7 से 12 वर्ष के बच्चे के लिए

रोमियों 10

प्राथमिक आयु (7-12) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

व्याख्या

पौलुस अपने यहूदी भाइयों के बारे में लिखता है, और उसका दिल दुखता है। वह कहता है, "मेरे मन की अभिलाषा और उनके लिये परमेश्वर से मेरी प्रार्थना है, कि वे उद्धार पाएँ।" यानी वह चाहता है कि उसके अपने लोग बच जाएँ, परमेश्वर के साथ फिर से जुड़ जाएँ।

समस्या क्या थी? इस्राएल के लोग परमेश्वर के लिए बहुत उत्साही थे, पर बुद्धिमानी के साथ नहीं। वे अपनी ही धार्मिकता बनाना चाहते थे, यानी वे सोचते थे कि नियमों का पालन करके वे खुद अच्छे बन सकते हैं। पर पौलुस कहता है, यीशु मसीह में व्यवस्था यानी नियमों की भूमिका पूरी हो गई है। जो कोई मसीह पर विश्वास करता है, उसे धार्मिकता मिलती है, नियम पूरे करने से नहीं।

फिर पौलुस एक बहुत सुंदर बात कहता है। परमेश्वर तक पहुँचने के लिए आसमान चढ़ने या मरे हुओं की दुनिया में उतरने की जरूरत नहीं है। वचन बहुत पास है, तुम्हारे मुँह में और तुम्हारे मन में। अगर तुम अपने मुँह से मानो कि यीशु प्रभु हैं, और अपने मन से विश्वास करो कि परमेश्वर ने उन्हें मरे हुओं में से जिलाया, तो तुम बच जाओगे।

पौलुस आगे कहता है कि यहूदी और गैर यहूदी में कोई फर्क नहीं है। जो कोई भी प्रभु का नाम लेगा, वह उद्धार पाएगा। पर इसके लिए जरूरी है कि कोई उन्हें सुसमाचार सुनाए। इसलिए वह पूछता है, बिना सुने कैसे विश्वास करें, और बिना भेजे गए प्रचारक के कैसे सुनें? अंत में वह कहता है कि सुसमाचार सारी पृथ्वी पर फैल गया है, फिर भी इस्राएल ने उसे नहीं माना, जबकि परमेश्वर सारे दिन अपने हाथ उनकी ओर फैलाए रहा।

इसका क्या अर्थ है?

यह अध्याय बताता है कि परमेश्वर के पास आना जितना कठिन लगता है, उतना कठिन नहीं है। यह ऊँचा पहाड़ चढ़ने जैसा नहीं है। यह पास की बात है, मुँह और मन की बात। पर यहाँ एक कठिन सच्चाई भी है, जिसे टाला नहीं जा सकता। इस्राएल के लोग परमेश्वर से दूर नहीं थे क्योंकि वे बुरे थे या उदासीन थे, बल्कि इसलिए कि वे बहुत मेहनत कर रहे थे, अपने ही तरीके से अच्छे बनने की। कभी-कभी सबसे बड़ी बाधा गलत रास्ते पर सही मेहनत करना है।

मुख्य सूत्र

पौलुस कहता है कि यीशु मसीह व्यवस्था का अंत है। इसका मतलब यह नहीं कि नियम बुरे थे। पुराने नियम में परमेश्वर ने वादा किया था कि वे अपने लोगों को बचाएंगे। नियम रास्ता दिखाते थे, पर वे किसी को पूरी तरह पवित्र नहीं बना सकते थे। यीशु मसीह में वह वादा पूरा हुआ। अब रास्ता नियमों का ढेर पूरा करना नहीं है, बल्कि मसीह पर भरोसा करना है, जो मर गए और फिर जी उठे। यह पूरी बाइबल की बड़ी कहानी है, परमेश्वर एक रास्ता बनाते हैं जो कोई भी पार कर सके, यहूदी हो या न हो।

तुम्हारे लिए

शायद तुम भी कभी सोचते हो कि परमेश्वर के करीब आने के लिए तुम्हें पहले बहुत अच्छा बनना पड़ेगा, पूरी बाइबल पढ़नी पड़ेगी, या हर गलती सुधारनी पड़ेगी। यह अध्याय कहता है, ऐसा नहीं है। वचन तुमसे दूर नहीं, तुम्हारे पास है। तुम अपने मन से विश्वास कर सकते हो और अपने मुँह से कह सकते हो कि यीशु प्रभु हैं। और यह भी सोचने लायक है, क्या तुम किसी को सुसमाचार की खबर सुनाने वाले बनना चाहते हो? पौलुस कहता है कि जिनके पाँव अच्छी बातों का समाचार सुनाते हैं, वे सुहावने हैं।

चर्चा के लिए

तुम्हें क्या लगता है, नियम पूरे करने की कोशिश और मसीह पर विश्वास करने में क्या फर्क है?

पौलुस कहता है कि इस्राएल ने सुना, पर विश्वास नहीं किया। ऐसा तुम्हारे साथ भी हो सकता है, कि तुम सुनो पर विश्वास न करो? क्यों?

साथ में प्रार्थना

प्रभु यीशु, धन्यवाद कि आप हमसे दूर नहीं हैं। आपका वचन हमारे पास है, हमारे मन में और हमारे मुँह में। हमें सिखाइए कि हम अपनी ही कोशिशों पर नहीं, बल्कि आप पर भरोसा करें। और हमें ऐसे पाँव दीजिए जो दूसरों तक आपकी अच्छी खबर ले जाएँ। आमीन।

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रोमियों 10 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

रोमियों 10 किस विषय में है?
पौलुस अपने यहूदी भाइयों के बारे में लिखता है, और उसका दिल दुखता है। वह कहता है, "मेरे मन की अभिलाषा और उनके लिये परमेश्वर से मेरी प्रार्थना है, कि वे उद्धार पाएँ।" यानी वह चाहता है कि उसके अपने लोग बच जाएँ, परमेश्वर के साथ फिर से जुड़ जाएँ।
रोमियों 10 क्या कहता है?
फिर पौलुस एक बहुत सुंदर बात कहता है। परमेश्वर तक पहुँचने के लिए आसमान चढ़ने या मरे हुओं की दुनिया में उतरने की जरूरत नहीं है। वचन बहुत पास है, तुम्हारे मुँह में और तुम्हारे मन में। अगर तुम अपने मुँह से मानो कि यीशु प्रभु हैं, और अपने मन से विश्वास करो कि परमेश्वर ने उन्हें मरे हुओं में से जिलाया, तो तुम बच जाओगे।
रोमियों 10 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
यह अध्याय बताता है कि परमेश्वर के पास आना जितना कठिन लगता है, उतना कठिन नहीं है। यह ऊँचा पहाड़ चढ़ने जैसा नहीं है। यह पास की बात है, मुँह और मन की बात। पर यहाँ एक कठिन सच्चाई भी है, जिसे टाला नहीं जा सकता। इस्राएल के लोग परमेश्वर से दूर नहीं थे क्योंकि वे बुरे थे या उदासीन थे, बल्कि इसलिए कि वे बहुत मेहनत कर रहे थे, अपने ही तरीके से अच्छे बनने की। कभी-कभी सबसे बड़ी बाधा गलत रास्ते पर सही मेहनत करना है।
बच्चे रोमियों 10 से क्या सीख सकते हैं?
शायद तुम भी कभी सोचते हो कि परमेश्वर के करीब आने के लिए तुम्हें पहले बहुत अच्छा बनना पड़ेगा, पूरी बाइबल पढ़नी पड़ेगी, या हर गलती सुधारनी पड़ेगी। यह अध्याय कहता है, ऐसा नहीं है। वचन तुमसे दूर नहीं, तुम्हारे पास है। तुम अपने मन से विश्वास कर सकते हो और अपने मुँह से कह सकते हो कि यीशु प्रभु हैं। और यह भी सोचने लायक है, क्या तुम किसी को सुसमाचार की खबर सुनाने वाले बनना चाहते हो?
रोमियों 10 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
पौलुस कहता है कि इस्राएल ने सुना, पर विश्वास नहीं किया। ऐसा तुम्हारे साथ भी हो सकता है, कि तुम सुनो पर विश्वास न करो? क्यों?

दूसरों ने क्या पाया

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 12

वह सब का प्रभु है और अपने सब नाम लेनेवालों के लिये उदार है।" पौलुस यह उन लोगों से कह रहा था जो जाति और परंपरा के आधार पर खुद को दूसरों से ऊँचा समझते थे। परमेश्वर के पास कोई ऊँची पंक्ति नहीं है, कोई पिछड़ी कतार नहीं। तेरी जाति, तेरा गाँव, तेरा बीता हुआ जीवन उसकी उदारता की सीमा तय नहीं करते। तू पुकार, वह सुनता है। सवाल यह है कि जिन्हें तू अपने से छोटा मानता है, उनके लिए भी तेरा दिल इतना ही खुला है?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 21

मैं सारे दिन अपने हाथ एक आज्ञा न माननेवाली और विवाद करनेवाली प्रजा की ओर बढ़ाए रहा।" सोचो, हाथ फैलाए रखना कितना थका देता है। परमेश्वर सारे दिन ऐसे ही खड़ा रहा, बुलाता रहा, और लोग मुँह फेरते रहे। तुम्हारी ओर भी वे हाथ अब तक फैले हैं। सवाल यह नहीं कि वह कब तक रुकेगा, सवाल यह है कि तुम कब तक टालोगे।

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For parents and teachers: 7 से 12 वर्ष के उन बच्चों के लिए लिखा गया जो स्वयं पढ़ सकते हैं। पारिवारिक भक्ति और स्कूल में बाइबल पाठ के लिए उत्तम। This explanation is generated automatically by language models. While we strive for theological soundness, the software can make mistakes.

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