7 से 12 वर्ष के बच्चे के लिए

होशे 4

प्राथमिक आयु (7-12) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

व्याख्या

होशे परमेश्वर का एक भविष्यद्वक्ता था। वह इस्राएल के उत्तरी हिस्से में रहता था, एक ऐसे समय में जब देश बाहर से देखने पर ठीक-ठाक चल रहा था। मंदिर में बलिदान चढ़ते थे, याजक अपना काम करते थे, फसल आती थी। लेकिन होशे को परमेश्वर की तरफ से एक ऐसा संदेश मिला जो किसी को सुनना पसंद नहीं था।

अध्याय चार एक अदालत की तरह शुरू होता है। "इस देश के निवासियों के साथ यहोवा का मुकद्दमा है।" परमेश्वर मुकद्दमा दायर कर रहे हैं, और वे तीन चीज़ें गिनते हैं जो देश में नहीं मिलतीं: सच्चाई नहीं, करुणा नहीं, और परमेश्वर का ज्ञान नहीं। इसकी जगह क्या है? श्राप देना, झूठ बोलना, मार डालना, चोरी करना, और विवाह का वादा तोड़ना। होशे लिखता है: "खून ही खून होता रहता है।"

और फिर कुछ अजीब बात होती है। परमेश्वर कहते हैं कि इसका असर सिर्फ़ लोगों पर नहीं पड़ेगा। ज़मीन विलाप करेगी। मैदान के जानवर, आकाश के पक्षी, समुद्र की मछलियाँ तक कुम्हला जाएँगी। लोगों का पाप मानो पूरी सृष्टि में रिसकर फैल जाता है।

सबसे तीखी बात याजकों के लिए है। याजकों का काम था लोगों को परमेश्वर के बारे में सिखाना। लेकिन वे भूल गए। पद 6 में परमेश्वर कहते हैं: "मेरे ज्ञान के न होने से मेरी प्रजा नाश हो गई।" याजक तो खुश थे, क्योंकि जितना लोग पाप करते, उतने ही ज़्यादा पापबलि आते, और उन बलियों का मांस याजक खाते थे। उनका पेट लोगों के पापों से भरता था।

लोग भी परमेश्वर को छोड़कर लकड़ी की मूरतों से सवाल पूछने लगे थे। छड़ी फेंककर भविष्य जानने की कोशिश। पहाड़ों की चोटियों पर, बांज और चिनार के पेड़ों की ठंडी छाया में, वे दूसरे देवताओं के लिए धूप जलाते थे। होशे इसे एक कठोर शब्द से बुलाता है: बेवफ़ाई। जैसे कोई अपने जीवनसाथी से किया वादा तोड़ दे, वैसे ही इस्राएल ने परमेश्वर से किया वादा तोड़ दिया। अंत में एक डरावना चित्र आता है: "आँधी उनको अपने पंखों में बाँधकर उड़ा ले जाएगी।"

इसका अर्थ क्या है?

पद 6 का वह वाक्य ध्यान से पढ़ो। परमेश्वर यह नहीं कहते कि लोग बहुत मूर्ख थे। वे कहते हैं: "तूने मेरे ज्ञान को तुच्छ जाना है।" यानी उन्होंने जानने की परवाह ही नहीं की।

परमेश्वर को जानना किसी परीक्षा के जवाब याद करने जैसा नहीं है। यह किसी व्यक्ति को जानने जैसा है। तुम अपने सबसे अच्छे दोस्त को जानते हो, उसकी हँसी, उसका गुस्सा, वह क्या पसंद करता है। परमेश्वर चाहते हैं कि उनके लोग उन्हें इस तरह जानें। और जब यह जानना खत्म हो जाता है, तो सच्चाई और करुणा भी खत्म हो जाती है। ये तीनों एक साथ चलते हैं।

यहाँ एक बात है जो मुझे भी पूरी तरह समझ नहीं आती: जानवर और मछलियाँ क्यों भुगतें, जब गलती इंसानों की है? होशे इसका जवाब नहीं देता। वह सिर्फ़ यह दिखाता है कि हमारा गलत करना दुनिया में अकेला नहीं रहता। यह फैलता है, दूर तक, उन तक भी जिनका कोई दोष नहीं।

जोड़ने वाला सूत्र

परमेश्वर ने इस्राएल के साथ एक वाचा बाँधी थी। वाचा का मतलब है एक पक्का रिश्ता, दोनों तरफ़ से वादे के साथ। परमेश्वर ने कहा था: मैं तुम्हारा परमेश्वर रहूँगा। इस्राएल ने कहा था: हम आपके लोग रहेंगे। होशे 4 दिखाता है कि लोगों ने अपना हिस्सा तोड़ दिया।

पद 16 में परमेश्वर एक सवाल पूछते हैं: क्या मैं इस हठीली बछिया को अब भी भेड़ के बच्चे की तरह खुले चरागाह में चराऊँगा? वहाँ जवाब नहीं दिया गया। लेकिन बहुत साल बाद यीशु मसीह आए और कहा: मैं अच्छा चरवाहा हूँ। जो याजक नाकाम हुए, वह काम यीशु ने पूरा किया। वे परमेश्वर पिता को पूरी तरह जानते हैं, और वे हमें बताते हैं कि पिता कैसे हैं। जो सच्चाई और करुणा इस्राएल में नहीं मिली, वह यीशु में मिलती है। और आँधी जो उड़ा ले जाने वाली थी, उसे उन्होंने अपने ऊपर ले लिया।

तुम्हारे लिए

तुम इस उम्र में हो जहाँ सवाल आने लगते हैं। क्या परमेश्वर सच में हैं? क्या यह सब मायने रखता है? होशे 4 पढ़कर एक बात साफ़ है: सवाल पूछना कोई पाप नहीं है। परवाह न करना खतरनाक है। परमेश्वर के लोग इसलिए नहीं गिरे कि उनके पास सवाल थे, बल्कि इसलिए कि उन्होंने पूछना बंद कर दिया।

तो पूछते रहो। बाइबल खोलो, चाहे थोड़ी सी। किसी बड़े से वह सवाल पूछो जो तुम्हारे मन में अटका है।

और वह हठीली बछिया याद रखो। कभी-कभी तुम अंदर से जानते हो कि कोई बात गलत है, वह झूठ, वह ताना, वह चीज़ जो तुमने चुपचाप ले ली, फिर भी तुम अपनी दिशा में खिंचते जाते हो। उस पल में रुक जाना, यही परमेश्वर की ओर मुड़ना है। और वे इंतज़ार कर रहे हैं।

इस पर बात करो

परमेश्वर को "जानना" और उनके बारे में "जानकारी रखना", इन दोनों में तुम्हें क्या फ़र्क लगता है?

होशे कहता है कि लोगों के पाप का असर ज़मीन और जानवरों पर भी पड़ा। तुम्हें ऐसा कोई उदाहरण दिखता है जहाँ किसी की गलती का असर बहुत दूर तक फैला हो?

मिलकर प्रार्थना

परमेश्वर, हम आपको सिर्फ़ नाम से नहीं, सच में जानना चाहते हैं। जब हम अपनी ही ज़िद में खिंचते जाएँ, तो हमें रोक लीजिए। हमें सच्चाई और करुणा सिखाइए, जैसी यीशु मसीह में है। आमीन।

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होशे 4 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

होशे 4 किस विषय में है?
होशे परमेश्वर का एक भविष्यद्वक्ता था। वह इस्राएल के उत्तरी हिस्से में रहता था, एक ऐसे समय में जब देश बाहर से देखने पर ठीक-ठाक चल रहा था। मंदिर में बलिदान चढ़ते थे, याजक अपना काम करते थे, फसल आती थी। लेकिन होशे को परमेश्वर की तरफ से एक ऐसा संदेश मिला जो किसी को सुनना पसंद नहीं था।
होशे 4 क्या कहता है?
सबसे तीखी बात याजकों के लिए है। याजकों का काम था लोगों को परमेश्वर के बारे में सिखाना। लेकिन वे भूल गए। पद 6 में परमेश्वर कहते हैं: "मेरे ज्ञान के न होने से मेरी प्रजा नाश हो गई।" याजक तो खुश थे, क्योंकि जितना लोग पाप करते, उतने ही ज़्यादा पापबलि आते, और उन बलियों का मांस याजक खाते थे। उनका पेट लोगों के पापों से भरता था।
होशे 4 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
परमेश्वर को जानना किसी परीक्षा के जवाब याद करने जैसा नहीं है। यह किसी व्यक्ति को जानने जैसा है। तुम अपने सबसे अच्छे दोस्त को जानते हो, उसकी हँसी, उसका गुस्सा, वह क्या पसंद करता है। परमेश्वर चाहते हैं कि उनके लोग उन्हें इस तरह जानें। और जब यह जानना खत्म हो जाता है, तो सच्चाई और करुणा भी खत्म हो जाती है। ये तीनों एक साथ चलते हैं।
बच्चे होशे 4 से क्या सीख सकते हैं?
पद 16 में परमेश्वर एक सवाल पूछते हैं: क्या मैं इस हठीली बछिया को अब भी भेड़ के बच्चे की तरह खुले चरागाह में चराऊँगा? वहाँ जवाब नहीं दिया गया। लेकिन बहुत साल बाद यीशु मसीह आए और कहा: मैं अच्छा चरवाहा हूँ। जो याजक नाकाम हुए, वह काम यीशु ने पूरा किया। वे परमेश्वर पिता को पूरी तरह जानते हैं, और वे हमें बताते हैं कि पिता कैसे हैं। जो सच्चाई और करुणा इस्राएल में नहीं मिली, वह यीशु में मिलती है। और आँधी जो उड़ा ले जाने वाली थी, उसे उन्होंने अपने ऊपर ले लिया।
होशे 4 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
और वह हठीली बछिया याद रखो। कभी-कभी तुम अंदर से जानते हो कि कोई बात गलत है, वह झूठ, वह ताना, वह चीज़ जो तुमने चुपचाप ले ली, फिर भी तुम अपनी दिशा में खिंचते जाते हो। उस पल में रुक जाना, यही परमेश्वर की ओर मुड़ना है। और वे इंतज़ार कर रहे हैं।

दूसरों ने क्या पाया

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 2

होशे 4:1 में पहले यह कहा गया कि देश में न सच्चाई है, न करुणा, न परमेश्वर का ज्ञान। उसके बाद ही सूची आती है: श्राप देना, झूठ, हत्या, चोरी, व्यभिचार। ध्यान दे, पाप अचानक नहीं फूटता। पहले भीतर परमेश्वर की पहचान धुंधली पड़ती है, फिर हाथ बिगड़ते हैं। आज खुद से पूछ: उसे जानना मेरे लिए कितना ताज़ा है?

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For parents and teachers: 7 से 12 वर्ष के उन बच्चों के लिए लिखा गया जो स्वयं पढ़ सकते हैं। पारिवारिक भक्ति और स्कूल में बाइबल पाठ के लिए उत्तम। This explanation is generated automatically by language models. While we strive for theological soundness, the software can make mistakes.

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