6 से 12 वर्ष के बच्चे के लिए

होशे 10

प्राथमिक आयु (6 से 12 वर्ष) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

व्याख्या

होशे नबी इस्राएल की तुलना एक दाखलता से करते हैं, यानी एक ऐसी बेल से जिसमें खूब फल लगते हैं। जैसे-जैसे इस्राएल समृद्ध होता गया, वैसे-वैसे लोगों ने और भी वेदियाँ और सुन्दर खम्भे बनाए, पर यहोवा के लिए नहीं, बल्कि झूठे देवताओं की पूजा के लिए। उनका मन बँटा हुआ था, आधा परमेश्वर की ओर, आधा मूर्तियों की ओर। इसलिए अब वे दोषी ठहरेंगे।

लोग झूठी शपथें खाकर वाचा बाँधते थे, यानी वादे करते थे जिन्हें निभाने का उनका इरादा ही नहीं था। बेतावेन का बछड़ा, जिसे सामरिया के लोग पूजते थे, एक सोने की मूर्ति थी। जब वह मूर्ति अश्शूर देश में भेंट के रूप में भेज दी जाएगी, तो जिन लोगों ने उस पर भरोसा रखा था, वे शर्मिंदा होंगे और विलाप करेंगे। सामरिया का राजा पानी के बुलबुले जैसा मिट जाएगा, अभी है, अभी नहीं।

होशे याद दिलाते हैं कि इस्राएल बहुत पुराने समय से, गिबा के दिनों से ही पाप करता आया है। परमेश्वर कहते हैं कि सही समय पर वे इस्राएल को ताड़ना देंगे, यानी सुधारने के लिए सजा देंगे, और दूसरे देश उनके विरुद्ध इकट्ठे होंगे।

फिर एक चित्र आता है जो समझना आसान है। एप्रैम एक सीखी हुई बछिया जैसा है, जिसे अनाज दाँवना यानी गाहना पसन्द है, क्योंकि उस काम में उसका मुँह बँधा नहीं होता और वह चलते-चलते खाती जाती है। पर अब परमेश्वर उसकी गर्दन पर जूआ रखेंगे, भारी काम का बोझ, क्योंकि अब केवल मनपसन्द काम नहीं, बल्कि सच्ची मेहनत और आज्ञाकारिता का समय है।

अंत में परमेश्वर एक निमंत्रण देते हैं, धार्मिकता का बीज बोओ, यानी सही तरीके से जीना शुरू करो, तो करुणा की फसल काटोगे। पर इस्राएल ने इसके बजाय दुष्टता बोई और धोखे का फल खाया। उन्होंने अपनी सेना और अपने बल पर भरोसा रखा, परमेश्वर पर नहीं। इसलिए युद्ध और विनाश आएगा, जैसा बेतर्बेल नगर के साथ हुआ था।

इसका क्या मतलब है?

यह अध्याय बहुत सीधी बात कहता है। जब दिल बँटा हुआ हो, आधा परमेश्वर के लिए, आधा किसी और चीज़ के लिए, तब जीवन टूटने लगता है। इस्राएल ने परमेश्वर की आशीष तो ली, पर उस आशीष का धन्यवाद किसी और को दिया। यह ऐसा है जैसे कोई तुम्हें उपहार दे, और तुम वह उपहार दिखाकर कहो कि यह किसी और ने दिया।

होशे यह भी दिखाते हैं कि भरोसा बहुत मायने रखता है। इस्राएल ने अपने किले, अपनी सेना, अपने वीरों पर भरोसा रखा। यह गलत नहीं है कि तैयारी करो, पर जब भरोसा परमेश्वर की जगह ले लेता है, तब वह भरोसा धोखा दे देता है।

समानांतर सूत्र

यह अध्याय कठोर लगता है, और है भी। परमेश्वर यहाँ गुस्से में नहीं बल्कि दुखी मन से बोल रहे हैं, क्योंकि उन्होंने इस्राएल से एक वाचा बाँधी थी, एक गहरा वादा, कि वे उनके परमेश्वर रहेंगे और इस्राएल उनकी प्रजा। पर प्रजा ने वह वाचा तोड़ी। फिर भी परमेश्वर कहते हैं, "अभी यहोवा के पीछे हो लेने का समय है", यानी रास्ता अभी बंद नहीं हुआ है।

यीशु मसीह ने बाद में यही बात अपने ऊपर ले ली। जहाँ इस्राएल ने जूआ उठाने से इनकार किया, वहाँ यीशु ने कहा, "मेरा जूआ अपने ऊपर उठा लो, क्योंकि मेरा जूआ सहज है।" जो बोझ इस्राएल ने अपनी बेवफाई से कमाया, वह बोझ यीशु ने क्रूस पर खुद उठाया।

तुम्हारे लिए

क्या कभी तुम्हारा मन भी बँटा हुआ महसूस होता है? एक तरफ परमेश्वर की बात मानने का मन, दूसरी तरफ कोई और चीज़ जो ज्यादा आकर्षक लगती है, शायद मोबाइल, शायद दोस्तों का दबाव, शायद अपनी ही इच्छा। यह अध्याय पूछता है कि आज तुम किस पर भरोसा बो रहे हो। जो बीज आज बोया जाता है, वही फसल कल काटी जाती है।

चर्चा करें

इस्राएल का मन "बँटा हुआ" था। तुम्हारे जीवन में परमेश्वर और किस चीज़ के बीच कभी खींचतान होती है?

होशे कहते हैं कि अभी भी "यहोवा के पीछे हो लेने का समय है"। इससे क्या पता चलता है परमेश्वर के स्वभाव के बारे में?

साथ में प्रार्थना

हे प्रभु, हमारा मन कभी-कभी बँटा हुआ रहता है। हमें ईमानदार दिल दीजिए जो पूरी तरह से आपकी ओर हो। धन्यवाद कि आपने यीशु मसीह में हमारे लिए वह बोझ उठाया जो हम खुद नहीं उठा सकते थे। हमें सिखाइए कि सही बीज कैसे बोएँ। आमीन।

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अन्य माता पिता या शिक्षकों के लिए, जिन्हें यह उपयोगी लग सकता है।

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होशे 10 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

होशे 10 किस विषय में है?
होशे नबी इस्राएल की तुलना एक दाखलता से करते हैं, यानी एक ऐसी बेल से जिसमें खूब फल लगते हैं। जैसे-जैसे इस्राएल समृद्ध होता गया, वैसे-वैसे लोगों ने और भी वेदियाँ और सुन्दर खम्भे बनाए, पर यहोवा के लिए नहीं, बल्कि झूठे देवताओं की पूजा के लिए। उनका मन बँटा हुआ था, आधा परमेश्वर की ओर, आधा मूर्तियों की ओर। इसलिए अब वे दोषी ठहरेंगे।
होशे 10 क्या कहता है?
फिर एक चित्र आता है जो समझना आसान है। एप्रैम एक सीखी हुई बछिया जैसा है, जिसे अनाज दाँवना यानी गाहना पसन्द है, क्योंकि उस काम में उसका मुँह बँधा नहीं होता और वह चलते-चलते खाती जाती है। पर अब परमेश्वर उसकी गर्दन पर जूआ रखेंगे, भारी काम का बोझ, क्योंकि अब केवल मनपसन्द काम नहीं, बल्कि सच्ची मेहनत और आज्ञाकारिता का समय है।
होशे 10 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
होशे यह भी दिखाते हैं कि भरोसा बहुत मायने रखता है। इस्राएल ने अपने किले, अपनी सेना, अपने वीरों पर भरोसा रखा। यह गलत नहीं है कि तैयारी करो, पर जब भरोसा परमेश्वर की जगह ले लेता है, तब वह भरोसा धोखा दे देता है।
बच्चे होशे 10 से क्या सीख सकते हैं?
क्या कभी तुम्हारा मन भी बँटा हुआ महसूस होता है? एक तरफ परमेश्वर की बात मानने का मन, दूसरी तरफ कोई और चीज़ जो ज्यादा आकर्षक लगती है, शायद मोबाइल, शायद दोस्तों का दबाव, शायद अपनी ही इच्छा। यह अध्याय पूछता है कि आज तुम किस पर भरोसा बो रहे हो। जो बीज आज बोया जाता है, वही फसल कल काटी जाती है।
होशे 10 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
हे प्रभु, हमारा मन कभी-कभी बँटा हुआ रहता है। हमें ईमानदार दिल दीजिए जो पूरी तरह से आपकी ओर हो। धन्यवाद कि आपने यीशु मसीह में हमारे लिए वह बोझ उठाया जो हम खुद नहीं उठा सकते थे। हमें सिखाइए कि सही बीज कैसे बोएँ। आमीन।

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