7 से 12 वर्ष के बच्चे के लिए

यहोशू 18

प्राथमिक आयु (7-12) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

व्याख्या

इस्राएल के लोग बहुत लंबे समय से लड़ रहे थे। अब युद्ध लगभग समाप्त हो गया था। सारी मण्डली शीलो नाम की जगह पर इकट्ठी हुई। वहाँ उन्होंने मिलापवाला तम्बू खड़ा किया, वह जगह जहाँ परमेश्वर अपने लोगों से मिलते थे।

पर एक समस्या थी। इस्राएल के बारह गोत्रों में से सात गोत्रों को अब तक अपना-अपना हिस्सा नहीं मिला था। जमीन उनके सामने थी, परमेश्वर ने वह उन्हें देने का वादा किया था, फिर भी वे वहाँ खड़े रहे और कुछ नहीं कर रहे थे।

यहोशू ने उनसे एक सीधा सवाल पूछा, "जो देश तुम्हारे परमेश्वर यहोवा ने तुम्हें दिया है, उसे अपने अधिकार में कर लेने में तुम कब तक ढिलाई करते रहोगे?" यह सुनकर शायद कुछ लोग एक दूसरे का मुँह देखने लगे होंगे। उन्हें शर्म आई होगी, क्योंकि यहोशू सच कह रहा था। वे सुस्त पड़ गए थे।

यहोशू ने फिर एक योजना बनाई। उसने हर गोत्र में से तीन आदमी चुने। कुल इक्कीस आदमी। उनका काम था देश में घूमना, हर जगह को ध्यान से देखना, और जो देखा उसे लिख लेना। सोचो, ये आदमी पहाड़ों पर चढ़े होंगे, नदियाँ पार की होंगी, और रास्ते में शायद जंगली जानवर भी देखे होंगे। उन्होंने देश को सात भागों में बाँटकर एक किताब में लिख दिया।

जब वे लौटे, तो यहोशू ने शीलो में, यहोवा के सामने, चिट्ठी डाली। चिट्ठी डालना मतलब परमेश्वर से पूछना, "कौन सा भाग किसको मिले?" यह कोई जुआ नहीं था, यह परमेश्वर पर भरोसा करने का तरीका था।

बिन्यामीन के गोत्र की चिट्ठी निकली। उनका भाग यहूदा और यूसुफ के गोत्रों के बीच में पड़ा, मानो दो बड़े भाइयों के बीच एक छोटा भाई खड़ा हो। उनकी सीमा यरदन नदी से शुरू होकर यरीहो, बेतेल, गिबोन, और यबूस नाम के शहर तक फैली थी। हाँ, वही यबूस, जिसे बाद में यरूशलेम कहा गया। बिन्यामीन को छब्बीस शहर और उनके गाँव मिले।

इसका क्या मतलब है?

यह कहानी हमें दिखाती है कि परमेश्वर का वादा और इंसान की मेहनत साथ-साथ चलते हैं। परमेश्वर ने जमीन देने का वादा पहले ही कर दिया था। पर इस्राएल को उठकर चलना पड़ा, नापना पड़ा, और उस पर कदम रखना पड़ा। वादा मिल जाने के बाद भी आलस्य में बैठे रहना गलत था।

यहोशू का सवाल आज भी हमारे कानों में गूँजता है। कभी-कभी हमें भी पता होता है कि परमेश्वर ने क्या करने को कहा है, फिर भी हम देर करते रहते हैं।

समानांतर सूत्र

बाइबल की पूरी कहानी में परमेश्वर अपने लोगों को वह देते हैं जो उसने वादा किया है, पर वे चाहते हैं कि उनके लोग विश्वास के साथ आगे बढ़ें। बहुत बाद में, यीशु मसीह ने भी अपने चेलों से कहा कि जाओ, आगे बढ़ो, डरो मत। बिन्यामीन के भाग में वह शहर भी था जो आगे चलकर यरूशलेम बना, वही शहर जहाँ यीशु मसीह ने अपनी जान दी। परमेश्वर की योजना छोटी-छोटी जगहों से होकर बड़ी बातों तक पहुँचती है।

तुम्हारे लिए

क्या कभी तुम्हें पता होता है कि क्या करना सही है, पर तुम टालते रहते हो? जैसे अपना कमरा साफ करना, या किसी से माफी माँगना, या किसी दोस्त की मदद करना। यहोशू की तरह परमेश्वर आज तुमसे भी पूछते हैं, "तुम कब तक देर करते रहोगे?" आज ही वह एक काम कर लो जो तुम टाल रहे हो।

बात करें

अगर परमेश्वर ने तुम्हें कुछ देने का वादा किया है, तो क्या तुम्हें सिर्फ इंतज़ार करना चाहिए, या कुछ करना भी चाहिए?

सात गोत्रों ने अपना भाग लेने में देर क्यों की होगी? तुम कब आलस में देर करते हो?

संग साथ प्रार्थना

प्रभु, आप हमें अच्छी बातें देने का वादा करते हैं, फिर भी हम कभी-कभी आलस में बैठे रहते हैं। हमें हिम्मत दीजिए कि जो आप हमें करने को कहें, हम उसे आज ही करें। हमारी मदद कीजिए कि हम आप पर भरोसा रखें और आगे बढ़ें। आमीन।

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यहोशू 18 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

यहोशू 18 किस विषय में है?
इस्राएल के लोग बहुत लंबे समय से लड़ रहे थे। अब युद्ध लगभग समाप्त हो गया था। सारी मण्डली शीलो नाम की जगह पर इकट्ठी हुई। वहाँ उन्होंने मिलापवाला तम्बू खड़ा किया, वह जगह जहाँ परमेश्वर अपने लोगों से मिलते थे।
यहोशू 18 क्या कहता है?
यहोशू ने फिर एक योजना बनाई। उसने हर गोत्र में से तीन आदमी चुने। कुल इक्कीस आदमी। उनका काम था देश में घूमना, हर जगह को ध्यान से देखना, और जो देखा उसे लिख लेना। सोचो, ये आदमी पहाड़ों पर चढ़े होंगे, नदियाँ पार की होंगी, और रास्ते में शायद जंगली जानवर भी देखे होंगे। उन्होंने देश को सात भागों में बाँटकर एक किताब में लिख दिया।
यहोशू 18 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
यह कहानी हमें दिखाती है कि परमेश्वर का वादा और इंसान की मेहनत साथ-साथ चलते हैं। परमेश्वर ने जमीन देने का वादा पहले ही कर दिया था। पर इस्राएल को उठकर चलना पड़ा, नापना पड़ा, और उस पर कदम रखना पड़ा। वादा मिल जाने के बाद भी आलस्य में बैठे रहना गलत था।
बच्चे यहोशू 18 से क्या सीख सकते हैं?
क्या कभी तुम्हें पता होता है कि क्या करना सही है, पर तुम टालते रहते हो? जैसे अपना कमरा साफ करना, या किसी से माफी माँगना, या किसी दोस्त की मदद करना। यहोशू की तरह परमेश्वर आज तुमसे भी पूछते हैं, "तुम कब तक देर करते रहोगे?" आज ही वह एक काम कर लो जो तुम टाल रहे हो।
यहोशू 18 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
प्रभु, आप हमें अच्छी बातें देने का वादा करते हैं, फिर भी हम कभी-कभी आलस में बैठे रहते हैं। हमें हिम्मत दीजिए कि जो आप हमें करने को कहें, हम उसे आज ही करें। हमारी मदद कीजिए कि हम आप पर भरोसा रखें और आगे बढ़ें। आमीन।

दूसरों ने क्या पाया

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 12

बिन्यामीन के हिस्से की सीमा यरीहो के पास से होकर जाती है, उसी यरीहो के पास जहाँ कभी दीवारें गिरी थीं। जो कल युद्ध का मैदान था, वह आज घर की बाड़ बन गया। और सीमा का अंत? "बेतावेन के जंगल में निकली।" तेरे हिस्से में भी शायद कुछ जंगल हो। पर वह भी परमेश्वर का नापा हुआ है, भूल से मिला नहीं।

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For parents and teachers: 7 से 12 वर्ष के उन बच्चों के लिए लिखा गया जो स्वयं पढ़ सकते हैं। पारिवारिक भक्ति और स्कूल में बाइबल पाठ के लिए उत्तम। This explanation is generated automatically by language models. While we strive for theological soundness, the software can make mistakes.

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