यूहन्ना 4
प्राथमिक आयु (7-12) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी
व्याख्या
यीशु यहूदिया से गलील जा रहे थे, और रास्ता सामरिया से होकर जाता था। यहूदी लोग आम तौर पर सामरिया से बचकर निकलते थे, क्योंकि यहूदी और सामरी लोग एक-दूसरे को नीची नज़र से देखते थे। पर यीशु सूखार नगर के पास याकूब के कुएँ पर रुक गए। दोपहर का समय था, वे यात्रा से थके हुए थे। तभी एक सामरी स्त्री पानी भरने आई। यीशु ने उससे पानी माँगा। स्त्री चौंक गई, क्योंकि एक यहूदी पुरुष का सामरी स्त्री से बात करना असामान्य था। यीशु ने उससे "जीवन के जल" की बात की, जो एक बार पीने से हमेशा के लिए तृप्त कर देता है। स्त्री समझ नहीं पाई, पर बातचीत आगे बढ़ी। यीशु ने बिना उसे कुछ बताए ही उसके जीवन की सच्चाई कह दी, उसके पाँच पति हो चुके थे, और जिसके साथ वह अब रहती थी वह भी उसका पति नहीं था। स्त्री को समझ आया कि यह कोई भविष्यवक्ता है, और अंत में यीशु ने खुद कहा, "मैं जो तुझ से बोल रहा हूँ, वही हूँ," यानी वे स्वयं वही मसीह हैं जिनकी वह प्रतीक्षा कर रही थी। स्त्री अपना घड़ा वहीं छोड़कर नगर में दौड़ी और लोगों को बताया। बहुत से सामरियों ने उसकी बात सुनकर और फिर स्वयं यीशु से मिलकर उन पर विश्वास किया। इसके बाद यीशु ने अपने चेलों से कहा कि उनका भोजन है परमेश्वर की इच्छा पूरी करना, और खेत कटनी के लिए तैयार हैं। अध्याय के अंत में यीशु गलील के काना पहुँचे, जहाँ एक राजकर्मचारी का बेटा बीमार था। यीशु ने बिना उसके घर जाए ही कहा, "जा, तेरा पुत्र जीवित है।" और ठीक उसी घड़ी लड़का ठीक हो गया।
इसका क्या अर्थ है?
यह अध्याय दिखाता है कि यीशु उन लोगों के पास भी जाते हैं जिनसे बाकी सब दूर रहते हैं। एक सामरी स्त्री, जिसका जीवन टूटा हुआ था, जिसे शायद नगर में लोग नीची नज़र से देखते थे, उसी से यीशु सबसे गहरी बातें करते हैं। वे उसकी गलतियाँ जानते हैं, फिर भी उसे दूर नहीं धकेलते। यह "जीवन का जल" कोई जादू की चीज़ नहीं है, यह खुद परमेश्वर के साथ का रिश्ता है, जो अंदर से तृप्त करता है। और दूसरी घटना दिखाती है कि यीशु के शब्द दूर से भी काम करते हैं, उन्हें वहाँ जाने की भी ज़रूरत नहीं पड़ती। दोनों घटनाएँ एक ही बात कहती हैं, यीशु के पास सच्चाई और शक्ति दोनों हैं।
बड़ी कहानी की कड़ी
परमेश्वर ने हमेशा चाहा है कि लोग उनसे मिलें और उन्हें जानें, यही उनका वादा या "प्रतिज्ञा" रही है। यीशु उस स्त्री से कहते हैं कि सच्ची आराधना किसी खास पहाड़ या मंदिर से बंधी नहीं है, बल्कि आत्मा और सच्चाई में होती है। यह बड़ी बात है, इसका मतलब है कि परमेश्वर हर जगह मिल सकते हैं, जहाँ भी दिल सच्चा हो। स्त्री ने कहा था कि मसीह आएगा और सब कुछ बताएगा, यीशु ने कहा, वह मसीह मैं ही हूँ। पूरी बाइबल की कहानी इसी ओर बढ़ रही है, परमेश्वर अपने वादे के मुताबिक मसीह भेजते हैं, और वह मसीह ठीक उन लोगों के पास आता है जिनकी किसी को परवाह नहीं।
तुम्हारे लिए
कभी-कभी हम सोचते हैं कि परमेश्वर को हमारी गलतियाँ पता चल जाएँ तो वे हमसे दूर हो जाएँगे। इस स्त्री की कहानी कुछ और कहती है। यीशु सब जानते थे, फिर भी उससे बात की और उसे सबसे पहले सुसमाचार सुनाया। यह तुम्हें भी हिम्मत दे सकता है कि परमेश्वर के सामने अपने बारे में सच बोलना डरने की बात नहीं है। और जैसे उस स्त्री ने अपना घड़ा छोड़कर दूसरों को बताया, वैसे ही तुम भी अपने दोस्तों को बता सकते हो जो तुमने यीशु के बारे में जाना है, बिना यह दिखाए कि तुम खुद बहुत अच्छे हो।
आपस में बात करें
अगर यीशु तुम्हारे पास बैठकर तुम्हारे जीवन की सच्चाई कह देते, जैसे उन्होंने उस स्त्री से कही, तो तुम्हें कैसा लगता?
यीशु कहते हैं कि सच्ची आराधना जगह से नहीं, दिल की सच्चाई से होती है, तुम्हारे हिसाब से इसका मतलब क्या है?
साथ में प्रार्थना करें
प्रभु यीशु, आप उस स्त्री के पास गए जिसे कोई नहीं चाहता था, और आपने उसे अपनाया। हमें भी यह विश्वास दीजिए कि आप हमें पूरी तरह जानते हुए भी प्यार करते हैं। हमारे दिल को सच्चा बना दीजिए, ताकि हम आपकी आराधना आत्मा और सच्चाई से कर सकें। आमीन।
यूहन्ना 4 के बारे में प्रश्न
पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।
यूहन्ना 4 किस विषय में है?
यूहन्ना 4 क्या कहता है?
यूहन्ना 4 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
बच्चे यूहन्ना 4 से क्या सीख सकते हैं?
यूहन्ना 4 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
दूसरों ने क्या पाया
यीशु मार्ग चलने से थक गया था, और इसलिए उस कुएँ पर बैठ गया।" जो थकों को बल देता है, वही धूल भरे रास्ते पर थककर बैठ गया। और ठीक उसी थकान की घड़ी में एक स्त्री का जीवन बदल गया। तेरी कमजोरी परमेश्वर के काम में रुकावट नहीं है। कई बार वही जगह होती है जहाँ वह किसी से मिलने बैठता है।
स्त्री कहती है, "हमारे पूर्वजों ने इसी पहाड़ पर आराधना की, और तुम कहते हो कि वह स्थान जहाँ आराधना करना चाहिए यरूशलेम में है।" अभी-अभी यीशु ने उसके पतियों की बात छेड़ी थी, और वह तुरंत धर्म की बहस पर मुड़ गई। हम भी यही करते हैं। जब बात दिल के करीब आती है, हम सिद्धांत की ओट में छिप जाते हैं। पर यीशु उसे छोड़ते नहीं। वह बहस से होते हुए भी उसके भीतर तक पहुँच जाते हैं।
सामरिया के अजनबियों ने दो ही दिन में कह दिया, "यह सचमुच जगत का उद्धारकर्ता है", और उसी समय यीशु जानते थे, "भविष्यद्वक्ता का अपने देश में आदर नहीं होता।" जो सबसे पास रहते हैं, वही अकसर सबसे देर से पहचानते हैं। तेरे घर में, तेरी कलीसिया में कोई ऐसा तो नहीं, जिसे तू बचपन से जानने के कारण हल्का समझ बैठा है?
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