12 वर्ष और उससे अधिक आयु के किशोर के लिए

2 कुरिन्थियों 6

किशोर (12 वर्ष और अधिक) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

व्याख्या

पौलुस यह अध्याय एक ऐसी कलीसिया को लिख रहा है जो उससे कुछ दूर हट गई थी। कुरिन्थ एक बंदरगाह शहर था, पैसा, मंदिर, मूर्तियाँ, हर तरह की सोच। वहाँ के कुछ विश्वासियों को लगने लगा था कि पौलुस बहुत प्रभावशाली नहीं है। वह जेल जाता है, पिटता है, गरीब है। ऐसा आदमी परमेश्वर का सेवक कैसे हो सकता है?

पौलुस इसका जवाब बहुत अजीब तरीके से देता है। वह अपनी सफलताओं की सूची नहीं गिनाता। वह अपने घावों की सूची गिनाता है: "क्लेशों से, दरिद्रता से, संकटों से, कोड़े खाने से, कैद होने से, हुल्लड़ों से, परिश्रम से, जागते रहने से, उपवास करने से।" और इसके ठीक बीच में वह वे चीज़ें रखता है जो असल में उसका प्रमाण-पत्र हैं: "पवित्रता से, ज्ञान से, धीरज से, कृपालुता से, पवित्र आत्मा से, सच्चे प्रेम से, सत्य के वचन से, परमेश्वर की सामर्थ्य से।"

फिर आती हैं वे पंक्तियाँ जो पढ़ने में लगभग विरोधाभास जैसी लगती हैं। लोग उन्हें धोखेबाज़ समझते हैं, पर वे सच्चे हैं। उन्हें कोई नहीं जानता, पर वे प्रसिद्ध हैं। वे मरते हुओं जैसे हैं, पर देखो, जीवित हैं। शोक करनेवालों के समान हैं, पर सर्वदा आनन्द करते हैं। कंगाल हैं, पर बहुतों को धनवान बना देते हैं। "ऐसे हैं जैसे हमारे पास कुछ नहीं फिर भी सब कुछ रखते हैं।" यह किसी कवि की चतुराई नहीं है। यह एक आदमी है जो दो सच्चाइयों के बीच जी रहा है: बाहर से जो दिखता है, और भीतर से जो असल में है।

आधे रास्ते पर पौलुस की आवाज़ बदल जाती है। वह अचानक बहुत निजी हो जाता है: "हे कुरिन्थियों, हमने खुलकर तुम से बातें की हैं, हमारा हृदय तुम्हारी ओर खुला हुआ है।" संकोच उसके मन में नहीं, उनके मन में है। और वह उनसे भीख जैसी विनती करता है, "तुम भी उसके बदले में अपना हृदय खोल दो।"

अंत में वह एक साफ़ माँग रखता है: "अविश्वासियों के साथ असमान जूए में न जुतो।" यह चित्र खेत का है, दो अलग जानवर एक ही जुए में, अलग-अलग दिशा में खींचते हुए, दोनों घायल। फिर पाँच सवाल, जिनका जवाब देना ज़रूरी नहीं क्योंकि जवाब स्पष्ट है: ज्योति और अंधकार का कोई मेल नहीं। और इसका कारण मूर्तियों से नफ़रत नहीं है, बल्कि पहचान है: "हम तो जीविते परमेश्वर के मन्दिर हैं।" अध्याय एक वादे पर खत्म होता है, जो किसी नियम से बड़ा है: "तुम्हारा पिता होऊँगा, और तुम मेरे बेटे और बेटियाँ होंगे।"

इसका अर्थ क्या है?

पहली बात जो चुभती है, वह पहली आयत है। अनुग्रह "व्यर्थ" रह सकता है। यानी परमेश्वर का दिया हुआ कुछ ऐसा हो सकता है जिसे तुम अपनी ज़िंदगी में बेकार पड़ा छोड़ दो। ईश्वर की कृपा जबरदस्ती काम नहीं करती। वह दी जाती है, और उसे लिया जाना होता है। इसलिए पौलुस कहता है: "देखो; अभी प्रसन्नता का समय है; देखो, अभी उद्धार का दिन है।" कल नहीं, जब सब कुछ सुलझ जाएगा। अभी।

दूसरी बात: पौलुस का आयत 8 से 10 वाला हिस्सा उस दुनिया के लिए ज़हर है जो सिर्फ़ दिखावे पर चलती है। तुम्हारी असली हालत वह नहीं है जो लोग तुम्हारे बारे में कहते हैं। आदर मिले या निरादर, दुर्नाम मिले या सुनाम, पौलुस का सच नहीं बदलता। यह उस उम्र के लिए बहुत मायने रखता है जहाँ पहचान लगातार दूसरों की प्रतिक्रिया से बनती है। पौलुस की पहचान बाहर से नहीं आती। वह "सब कुछ" रखता है, चाहे उसके हाथ खाली हों।

तीसरी बात: आयत 14 को अक्सर सिर्फ़ शादी के बारे में एक नियम बना दिया जाता है। पौलुस इससे ज़्यादा कह रहा है। जूआ वह चीज़ है जो तुम्हारी दिशा तय करती है। सवाल यह नहीं कि तुम्हारे दोस्त विश्वास करते हैं या नहीं। सवाल यह है कि तुम्हें कौन खींच रहा है और किधर।

मुख्य सूत्र

यह अध्याय जो कहता है, वह मसीह की कहानी को दोहराता है। यीशु मसीह को भी लोगों ने धोखेबाज़ समझा, पर वे सत्य थे। वे मरे, पर जीवित हैं। वे कंगाल हुए, ताकि बहुतों को धनवान बना दें। पौलुस अपनी कोई नई शैली नहीं बना रहा, वह अपने प्रभु के पीछे चल रहा है।

और आयत 16 से 18 में पौलुस पुराने नियम के वादे उठाकर एक नई जगह रखता है। परमेश्वर ने कहा था कि वे अपने मंदिर में बसेंगे। अब पौलुस कहता है, वह मंदिर तुम हो। पत्थर नहीं, लोग। और आयत 18 का "पिता" वाला वादा दाऊद के बेटे को दिया गया था। मसीह में वह तुम पर आता है। यही पूरी कहानी का दिल है: परमेश्वर दूर से नियम नहीं फेंकते, वे भीतर आकर बसना चाहते हैं और पिता कहलाना चाहते हैं।

तुम्हारे लिए

अगर तुम्हें अपनी योग्यता साबित करने की आदत है, तो आयत 4 से 10 को धीरे-धीरे दोबारा पढ़ो और सोचो: अगर तुम्हारे जीवन का प्रमाण-पत्र नंबर, फ़ॉलोअर और तारीफ़ें न होतीं, बल्कि धीरज, कृपालुता, पवित्रता और सच्चा प्रेम होते, तो तुम कहाँ खड़े होते?

और यहाँ असली चुनौती है, दो हिस्सों में। पहला: इस हफ़्ते किसी एक इंसान के सामने अपना हृदय खोलो, जैसे पौलुस ने खोला। कोई मेंटर, कोई दोस्त, कोई बड़ा जिस पर तुम भरोसा करते हो। एक ऐसी बात कहो जिसे तुम अब तक छिपाते आए हो। संकोच तोड़ना पौलुस के लिए भी आसान नहीं था, उसने फिर भी किया।

दूसरा, और यह ज़्यादा कड़वा है: अपने जीवन के जूए की जाँच करो। कौन सा रिश्ता, कौन सी आदत, कौन सा ऐप, कौन सा समूह तुम्हें लगातार उस दिशा में खींच रहा है जहाँ तुम जाना नहीं चाहते? पौलुस "निकलो और अलग रहो" कहता है, और यह शब्द दर्द देते हैं, क्योंकि निकलने का मतलब हमेशा कुछ खोना होता है। परमेश्वर उस खोने को खाली नहीं छोड़ते। वे कहते हैं, "मैं तुम्हें ग्रहण करूँगा।"

इस पर बात करो

तुम्हारी असली पहचान किस चीज़ से बनती है, ईमानदारी से बताओ, दूसरों की राय से या इस बात से कि परमेश्वर तुम में बसते हैं? इसका सबूत तुम्हारे पिछले हफ़्ते में कहाँ दिखता है?

कोई एक चीज़ बताओ जिसमें तुम "अभी" के बजाय "बाद में" कह रहे हो, और सोचो कि तुम असल में किस बात से डर रहे हो।

मिलकर प्रार्थना

प्रभु, आपका अनुग्रह मेरे जीवन में व्यर्थ पड़ा न रहे। मुझमें बसें, मेरे भीतर चलें फिरें, और मुझे इतनी हिम्मत दें कि मैं वह जूआ तोड़ सकूँ जो मुझे आपसे दूर खींचता है। मुझे अपना बेटा, अपनी बेटी कहकर पुकारें, और मुझे उस नाम में जीना सिखाएँ। यीशु मसीह के नाम से, आमीन।

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2 कुरिन्थियों 6 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

2 कुरिन्थियों 6 किस विषय में है?
पौलुस यह अध्याय एक ऐसी कलीसिया को लिख रहा है जो उससे कुछ दूर हट गई थी। कुरिन्थ एक बंदरगाह शहर था, पैसा, मंदिर, मूर्तियाँ, हर तरह की सोच। वहाँ के कुछ विश्वासियों को लगने लगा था कि पौलुस बहुत प्रभावशाली नहीं है। वह जेल जाता है, पिटता है, गरीब है। ऐसा आदमी परमेश्वर का सेवक कैसे हो सकता है?
2 कुरिन्थियों 6 क्या कहता है?
आधे रास्ते पर पौलुस की आवाज़ बदल जाती है। वह अचानक बहुत निजी हो जाता है: "हे कुरिन्थियों, हमने खुलकर तुम से बातें की हैं, हमारा हृदय तुम्हारी ओर खुला हुआ है।" संकोच उसके मन में नहीं, उनके मन में है। और वह उनसे भीख जैसी विनती करता है, "तुम भी उसके बदले में अपना हृदय खोल दो।"
2 कुरिन्थियों 6 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
दूसरी बात: पौलुस का आयत 8 से 10 वाला हिस्सा उस दुनिया के लिए ज़हर है जो सिर्फ़ दिखावे पर चलती है। तुम्हारी असली हालत वह नहीं है जो लोग तुम्हारे बारे में कहते हैं। आदर मिले या निरादर, दुर्नाम मिले या सुनाम, पौलुस का सच नहीं बदलता। यह उस उम्र के लिए बहुत मायने रखता है जहाँ पहचान लगातार दूसरों की प्रतिक्रिया से बनती है। पौलुस की पहचान बाहर से नहीं आती। वह "सब कुछ" रखता है, चाहे उसके हाथ खाली हों।
किशोर 2 कुरिन्थियों 6 से क्या सीख सकते हैं?
और आयत 16 से 18 में पौलुस पुराने नियम के वादे उठाकर एक नई जगह रखता है। परमेश्वर ने कहा था कि वे अपने मंदिर में बसेंगे। अब पौलुस कहता है, वह मंदिर तुम हो। पत्थर नहीं, लोग। और आयत 18 का "पिता" वाला वादा दाऊद के बेटे को दिया गया था। मसीह में वह तुम पर आता है। यही पूरी कहानी का दिल है: परमेश्वर दूर से नियम नहीं फेंकते, वे भीतर आकर बसना चाहते हैं और पिता कहलाना चाहते हैं।
2 कुरिन्थियों 6 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
दूसरा, और यह ज़्यादा कड़वा है: अपने जीवन के जूए की जाँच करो। कौन सा रिश्ता, कौन सी आदत, कौन सा ऐप, कौन सा समूह तुम्हें लगातार उस दिशा में खींच रहा है जहाँ तुम जाना नहीं चाहते? पौलुस "निकलो और अलग रहो" कहता है, और यह शब्द दर्द देते हैं, क्योंकि निकलने का मतलब हमेशा कुछ खोना होता है। परमेश्वर उस खोने को खाली नहीं छोड़ते। वे कहते हैं, "मैं तुम्हें ग्रहण करूँगा।"

दूसरों ने क्या पाया

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 7

पौलुस अपनी सेवकाई का प्रमाण गिनाते हुए कहता है, "सत्य के वचन से, परमेश्वर की सामर्थ्य से; धार्मिकता के हथियारों से जो दाहिने, बाएँ हाथ में हैं।" दाहिने हाथ में तलवार, बाएँ में ढाल। यानी जब वह आगे बढ़ा, तब भी धार्मिकता, और जब उसे बचाव करना पड़ा, तब भी वही। सोचो, जब लोग तुम पर झूठा आरोप लगाते हैं, तुम अपने बचाव में क्या उठाते हो? वहाँ भी सच्चाई ही तुम्हारा हथियार हो।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 8

पौलुस अपनी सेवा का ब्यौरा देते हुए लिखता है, "आदर और निरादर से, दुर्नाम और सुनाम से; धोखा देनेवालों के सदृश हैं, फिर भी सच्चे हैं।" ध्यान दे, वह लोगों की राय बदलने की कोशिश नहीं करता। उसे तारीफ मिले या बदनामी, वह वही आदमी रहता है। तेरे बारे में लोग क्या कहते हैं, यह तेरी पहचान तय करे या परमेश्वर की नज़र?

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