7 से 12 वर्ष के बच्चे के लिए

प्रेरितों के काम 19

प्राथमिक आयु (7-12) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

व्याख्या

पौलुस इफिसुस नाम के शहर में पहुँचता है और वहाँ कुछ चेलों से मिलता है। वह उनसे एक अजीब सवाल पूछता है, "क्या तुम ने विश्वास करते समय पवित्र आत्मा पाया?" वे कहते हैं कि उन्होंने पवित्र आत्मा के बारे में सुना भी नहीं। पता चलता है कि उन्होंने केवल यूहन्ना का बपतिस्मा लिया था, जो मन फिराने के लिए एक तैयारी थी, लेकिन वे नहीं जानते थे कि जिसकी यूहन्ना ने बात की थी, वह यीशु आ चुके हैं। पौलुस उन्हें यह समझाता है, और वे प्रभु यीशु के नाम से बपतिस्मा लेते हैं। जब पौलुस उन पर हाथ रखता है, तो पवित्र आत्मा उन पर उतरता है।

इफिसुस में पौलुस तीन महीने तक आराधनालय में और फिर दो साल तक तुरन्नुस की पाठशाला में परमेश्वर के राज्य के बारे में बताता रहता है। परमेश्वर उसके हाथों से चंगाई के अद्भुत काम करते हैं, यहाँ तक कि उसके छूए हुए रूमाल भी बीमारों को अच्छा करते हैं। कुछ यहूदी झाड़ा-फूँकी करनेवाले यीशु का नाम इस्तेमाल करने की कोशिश करते हैं जैसे वह कोई जादू का मंत्र हो। लेकिन जब वे ऐसा करते हैं, तो एक दुष्टात्मा उन पर हमला करती है और वे नंगे और घायल भागते हैं। इससे लोग समझ जाते हैं कि यीशु का नाम कोई जादू की तिकड़म नहीं है, और वे उसकी बड़ाई करने लगते हैं। बहुत से लोग अपने बुरे काम मान लेते हैं और जादू-टोने की अपनी पोथियाँ जला देते हैं।

फिर एक बड़ा हुल्लड़ शुरू होता है। दिमेत्रियुस नाम का एक सुनार अरतिमिस देवी की चाँदी की मूरतें बनाकर पैसा कमाता था। वह डरता है कि पौलुस के प्रचार से उसका धंधा खत्म हो जाएगा। वह दूसरे कारीगरों को भड़काता है, और पूरा शहर चिल्ला उठता है, "इफिसियों की अरतिमिस, महान है!" भीड़ पौलुस के साथियों को खींच ले जाती है, पर पौलुस के दोस्त उसे भीड़ के बीच जाने नहीं देते। अंत में नगर का मंत्री लोगों को शांत करता है और कहता है कि यह मामला कचहरी में सुलझाया जाना चाहिए, दंगे में नहीं।

इसका अर्थ क्या है?

यह अध्याय दिखाता है कि सुसमाचार सच में लोगों की ज़िंदगी बदल देता है, और यह बदलाव कुछ लोगों को डराता भी है। जब लोग अपने बुरे काम छोड़ने लगते हैं और झूठे देवताओं की पूजा बंद करने लगते हैं, तो जिनका पैसा और ताकत झूठ पर टिकी है, वे परेशान हो जाते हैं। यह सोचने लायक बात है, क्या सच बताना कभी किसी को नुकसान पहुँचाता है? दिमेत्रियुस को सच से डर लगता है, क्योंकि सच उसके धंधे को खतरे में डालता है।

एक और गहरी बात भी यहाँ है। स्क्किवा के बेटे यीशु के नाम को एक जादुई शब्द की तरह इस्तेमाल करना चाहते थे, जैसे कोई मंत्र। पर दुष्टात्मा उन्हें ही पहचानने से इनकार कर देती है और कहती है, "तुम कौन हो?" इससे साफ पता चलता है कि यीशु का नाम किसी के पास होने की बात नहीं है, बल्कि उन पर विश्वास करने की बात है। नाम में ताकत तब है जब वह सच्चे विश्वास से जुड़ा हो, दिखावे से नहीं।

बड़ी कहानी से जोड़

यह अध्याय दिखाता है कि परमेश्वर का वचन कैसे आगे बढ़ता रहा, चाहे इफिसुस के लोग समझें या न समझें, चाहे विरोध हो या स्वागत। पवित्र आत्मा का उतरना उस चेलों पर याद दिलाता है कि परमेश्वर अपने वायदे को पूरा करते हैं, वे अपने लोगों के साथ रहते हैं और उन्हें अपनी शक्ति देते हैं। यीशु का नाम बड़ा है, इतना बड़ा कि झूठे देवता अरतिमिस की पूजा तक हिल जाती है। यह वही यीशु हैं जिनके बारे में पूरी बाइबल गवाही देती है, कि उनके नाम में उद्धार है, न कि किसी जादू में।

तुम्हारे लिए

कभी-कभी हम भी चाहते हैं कि यीशु का नाम एक "जादू का शब्द" बन जाए, जैसे प्रार्थना में बस नाम बोल देने से सब ठीक हो जाएगा। पर यह अध्याय याद दिलाता है कि यीशु को सच में जानना ज़रूरी है, न कि सिर्फ उनका नाम इस्तेमाल करना। जब तुम्हारी ज़िंदगी में कोई बदलाव आता है, चाहे वह छोटी सी बेईमानी छोड़ना हो या किसी पुरानी आदत को, यह ठीक वैसा ही है जैसे इफिसुस के लोगों ने अपनी पोथियाँ जलाई। सच्चा विश्वास कुछ छोड़ने की हिम्मत भी माँगता है।

बात करें

अगर यीशु का नाम कोई जादू का शब्द नहीं है, तो उनके नाम में सच में क्या ताकत है?

दिमेत्रियुस को सच से डर लगा क्योंकि उसका पैसा खतरे में था। क्या तुम्हारी ज़िंदगी में कभी ऐसा हुआ है कि सच मानना मुश्किल हो गया?

साथ में प्रार्थना

प्रभु यीशु, आपका नाम बहुत बड़ा है, इतना बड़ा कि कोई झूठ उसके सामने टिक नहीं सकता। हमें अपना पवित्र आत्मा दीजिए, जैसे आपने इफिसुस के चेलों को दिया। हमें सिखाइए कि हम आपको सच में जानें, न कि सिर्फ आपका नाम लें। आमीन।

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प्रेरितों के काम 19 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

प्रेरितों के काम 19 किस विषय में है?
पौलुस इफिसुस नाम के शहर में पहुँचता है और वहाँ कुछ चेलों से मिलता है। वह उनसे एक अजीब सवाल पूछता है, "क्या तुम ने विश्वास करते समय पवित्र आत्मा पाया?" वे कहते हैं कि उन्होंने पवित्र आत्मा के बारे में सुना भी नहीं। पता चलता है कि उन्होंने केवल यूहन्ना का बपतिस्मा लिया था, जो मन फिराने के लिए एक तैयारी थी, लेकिन वे नहीं जानते थे कि जिसकी यूहन्ना ने बात की थी, वह यीशु आ चुके हैं। पौलुस उन्हें यह समझाता है, और वे प्रभु यीशु के नाम से बपतिस्मा लेते हैं। जब पौलुस उन पर हाथ रखता है, तो पवित्र आत्मा उन पर उतरता है।
प्रेरितों के काम 19 क्या कहता है?
फिर एक बड़ा हुल्लड़ शुरू होता है। दिमेत्रियुस नाम का एक सुनार अरतिमिस देवी की चाँदी की मूरतें बनाकर पैसा कमाता था। वह डरता है कि पौलुस के प्रचार से उसका धंधा खत्म हो जाएगा। वह दूसरे कारीगरों को भड़काता है, और पूरा शहर चिल्ला उठता है, "इफिसियों की अरतिमिस, महान है!" भीड़ पौलुस के साथियों को खींच ले जाती है, पर पौलुस के दोस्त उसे भीड़ के बीच जाने नहीं देते। अंत में नगर का मंत्री लोगों को शांत करता है और कहता है कि यह मामला कचहरी में सुलझाया जाना चाहिए, दंगे में नहीं।
प्रेरितों के काम 19 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
एक और गहरी बात भी यहाँ है। स्क्किवा के बेटे यीशु के नाम को एक जादुई शब्द की तरह इस्तेमाल करना चाहते थे, जैसे कोई मंत्र। पर दुष्टात्मा उन्हें ही पहचानने से इनकार कर देती है और कहती है, "तुम कौन हो?" इससे साफ पता चलता है कि यीशु का नाम किसी के पास होने की बात नहीं है, बल्कि उन पर विश्वास करने की बात है। नाम में ताकत तब है जब वह सच्चे विश्वास से जुड़ा हो, दिखावे से नहीं।
बच्चे प्रेरितों के काम 19 से क्या सीख सकते हैं?
कभी-कभी हम भी चाहते हैं कि यीशु का नाम एक "जादू का शब्द" बन जाए, जैसे प्रार्थना में बस नाम बोल देने से सब ठीक हो जाएगा। पर यह अध्याय याद दिलाता है कि यीशु को सच में जानना ज़रूरी है, न कि सिर्फ उनका नाम इस्तेमाल करना। जब तुम्हारी ज़िंदगी में कोई बदलाव आता है, चाहे वह छोटी सी बेईमानी छोड़ना हो या किसी पुरानी आदत को, यह ठीक वैसा ही है जैसे इफिसुस के लोगों ने अपनी पोथियाँ जलाई। सच्चा विश्वास कुछ छोड़ने की हिम्मत भी माँगता है।
प्रेरितों के काम 19 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
दिमेत्रियुस को सच से डर लगा क्योंकि उसका पैसा खतरे में था। क्या तुम्हारी ज़िंदगी में कभी ऐसा हुआ है कि सच मानना मुश्किल हो गया?

दूसरों ने क्या पाया

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 39

परन्तु यदि तुम कोई और बात पूछना चाहते हो, तो नियमित सभा में उसका फैसला किया जाएगा।" इफिसुस की भीड़ दो घंटे तक चिल्लाती रही, और उनमें से बहुतों को यह भी पता न था कि वे इकट्ठे क्यों हुए हैं। फिर एक नगर अधिकारी शांत स्वर में कहता है, सही बात सही जगह पर तय होगी, शोर से नहीं। परमेश्वर ने अपनी कलीसिया की रक्षा एक ठंडे दिमाग वाले आदमी के ज़रिए की। तुम्हारे झगड़े में भी शायद ऊँची आवाज़ नहीं, ठहराव चाहिए।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 14

स्कीवा के सात बेटे यीशु का नाम एक जादुई मंत्र की तरह इस्तेमाल करना चाहते थे। उन्होंने पौलुस को देखा था, नाम सुना था, पर यीशु को जानते नहीं थे। दुष्ट आत्मा ने कहा, "यीशु को मैं जानती हूँ, और पौलुस को भी पहचानती हूँ, परन्तु तुम कौन हो?"

आज भी यही सवाल हमारे सामने खड़ा है। क्या यीशु का नाम हमारे लिए सिर्फ एक शब्द है, या एक रिश्ता? नाम दोहराना आसान है, पर उसे जानना, उसके साथ चलना, यही असली शक्ति है।

किसी अन्य आयु वर्ग की तलाश है?

हमारे पास छोटे बच्चों (3-6 वर्ष) और किशोरों (12 वर्ष और अधिक) के लिए विशेष संस्करण भी हैं।

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For parents and teachers: 7 से 12 वर्ष के उन बच्चों के लिए लिखा गया जो स्वयं पढ़ सकते हैं। पारिवारिक भक्ति और स्कूल में बाइबल पाठ के लिए उत्तम। This explanation is generated automatically by language models. While we strive for theological soundness, the software can make mistakes.

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