1 शमूएल 30
प्राथमिक आयु (6 से 12 वर्ष) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी
1 शमूएल 30 : जब सब कुछ जल गया था
व्याख्या
दाऊद और उसके छः सौ साथी कुछ दिनों के लिए बाहर गए थे। जब वे तीसरे दिन अपने शहर सिकलग लौटे, तो उन्होंने वहाँ भयानक दृश्य देखा। अमालेकी लोग आए थे, शहर को जला दिया था, और सभी स्त्रियों तथा बच्चों को बन्दी बना कर ले गए थे। किसी को मारा नहीं गया था, पर सब कुछ लूट लिया गया था।
दाऊद और उसके साथी इतना रोए कि उनमें रोने की शक्ति भी न रही। सोचिए, दाऊद की अपनी दोनों पत्नियाँ, अहीनोअम और अबीगैल, भी बन्दी बना ली गई थीं। लोग इतने दुखी और गुस्से में थे कि वे दाऊद पर पथराव करने की बात करने लगे। यह दाऊद के जीवन का एक बहुत कठिन समय था।
फिर भी दाऊद ने अपने परमेश्वर यहोवा को स्मरण करके हियाव बाँधा, यानी उसने हार नहीं मानी, बल्कि परमेश्वर की ओर देखा। उसने एपोद के द्वारा (यह याजक का एक विशेष वस्त्र था, जिससे परमेश्वर से पूछा जाता था) यहोवा से पूछा, क्या वह इन लुटेरों का पीछा करे। परमेश्वर ने साफ उत्तर दिया, पीछा करो, तुम उन्हें पकड़ोगे और सब कुछ छुड़ा लाओगे।
रास्ते में दो सौ थके हुए लोग पीछे रह गए। बाकी चार सौ ने रास्ते में एक भूखा-प्यासा मिस्री गुलाम पाया, जिसे उसके अमालेकी स्वामी ने बीमार होने पर छोड़ दिया था। उन्होंने उसे खाना-पानी दिया, और उसने बदले में उन्हें बता दिया कि लुटेरे कहाँ हैं। दाऊद और उसके लोगों ने अमालेकियों पर हमला किया, और सब कुछ, स्त्रियाँ, बच्चे, माल, वापस पा लिया। कुछ भी नहीं छूटा।
लौटते समय, कुछ लोग उन दो सौ थके हुए साथियों को लूट में हिस्सा देने से मना करने लगे। पर दाऊद ने कहा, यह लूट यहोवा ने हमें दी है, और सबका हिस्सा बराबर होगा। इसके बाद उसने यहूदा के कई शहरों में भी लूट का हिस्सा भेजा।
इसका क्या मतलब है?
यह अध्याय हमें एक ऐसे दाऊद से मिलाता है जो पूरी तरह टूट सकता था। उसने सब कुछ खो दिया था, अपना घर, अपनी पत्नियाँ, अपने साथियों का भरोसा। पर उसने रोना बंद करने के बाद जो सबसे पहला काम किया, वह था परमेश्वर से पूछना। वह अपने दुख में अकेला नहीं भागा, न ही उसने खुद फैसला ले लिया। उसने रुककर परमेश्वर की बात सुनी।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि दाऊद ने उस बेसहारा मिस्री गुलाम के साथ दया दिखाई, जबकि वह दुश्मन के दल का हिस्सा था। और अंत में उसने अपने थके साथियों के साथ भी न्याय किया। ताकत और जीत के बाद भी, दाऊद ने दूसरों को नीचा नहीं दिखाया।
बड़ी कहानी से संबंध
परमेश्वर ने दाऊद से जो प्रतिज्ञा (वादा) की थी, वह इस अध्याय में साफ दिखती है, कि परमेश्वर अपने लोगों के साथ रहते हैं, तब भी जब सब कुछ जला हुआ लगता है। दाऊद यहाँ राजा बनने से पहले भी एक ऐसा अगुआ बनता दिखता है, जो अपने बल पर नहीं बल्कि परमेश्वर की बात सुनकर आगे बढ़ता है। यही आगे चलकर यीशु मसीह में पूरी तरह दिखाई देता है, जो अपने लोगों के लिए वह सब कुछ वापस लाने आए जो पाप ने छीन लिया था, और जिन्होंने अपनी शक्ति दूसरों को दबाने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें बचाने के लिए इस्तेमाल की।
तुम्हारे लिए
कभी-कभी तुम्हारी जिंदगी में भी ऐसा कुछ होता है जो अचानक सब बिगाड़ देता है, एक झगड़ा, कोई गलती, कोई निराशा। उस समय दाऊद जैसा करना सीखा जा सकता है, रोना गलत नहीं है, पर उसके बाद परमेश्वर की ओर मुड़ना जरूरी है। और जब तुम्हें कुछ अच्छा मिलता है, जैसे जीत, इनाम या सफलता, तो याद रखना कि उसे बांटना, और कमज़ोर या पीछे रह गए साथियों को नीचा न दिखाना, यही दाऊद ने किया।
चर्चा के लिए
दाऊद रोते-रोते भी परमेश्वर से पूछने के लिए क्यों रुका? तुम्हें कठिन समय में क्या रोकता है परमेश्वर से बात करने से?
क्या तुम्हें लगता है कि उन दो सौ थके साथियों को भी बराबर हिस्सा देना सही था? क्यों?
साथ में प्रार्थना
प्रिय परमेश्वर, जब हमारी जिंदगी में कुछ टूट जाता है और हम रो पड़ते हैं, तो हमें याद दिलाइए कि हम आपकी ओर मुड़ सकते हैं। जैसे आपने दाऊद को उत्तर दिया, वैसे ही हमारी सुनिए। हमें दूसरों के साथ दया और न्याय से चलना सिखाइए। यीशु मसीह के नाम में, आमीन।
1 शमूएल 30 के बारे में प्रश्न
पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।
1 शमूएल 30 किस विषय में है?
1 शमूएल 30 क्या कहता है?
1 शमूएल 30 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
बच्चे 1 शमूएल 30 से क्या सीख सकते हैं?
1 शमूएल 30 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
दूसरों ने क्या पाया
दाऊद घर लौटा था, आराम की आस लेकर। पर जो मिला वह राख थी: "जब दाऊद और उसके जन उस नगर में पहुँचे, तब क्या देखते हैं, कि वह आग से फुँका गया है, और उनकी स्त्रियाँ और बेटे-बेटियाँ बन्दी कर लिए गए हैं।" कभी-कभी परमेश्वर का चुना हुआ जन भी जली हुई दीवारों के सामने खड़ा रह जाता है। रोना यहाँ पाप नहीं था, दाऊद भी रोया। पर वह वहीं नहीं रुका, उसने अपने परमेश्वर में खुद को दृढ़ किया। तेरी राख के सामने तू आज क्या करेगा?
लड़ाई जीतने के बाद भी दिल का असली हाल तब खुलता है, जब बाँटने की बारी आती है। "ये लोग हमारे संग नहीं चले थे, इस कारण हम उन्हें अपने छुड़ाए हुए माल में से कुछ न देंगे।" वे दो सौ लोग थके थे, चलने लायक नहीं। और थके हुए भाई को इनाम से बाहर करना कितना आसान लगता है। दाऊद ने वह माल अपना नहीं, यहोवा का दिया हुआ माना। तू जो पाया है, उसे किसका कहता है?
दाऊद अभी अभी एक बड़े खतरे से बचकर लौटा था। तीन दिन की थकी हुई यात्रा, और मन में यही कि अब घर पहुँचकर चैन मिलेगा। पर वहाँ राख के सिवा कुछ न था, "और सिकलग को मारकर फूँक दिया है।"
कभी कभी जिस जगह को हम सुरक्षित समझते हैं, वहीं सबसे गहरी चोट लगती है। दाऊद ने उस राख पर बैठकर रोना नहीं छिपाया, पर उसने परमेश्वर से पूछना भी नहीं छोड़ा। तेरी राख भी उससे बात करने की जगह बन सकती है।
सिकलग जलकर राख, पत्नियाँ और बच्चे बंदी, और अपने ही साथी पथराव की बात कर रहे हैं। दाऊद के पास रोने तक की ताकत नहीं बची थी। फिर भी लिखा है, "परन्तु दाऊद ने अपने परमेश्वर यहोवा को स्मरण करके हियाव बाँधा।"
ध्यान दे, किसी ने आकर उसे सांत्वना नहीं दी। कभी-कभी तेरे आसपास कोई नहीं होगा जो तुझे संभाले। उस घड़ी परमेश्वर तुझसे यही पूछता है, क्या तू मुझमें अपना हियाव बाँधेगा?
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