एज्रा 1
प्राथमिक आयु (7-12) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी
व्याख्या
फारस के राजा कुस्रू के राज्य के पहले वर्ष में कुछ अजीब हुआ। यहोवा ने इस विदेशी राजा का मन उभारा, यानी उसके दिल में एक विचार डाल दिया। यह इसलिए हुआ ताकि वह वचन पूरा हो जाए जो परमेश्वर ने बहुत पहले भविष्यवक्ता यिर्मयाह के मुँह से कहलवाया था। कुस्रू ने अपने पूरे राज्य में एक घोषणा करवाई: स्वर्ग के परमेश्वर यहोवा ने उसे आज्ञा दी है कि यरूशलेम में उनके लिए एक भवन बनाया जाए। कुस्रू ने कहा कि परमेश्वर के लोगों में से जो कोई चाहे, वह यरूशलेम जाकर यह मंदिर बना सकता है, और परमेश्वर उसके साथ रहे। जो लोग नहीं जाएँगे, वे भी मदद करें, चाँदी, सोना, पशु और भेंट देकर।
तब यहूदा और बिन्यामीन के घरानों के मुखिया, याजक और लेवी उठ खड़े हुए। उनका मन भी परमेश्वर ने उभारा था। आस-पास रहनेवालों ने उन्हें बहुमूल्य चीज़ें देकर सहायता की। और राजा कुस्रू ने वे पात्र भी लौटा दिए जो कभी राजा नबूकदनेस्सर यरूशलेम के मंदिर से लूटकर बाबेल ले गया था। सोने चाँदी के पाँच हज़ार चार सौ पात्र गिनकर शेशबस्सर के हाथों सौंपे गए, जो यहूदियों का प्रधान था। ये सब चीज़ें उसके साथ यरूशलेम वापस गईं।
इसका क्या मतलब है?
यह कहानी सत्तर साल के इंतज़ार के बाद आती है। परमेश्वर के लोग बंधुए के रूप में बाबेल में रह रहे थे, दूर अपने देश से, दूर मंदिर से जो तोड़ दिया गया था। और अचानक एक विदेशी राजा, जो यहोवा को जानता भी नहीं था जैसे इस्राएल जानता था, वही राजा घोषणा करता है कि मंदिर फिर से बनेगा। यह दिखाता है कि परमेश्वर सिर्फ अपने लोगों के दिलों में काम नहीं करते, वे राजाओं के दिलों में भी काम करते हैं, यहाँ तक कि उन राजाओं के दिलों में भी जो उन्हें ठीक से नहीं जानते। परमेश्वर की योजना किसी एक देश या एक राजा पर निर्भर नहीं है।
और यह भी ध्यान देने लायक है, यह वचन जो पूरा हुआ, वह बहुत पहले यिर्मयाह के द्वारा कहा गया था। परमेश्वर वादे भूलते नहीं। भले सत्तर साल बीत गए हों, भले लोग निराश हो गए हों, परमेश्वर का वचन अपने समय पर सच साबित होता है।
मुख्य सूत्र
परमेश्वर का यह वादा, कि वे अपने लोगों को वापस लाएँगे और मंदिर फिर से खड़ा करेंगे, बड़ी कहानी का एक हिस्सा है। यह मंदिर, जो फिर से बनने वाला था, वह जगह थी जहाँ परमेश्वर अपने लोगों के बीच रहते थे, जहाँ भेंट चढ़ाई जाती थी ताकि पाप का हल हो। लेकिन यह मंदिर पत्थर का था, यह फिर टूट जाएगा। बहुत बाद में यीशु मसीह आए, और उन्होंने अपने बारे में कहा कि वे स्वयं मंदिर हैं, वह जगह जहाँ परमेश्वर और मनुष्य मिलते हैं। जो काम पत्थर की इमारत पूरी तरह नहीं कर सकती थी, वह यीशु मसीह ने अपने शरीर में पूरा किया। कुस्रू का हृदय उभारा गया ताकि एक भवन बने, लेकिन परमेश्वर की असली योजना उससे कहीं बड़ी थी।
तुम्हारे लिए
कभी-कभी तुम्हें लगेगा कि परमेश्वर बहुत दूर हैं, या कि तुम्हारी प्रार्थना का जवाब कभी नहीं आएगा। यहूदियों को भी सत्तर साल इंतज़ार करना पड़ा। पर परमेश्वर काम कर रहे थे, तब भी जब कोई उसे देख नहीं पा रहा था, यहाँ तक कि एक विदेशी राजा के दिल में भी। जब तुम स्कूल में या घर में किसी ऐसे व्यक्ति से मिलते हो जो परमेश्वर पर विश्वास नहीं करता, याद रखना कि परमेश्वर उस व्यक्ति के दिल में भी काम कर सकते हैं, तुम्हारी सोच से कहीं ज़्यादा। और जब यहूदियों को बुलाया गया, तो उनमें से कुछ उठ खड़े हुए और गए, जबकि दूसरे पीछे रहकर मदद देते रहे। दोनों तरह से परमेश्वर की सेवा हो सकती है, चाहे तुम आगे बढ़कर कुछ करो या पीछे से सहायता दो।
बात करें
क्या तुम्हें लगता है कि परमेश्वर आज भी ऐसे लोगों के दिल में काम करते हैं जो उन्हें नहीं जानते? इसके बारे में क्या सोचते हो?
यहूदियों को सत्तर साल इंतज़ार करना पड़ा। क्या तुम्हें कभी परमेश्वर से किसी चीज़ के लिए लंबा इंतज़ार करना पड़ा है?
साथ मिलकर प्रार्थना करें
हे प्रभु, धन्यवाद कि आप अपने वादे नहीं भूलते, चाहे कितना भी समय लग जाए। धन्यवाद कि आप राजाओं और साधारण लोगों के दिलों में भी काम कर सकते हैं। हमारी मदद करें कि हम आप पर भरोसा रखें, तब भी जब इंतज़ार लंबा लगे। आमीन।
एज्रा 1 के बारे में प्रश्न
पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।
एज्रा 1 किस विषय में है?
एज्रा 1 क्या कहता है?
एज्रा 1 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
बच्चे एज्रा 1 से क्या सीख सकते हैं?
एज्रा 1 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
दूसरों ने क्या पाया
जो लौटकर नहीं जा रहे थे, उन्होंने ही जानेवालों के हाथ मजबूत किए। "उनके आस-पास के सब रहनेवालों ने... उनकी सहायता की।" चाँदी, सोना, पशु, सब कुछ ऐसे लोगों के हाथ में जो शायद फिर कभी न दिखें। परमेश्वर का काम अकेले बुलाए हुए लोग नहीं करते, पीछे रहनेवाले देनेवाले भी करते हैं। तेरा हिस्सा शायद जाना नहीं, थामना है।
सब लोग यरूशलेम नहीं लौटे। कुछ बाबेल में ही रह गए। पर कुस्रू का आदेश उन्हें भुलाता नहीं: "उस स्थान के मनुष्य चाँदी, सोना, धन और पशु देकर उसकी सहायता करें।" जो जा नहीं सकता, वह देकर साथ चल सकता है। परमेश्वर का भवन उन हाथों से भी बनता है जो कभी उसकी दीवार को छूते नहीं। तू आज किसके कदमों को अपनी भेंट से मजबूत कर रहा है?
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