7 से 12 वर्ष के बच्चे के लिए

2 कुरिन्थियों 6

प्राथमिक आयु (7-12) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

व्याख्या

पौलुस कुरिन्थुस शहर की मंडली को चिट्ठी लिख रहा है। उसने वहाँ काम किया था, लोग विश्वास में आए थे, पर अब कुछ लोग उस पर शक करने लगे हैं। कौन है यह पौलुस? क्या उस पर भरोसा किया जा सकता है?

पौलुस शुरू करता है एक अजीब वाक्य से: "परमेश्वर का अनुग्रह जो तुम पर हुआ, व्यर्थ न रहने दो।" अनुग्रह का मतलब है: परमेश्वर की भलाई जो हमें बिना कमाए मिलती है। पौलुस कहता है, वह भलाई तुम्हारे हाथ में एक बिना खोले हुए उपहार की तरह न पड़ी रह जाए। और फिर वह यशायाह की एक पुरानी बात दोहराता है और जोड़ता है: "देखो; अभी प्रसन्नता का समय है; देखो, अभी उद्धार का दिन है।" आज। कल नहीं।

इसके बाद पौलुस अपने बारे में बताता है, पर इस तरह नहीं जैसे कोई अपनी शेखी बघारता हो। वह गिनाता है कि उसने क्या झेला है: कोड़े, कैद, हुल्लड़, भूख, रातों की नींद न आना। और साथ ही वह गिनाता है कि उसके भीतर क्या रहा: धीरज, कृपा, सच्चा प्रेम, पवित्र आत्मा।

फिर आते हैं वे वाक्य जो सबसे ज़्यादा याद रह जाते हैं। पौलुस जोड़ों में बोलता है, जैसे दो तस्वीरें एक साथ रखी हों। लोग हमें झूठा समझते हैं, पर हम सच्चे हैं। हमें कोई नहीं जानता, फिर भी हम प्रसिद्ध हैं। हम मरते हुओं जैसे दिखते हैं, और देखो, हम जीवित हैं। हम कंगालों जैसे हैं, पर बहुतों को धनवान बना देते हैं। हमारे पास कुछ नहीं, फिर भी सब कुछ है।

अंत में पौलुस का सुर बदल जाता है। वह बहुत कोमल हो जाता है: "हमारा हृदय तुम्हारी ओर खुला हुआ है।" वह कहता है, मैंने अपना दिल तुम्हारे लिए खोल रखा है, पर तुमने अपना बंद कर लिया है। तुम भी अपना हृदय खोल दो, मैं तुम्हें अपने बच्चों जैसा मानता हूँ।

और फिर एक चेतावनी: "अविश्वासियों के साथ असमान जूए में न जुतो।" जूआ वह लकड़ी है जो दो बैलों के कंधों पर रखी जाती है ताकि वे साथ हल खींचें। अगर एक बैल बड़ा और दूसरा छोटा हो, तो हल टेढ़ा चलता है और दोनों को चोट लगती है। पौलुस पूछता है: ज्योति और अंधकार साथ कैसे रहेंगे? और वह कहता है कुछ बहुत बड़ा: हम जीविते परमेश्वर के मन्दिर हैं। परमेश्वर किसी पत्थर की इमारत में नहीं, हममें बसना चाहते हैं। और वे वादा करते हैं: "मैं तुम्हारा पिता होऊँगा, और तुम मेरे बेटे और बेटियाँ होंगे।"

इसका क्या अर्थ है?

पौलुस यह साबित नहीं कर रहा कि वह कितना मज़बूत है। वह यह दिखा रहा है कि परमेश्वर के साथ चलने वाले लोग बाहर से कमज़ोर दिख सकते हैं और भीतर से भरे हुए हो सकते हैं। यह उलटा लगता है, पर यही मसीही जीवन की असली सूरत है।

और वह जूए वाली बात? ईमानदारी से कहूँ, इसे कुछ लोग गलत समझ लेते हैं, जैसे कि हमें उन दोस्तों से दूर भागना चाहिए जो यीशु को नहीं जानते। पर पौलुस खुद ऐसे लोगों के बीच रहता था, उनसे बात करता था, उनसे प्रेम करता था। वह किसी और चीज़ की बात कर रहा है: ऐसे रिश्ते या साथ जिनमें तुम बंध जाओ और जो तुम्हें उस दिशा में खींचें जहाँ परमेश्वर नहीं हैं। मुझे यह भी मानना पड़ेगा कि हर हालत में यह तय करना आसान नहीं होता कि कहाँ रेखा खींचनी है। पौलुस हमें एक तैयार सूची नहीं देता, वह हमें सोचने के लिए एक तस्वीर देता है।

जोड़ने वाला सूत्र

"मैं उनका परमेश्वर होऊँगा, और वे मेरे लोग होंगे।" यह वाक्य बाइबल में बार-बार लौटता है, मूसा के समय से लेकर भविष्यद्वक्ताओं तक। इसे वाचा कहते हैं: परमेश्वर का पक्का वादा कि वे अपने लोगों के साथ रहेंगे और उन्हें छोड़ेंगे नहीं।

पहले परमेश्वर मन्दिर में बसते थे। अब पौलुस कहता है कि हम मन्दिर हैं। यह इसलिए हो सका क्योंकि यीशु मसीह आए। जो कुछ पौलुस अपने बारे में कहता है, वह पहले यीशु के बारे में सच था: निरादर सहा, मरते हुओं जैसे दिखे, और देखो, वे जीवित हैं। कंगाल हुए ताकि बहुतों को धनवान बना दें।

तुम्हारे लिए

पौलुस कहता है, "अभी उद्धार का दिन है।" उसका मतलब है कि परमेश्वर की ओर मुड़ने के लिए बड़े होने का इंतज़ार करने की ज़रूरत नहीं। नौ साल की उम्र में भी आज ही वह दिन है।

और एक बात दिल खोलने के बारे में। कुरिन्थ के लोगों ने अपना दिल बंद कर लिया था, शायद नाराज़गी से, शायद शर्म से। तुम्हारे साथ भी ऐसा हो सकता है: किसी से झगड़ा हुआ और अब तुम अंदर से दरवाज़ा बंद रखते हो। पौलुस पहले खुद खुलता है, फिर माँगता है। कभी-कभी किसी को पहले खुलना पड़ता है। क्या तुम वह हो सकते हो?

और अगर तुम सचमुच परमेश्वर का मन्दिर हो, तो सोचो: वे तुम्हारे भीतर क्या देखते हैं जब कोई और नहीं देख रहा?

इस पर बात करो

पौलुस कहता है कि उसके पास कुछ नहीं, फिर भी सब कुछ है। तुम्हें क्या लगता है, उसका मतलब क्या था?

"अपना हृदय खोल दो" का तुम्हारे जीवन में क्या मतलब हो सकता है, और किसके साथ यह सबसे मुश्किल है?

मिलकर प्रार्थना

प्रभु परमेश्वर, आपने कहा कि आप हममें बसना चाहते हैं और हमारे पिता होना चाहते हैं। यह बहुत बड़ी बात है और हम इसे पूरी तरह समझते भी नहीं। हमारा दिल खोलिए, आपके लिए और उन लोगों के लिए जिनसे हमने दरवाज़ा बंद कर रखा है। और सिखाइए कि आपका अनुग्रह हमारे भीतर बेकार पड़ा न रह जाए। आमीन।

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2 कुरिन्थियों 6 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

2 कुरिन्थियों 6 किस विषय में है?
पौलुस कुरिन्थुस शहर की मंडली को चिट्ठी लिख रहा है। उसने वहाँ काम किया था, लोग विश्वास में आए थे, पर अब कुछ लोग उस पर शक करने लगे हैं। कौन है यह पौलुस? क्या उस पर भरोसा किया जा सकता है?
2 कुरिन्थियों 6 क्या कहता है?
फिर आते हैं वे वाक्य जो सबसे ज़्यादा याद रह जाते हैं। पौलुस जोड़ों में बोलता है, जैसे दो तस्वीरें एक साथ रखी हों। लोग हमें झूठा समझते हैं, पर हम सच्चे हैं। हमें कोई नहीं जानता, फिर भी हम प्रसिद्ध हैं। हम मरते हुओं जैसे दिखते हैं, और देखो, हम जीवित हैं। हम कंगालों जैसे हैं, पर बहुतों को धनवान बना देते हैं। हमारे पास कुछ नहीं, फिर भी सब कुछ है।
2 कुरिन्थियों 6 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
पौलुस यह साबित नहीं कर रहा कि वह कितना मज़बूत है। वह यह दिखा रहा है कि परमेश्वर के साथ चलने वाले लोग बाहर से कमज़ोर दिख सकते हैं और भीतर से भरे हुए हो सकते हैं। यह उलटा लगता है, पर यही मसीही जीवन की असली सूरत है।
बच्चे 2 कुरिन्थियों 6 से क्या सीख सकते हैं?
पहले परमेश्वर मन्दिर में बसते थे। अब पौलुस कहता है कि हम मन्दिर हैं। यह इसलिए हो सका क्योंकि यीशु मसीह आए। जो कुछ पौलुस अपने बारे में कहता है, वह पहले यीशु के बारे में सच था: निरादर सहा, मरते हुओं जैसे दिखे, और देखो, वे जीवित हैं। कंगाल हुए ताकि बहुतों को धनवान बना दें।
2 कुरिन्थियों 6 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
और अगर तुम सचमुच परमेश्वर का मन्दिर हो, तो सोचो: वे तुम्हारे भीतर क्या देखते हैं जब कोई और नहीं देख रहा?

दूसरों ने क्या पाया

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 7

पौलुस अपनी सेवकाई का प्रमाण गिनाते हुए कहता है, "सत्य के वचन से, परमेश्वर की सामर्थ्य से; धार्मिकता के हथियारों से जो दाहिने, बाएँ हाथ में हैं।" दाहिने हाथ में तलवार, बाएँ में ढाल। यानी जब वह आगे बढ़ा, तब भी धार्मिकता, और जब उसे बचाव करना पड़ा, तब भी वही। सोचो, जब लोग तुम पर झूठा आरोप लगाते हैं, तुम अपने बचाव में क्या उठाते हो? वहाँ भी सच्चाई ही तुम्हारा हथियार हो।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 8

पौलुस अपनी सेवा का ब्यौरा देते हुए लिखता है, "आदर और निरादर से, दुर्नाम और सुनाम से; धोखा देनेवालों के सदृश हैं, फिर भी सच्चे हैं।" ध्यान दे, वह लोगों की राय बदलने की कोशिश नहीं करता। उसे तारीफ मिले या बदनामी, वह वही आदमी रहता है। तेरे बारे में लोग क्या कहते हैं, यह तेरी पहचान तय करे या परमेश्वर की नज़र?

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