गया, तो रास्ते में दूत ने उसे समझाया कि बाकी सब शुभ वचन ही कह रहे हैं, तू भी वैसा ही कह। पर मीकायाह ने साफ कहा, "जो कुछ यहोवा मुझसे कहे, वही मैं कहूंगा।" पहले उसने मजाक में वही बात दोहराई जो सब कह रहे थे, पर राजा ने उसे सच बोलने को कहा। तब मीकायाह ने एक गहरा दर्शन सुनाया, उसने देखा कि इस्राएल बिना चरवाहे की भेड़ों की तरह बिखरा हुआ है, राजा युद्ध में मारा जाएगा। उसने यह भी बताया कि यहोवा ने झूठ बोलने वाली एक आत्मा को उन चार सौ नबियों के मुंह में भेजा है, ताकि अहाब बहक जाए।
अहाब ने मीकायाह की बात नहीं मानी। उसने उसे बंदीगृह में डलवा दिया और खुद युद्ध में भेष बदलकर गया, ताकि कोई उसे पहचान न सके। पर एक तीर, जो किसी सैनिक ने बिना निशाना लगाए चलाया था, उसके कवच के जोड़ में जा लगा। शाम को अहाब मर गया।
इसका क्या अर्थ है?
यह कहानी हमें दिखाती है कि सच सुनना और सच बोलना कितना कठिन हो सकता है। अहाब के पास चार सौ नबी थे, पर वे सब उसे वही बता रहे थे जो वह सुनना चाहता था। सच बोलने वाला सिर्फ एक था, और उसे नफरत मिली। क्या आपने कभी देखा है कि लोग सच की जगह वह सुनना पसंद करते हैं जो उन्हें अच्छा लगे? यह आज भी होता है।
सबसे अनोखी बात यह है कि मीकायाह ने यहोवा के दरबार का एक दृश्य देखा, जहां यहोवा खुद पूछते हैं कि अहाब को कौन बहकाएगा। यह अंश कठिन है, और ईमानदारी से कहें तो इसे पूरी तरह समझना आसान नहीं है। पर इतना साफ है कि परमेश्वर अहाब के झूठ और हठ से अनजान नहीं थे। अहाब ने बार बार परमेश्वर की बात को नजरअंदाज करने का चुनाव किया था, और अंत में वही हुआ जो मीकायाह ने कहा था।
बड़ी कहानी से जोड़
पूरी बाइबल में परमेश्वर अपने लोगों से सच बोलने वाले लोग भेजते रहे हैं, भले ही राजा और लोग सुनना न चाहें। यीशु मसीह भी ऐसे ही आए, उन्होंने भी हमेशा सच कहा, चाहे लोगों को अच्छा लगे या बुरा। उन्होंने कभी वह नहीं कहा जो लोग सुनना चाहते थे, बल्कि वही कहा जो पिता परमेश्वर ने उन्हें दिया। और जैसे मीकायाह को उसके सच के कारण सताया गया, वैसे ही यीशु को भी सताया गया, क्रूस पर चढ़ाया गया, क्योंकि उन्होंने सच बोलना नहीं छोड़ा।
आपके लिए
कभी कभी आपके आसपास भी ऐसे लोग होंगे जो वही कहेंगे जो आप सुनना चाहते हैं, चाहे वह सही हो या नहीं। और शायद कभी आपको खुद भी सच बोलना पड़े, भले ही वह किसी को पसंद न आए। यह आसान नहीं है। पर परमेश्वर चाहते हैं कि हम सच से प्यार करें, भले ही वह सुनने में कठिन लगे। अगली बार जब कोई आपको सिर्फ वही बताए जो आप सुनना चाहते हैं, याद रखिए कि सच्चा दोस्त वह है जो आपसे सच कह सके।
बात करें
अहाब ने मीकायाह से नफरत की क्योंकि वह सच बोलता था। क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कि किसी ने आपको सच बताया और आपको बुरा लगा?
यह कहानी कुछ बातें खुली छोड़ देती है, जैसे यहोवा के दरबार का दृश्य। आपको क्या लगता है, परमेश्वर से ऐसे सवाल पूछना ठीक है जिनका जवाब हमें तुरंत नहीं मिलता?
संग प्रार्थना
हे प्रभु, हमें सच से प्यार करना सिखाइए, भले ही वह सुनने में कठिन लगे। हमें ऐसा साहस दीजिए कि हम सच बोल सकें, और ऐसा दिल दीजिए जो सच को सुन भी सके। धन्यवाद कि यीशु मसीह ने हमेशा सच बोला, हमारे लिए। आमीन।
1 राजाओं 22 के बारे में प्रश्न
पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।
1 राजाओं 22 किस विषय में है?
1 राजाओं 22 क्या कहता है?
1 राजाओं 22 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
बच्चे 1 राजाओं 22 से क्या सीख सकते हैं?
1 राजाओं 22 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
दूसरों ने क्या पाया
यहोशापात अच्छा राजा था, फिर भी एक पंक्ति रह जाती है: "और यहोशापात ने इस्राएल के राजा से मेल किया।" आहाब से मेल, जिसने उसे झूठे भविष्यद्वक्ताओं के बीच खड़ा किया और युद्ध में लगभग मार डाला। हर मेल परमेश्वर की ओर से नहीं होता। किससे तुमने शांति बनाई है, यह सोचकर कि इससे जीवन आसान हो जाएगा?
यहोशापात ने तर्शीश जाने के लिये जहाज़ बनवाए, परन्तु वे एस्योनगेबेर में टूट गए।" जहाज़ बन गए थे, समुद्र सामने था, पर यात्रा शुरू ही न हुई। इतिहास बताता है कि यह साझेदारी गलत हाथों से हुई थी। कभी परमेश्वर तेरी योजना तोड़ता है इसलिए नहीं कि वह तुझसे नाराज़ है, बल्कि इसलिए कि वह तुझे उस संगति में दूर जाने नहीं देना चाहता। टूटा जहाज़ भी दया हो सकता है।
तीन साल की खामोशी के बाद एक छोटा सा कदम, "तीसरे वर्ष यहूदा का राजा यहोशापात इस्राएल के राजा के पास गया।" बस एक मुलाकात, बस एक दावत। पर यहीं से वह गठबंधन शुरू हुआ जो उसे युद्ध के मैदान में मौत के मुँह तक ले गया। जिनके साथ तू बैठता है, वे धीरे धीरे तय करने लगते हैं कि तू कहाँ खड़ा होगा। आज तेरी मेज़ पर कौन बैठा है?
आहाब भेस बदलता है, पर यहोशाफ़ात से कहता है, "तू अपने ही वस्त्र पहने रह।" अपनी जान बचाने के लिए वह अपने साथी को निशाना बना देता है। ठहर कर सोच, तेरे डर ने कब किसी और को खतरे में धकेला? और यह भी याद रख, भेस बदलकर तू परमेश्वर के वचन से नहीं छिप सकता। बिना निशाना साधा हुआ तीर भी उसे ढूँढ़ ही लेता है।
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