2 यूहन्ना 1
प्राथमिक आयु (7-12) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी
व्याख्या
यह चिट्ठी बहुत छोटी है। पूरी बाइबल में शायद यह सबसे छोटी चिट्ठियों में से एक है। इसे लिखने वाला अपने आप को "प्राचीन" कहता है, यानी एक बुज़ुर्ग व्यक्ति। ज़्यादातर लोग मानते हैं कि यह प्रेरित यूहन्ना है, जो अब बहुत बूढ़ा हो चुका है। वह यीशु के साथ चला था, उसने यीशु को क्रूस पर देखा था, और उसने जी उठे यीशु को भी देखा था। अब, बरसों बाद, वह एक "चुनी हुई महिला और उसके बच्चों" को लिख रहा है। कुछ लोग सोचते हैं कि यह सच में एक माँ और उसके बच्चे थे। दूसरे सोचते हैं कि "महिला" का मतलब एक कलीसिया है और "बच्चे" उसके सदस्य हैं। दोनों हो सकता है।
यूहन्ना खुश है। वह लिखता है कि उसने महिला के कुछ बच्चों को "सत्य पर चलते हुए" पाया। इसका मतलब है कि वे यीशु के बारे में जो सच है, उसी पर चल रहे हैं, और वैसे ही जी रहे हैं।
फिर वह एक पुरानी आज्ञा याद दिलाता है, जो नई नहीं है: एक दूसरे से प्रेम रखो। और प्रेम क्या है? प्रेम यह है कि हम परमेश्वर की आज्ञाओं के अनुसार चलें। प्रेम सिर्फ एक अच्छा एहसास नहीं है, वह एक चुनाव है, एक चलने का तरीका है।
फिर यूहन्ना गंभीर हो जाता है। वह चेतावनी देता है कि "भरमानेवाले" यानी झूठ फैलाने वाले लोग निकल पड़े हैं। ये लोग नहीं मानते कि यीशु मसीह सच में शरीर लेकर, असली इंसान बनकर आया। यूहन्ना कहता है: सावधान रहो। अगर कोई ऐसी शिक्षा लेकर आए जो मसीह की शिक्षा से मेल नहीं खाती, तो उसका स्वागत मत करो।
अंत में यूहन्ना कहता है कि उसके पास और भी बहुत बातें हैं, पर वह कागज़ पर नहीं लिखना चाहता। वह खुद आकर आमने-सामने बात करना चाहता है। फिर एक छोटी सी नमस्कार, और चिट्ठी खत्म।
इसका क्या अर्थ है?
यूहन्ना दो बातें एक साथ जोड़ रहा है: सत्य और प्रेम। कुछ लोग सोचते हैं कि सत्य सख़्त होता है और प्रेम कोमल होता है, इसलिए दोनों साथ नहीं चल सकते। यूहन्ना दिखाता है कि यह गलत सोच है। सच्चा प्रेम बिना सत्य के अंधा हो जाता है। और सत्य बिना प्रेम के पत्थर जैसा कठोर हो जाता है। दोनों साथ चाहिए।
यीशु के बारे में सच क्या है? कि वह सच में इंसान बनकर आया। असली शरीर, असली भूख, असली आँसू, असली मौत। यह छोटी बात नहीं है। अगर यीशु सच में इंसान नहीं बना, तो वह हमारे लिए मर भी नहीं सकता था। इसीलिए यूहन्ना इतना डटकर बोलता है।
मुख्य धारा
यह छोटी चिट्ठी बड़ी कहानी से जुड़ी है। परमेश्वर ने बहुत पहले से वादा किया था कि वह अपने लोगों के बीच आएगा। यीशु में यह वादा पूरा हुआ। परमेश्वर सच में हमारे बीच आया, हमारी हड्डियों और चमड़ी में। और अब जो लोग उस पर विश्वास करते हैं, वे एक बड़े परिवार में हैं। इसीलिए यूहन्ना "बहन" के बच्चों की तरफ़ से नमस्कार भेजता है। एक शहर के मसीही, दूसरे शहर के मसीहियों को भाई-बहन कहते हैं, हालाँकि उन्होंने कभी एक-दूसरे को देखा भी नहीं है। यह परमेश्वर का नया परिवार है, जो यीशु मसीह के ज़रिए बना है।
तुम्हारे लिए
तुम्हारे साथ भी ऐसा हो सकता है कि कोई तुम्हें कुछ ऐसा बताए जो यीशु के बारे में सही नहीं है। शायद स्कूल में, शायद इंटरनेट पर, शायद कोई रिश्तेदार। यूहन्ना कहता है: सावधान रहो। इसका मतलब यह नहीं कि तुम रूखे बन जाओ या लोगों से नफ़रत करो। इसका मतलब है कि तुम खुद यीशु को अच्छी तरह जानो, ताकि तुम पहचान सको कि क्या सच है।
और दूसरी बात: प्रेम। यूहन्ना बूढ़ा है, पर वह अब भी वही आज्ञा दोहरा रहा है, एक दूसरे से प्रेम करो। तुम्हारे घर में, तुम्हारी कक्षा में, तुम्हारी कलीसिया में, यह कैसा दिखेगा? शायद उस बच्चे से बात करना जिससे कोई बात नहीं करता। शायद अपनी बहन को माफ़ करना जब उसने तुम्हारी चीज़ तोड़ी। प्रेम कुछ करने की चीज़ है।
इस पर बात करो
अगर कोई तुमसे पूछे, "यीशु सच में कौन है?" तो तुम क्या जवाब दोगे?
सत्य और प्रेम, दोनों साथ रखना कभी-कभी मुश्किल क्यों लगता है? क्या तुम कोई ऐसा उदाहरण सोच सकते हो?
मिलकर प्रार्थना
प्रभु यीशु, धन्यवाद कि आप सच में इंसान बनकर हमारे बीच आए। हमें ऐसा दिल दीजिए जो सत्य को पकड़े रखे और साथ में प्रेम भी करे। हमें पहचानने की समझ दीजिए कि क्या सही है, और हमें हिम्मत दीजिए कि हम आपके रास्ते पर चलते रहें। आमीन।
दूसरों ने क्या पाया
यूहन्ना कुछ नया नहीं लिखता। वह कहता है, "मैं तुझे कोई नई आज्ञा नहीं, परन्तु वही जो आरम्भ से हमारे पास है, लिखता हूँ।" और ध्यान दे, वह आज्ञा नहीं देता, विनती करता है। बूढ़ा प्रेरित हाथ जोड़कर कह रहा है, एक दूसरे से प्रेम रखो। हम नई बातें ढूँढ़ते रहते हैं, जबकि पहली बात अब तक अधूरी पड़ी है।
प्रेम यह है कि हम उसकी आज्ञाओं के अनुसार चलें।" यूहन्ना प्रेम को भावना नहीं, चाल कहता है। कदम, रोज़ के छोटे कदम। और आज्ञा भी यही है कि प्रेम में चलते रहो। यानी आज्ञा मानना प्रेम है, और प्रेम करना आज्ञा है। सोच, घर में जिस व्यक्ति की ओर तेरा मन कड़ा हो गया है, आज उसकी ओर एक कदम कैसा दिखेगा?
उस सत्य के कारण जो हम में बना रहता है, और सर्वदा हमारे साथ रहेगा।" ध्यान दे, सत्य कोई ऐसी चीज़ नहीं जिसे यूहन्ना ने पकड़ रखा था। सत्य ही उनमें बसा हुआ था, मेहमान की तरह नहीं, घर के मालिक की तरह। और यही सत्य उस बहन और उसके बच्चों से यूहन्ना के प्रेम की जड़ थी। तेरा प्रेम भी किसी भावना पर नहीं, उसी बने रहने वाले सत्य पर टिका हो। जो हमेशा साथ रहेगा, वही तुझसे प्रेम करना सिखाएगा।
यूहन्ना लिखता है, "मैं बहुत आनन्दित हुआ, कि मैंने तेरे कुछ बच्चों को उस आज्ञा के अनुसार, जो हमें पिता की ओर से मिली थी, सत्य पर चलते हुए पाया।"
ध्यान दे, "कुछ" शब्द पर। सारे नहीं, कुछ। यूहन्ना निराश नहीं होता, वह उन थोड़े लोगों पर आनन्दित होता है जो सच्चाई में चल रहे हैं।
तेरे आस पास भी शायद सब वैसे न हों जैसा तू चाहता है। पर क्या तू उन थोड़ों को देखकर परमेश्वर का धन्यवाद करता है, जो सचमुच मसीह के पीछे चल रहे हैं?
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