6 से 12 वर्ष के बच्चे के लिए

लूका 24

प्राथमिक आयु (6 से 12 वर्ष) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

The Explanation

सप्ताह के पहले दिन, यानी रविवार की सुबह, कुछ स्त्रियाँ यीशु की कब्र पर गईं। वे सुगन्धित वस्तुएँ लेकर आई थीं, क्योंकि उस समय शव पर ऐसी चीज़ें लगाने का रिवाज़ था। पर जब वे वहाँ पहुँचीं, तो कब्र का भारी पत्थर पहले ही लुढ़का हुआ था, और भीतर यीशु का शरीर नहीं था। वे हैरान खड़ी थीं कि अचानक दो पुरुष चमकते वस्त्र पहने उनके सामने आ खड़े हुए। ये स्वर्गदूत थे। उन्होंने कहा, जीवित को मरे हुओं में क्यों ढूँढ़ती हो, वे यहाँ नहीं, जी उठे हैं। उन्हें याद आया कि यीशु ने खुद पहले ही यह बात कही थी।

स्त्रियों ने दौड़कर यह खबर शिष्यों को सुनाई, पर उन्हें विश्वास नहीं हुआ, उन्हें यह बात कहानी जैसी लगी। पतरस फिर भी कब्र की ओर दौड़ा और वहाँ केवल कपड़े पड़े पाए।

उसी दिन दो शिष्य इम्माऊस गाँव जा रहे थे और रास्ते में सारी घटनाओं पर बात कर रहे थे। तभी यीशु खुद उनके साथ चलने लगे, पर उनकी आँखें ऐसी बंद कर दी गईं कि वे उन्हें पहचान न सके। यीशु ने उनसे पूछा कि किस बारे में बात कर रहे हो, और फिर पवित्रशास्त्र से समझाया कि मसीह को दुःख उठाकर ही महिमा में जाना था। शाम को जब वे साथ भोजन करने बैठे और यीशु ने रोटी तोड़ी, तभी उनकी आँखें खुलीं और उन्होंने उसे पहचान लिया। उसी क्षण यीशु उनकी नज़रों से ओझल हो गए।

वे तुरंत यरूशलेम लौटे और बाकी शिष्यों को यह बात बताई। तभी यीशु स्वयं उनके बीच आ खड़े हुए और कहा, तुम्हें शांति मिले। शिष्य डर गए, सोचा कि कोई भूत देख रहे हैं। पर यीशु ने अपने हाथ-पाँव दिखाए और उनके सामने भुनी मछली खाई, ताकि वे समझें कि वे सचमुच शरीर में जीवित हैं। फिर उन्होंने शास्त्र की समझ खोल दी और उन्हें आज्ञा दी कि सब जातियों में मन फिराव और पापों की क्षमा का प्रचार हो। अंत में यीशु उन्हें आशीष देते हुए स्वर्ग पर उठा लिए गए।

What Does This Mean?

यह अध्याय बताता है कि यीशु सचमुच मर गए थे, और सचमुच फिर से जीवित हो उठे। यह कोई कल्पना या भूत-प्रेत की कहानी नहीं है। उन्होंने हाथ-पाँव दिखाए, खाना खाया, शिष्यों से बातें कीं। यह ध्यान देने लायक है कि शुरू में किसी ने भी तुरंत विश्वास नहीं किया, स्त्रियों की बात पर नहीं, और इम्माऊस के शिष्यों की आँखें भी बंद रहीं। पहचानना आसान नहीं था। शायद यह हमें भी सांत्वना देता है, क्योंकि विश्वास करना हमेशा तुरंत नहीं आता, यहाँ उन लोगों के लिए भी नहीं आया जो यीशु को बरसों से जानते थे।

The Common Thread

यीशु ने इम्माऊस के रास्ते में कहा कि मूसा और सब भविष्यद्वक्ताओं में उनके बारे में पहले से लिखा था। यानी पूरा पुराना नियम, परमेश्वर की पुरानी प्रतिज्ञाएँ, इसी ओर इशारा कर रही थीं कि मसीह दुःख उठाएगा और तीसरे दिन जी उठेगा। यह परमेश्वर की बड़ी योजना का हिस्सा है, जो बहुत पहले से चली आ रही थी। और अब उस जी उठे हुए यीशु के नाम से मन फिराव और पापों की क्षमा का प्रचार सब जातियों तक पहुँचना था, यरूशलेम से शुरू करके पूरी दुनिया तक।

For You

कभी-कभी तुम्हें भी लगता होगा कि परमेश्वर दूर है, या जो तुमने सुना है वह सच होने में बहुत मुश्किल लगता है। इम्माऊस के शिष्यों के साथ भी ऐसा हुआ, यीशु उनके पास था, पर वे पहचान नहीं पाए। शायद तुम्हारे जीवन में भी परमेश्वर काम कर रहे हों, और तुम्हें अभी वह दिखाई न दे। यह ठीक है कि सवाल पूछो, शक करो, पर उस शक को यीशु के पास लाओ, जैसे शिष्यों ने लाया। वे धीरज से उनके साथ रहे, समझाते रहे, जब तक उनकी आँखें खुल न गईं।

Talk About It

तुम्हें क्या लगता है, स्त्रियों और शिष्यों को तुरंत विश्वास क्यों नहीं हुआ, जबकि उन्होंने खुद सब कुछ देखा था?

इम्माऊस के शिष्यों का मन रोटी तोड़ते समय ही क्यों खुला, पहले शास्त्र समझाते समय नहीं?

Praying Together

प्रभु यीशु, आप सचमुच जी उठे हैं, यह जानकर हमें खुशी होती है। कभी-कभी हमें भी आपको पहचानना मुश्किल लगता है, हमारी आँखें भी बंद सी रहती हैं। कृपया हमारी समझ खोल दीजिए, जैसे आपने शिष्यों की खोली थी। आमीन।

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लूका 24 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

लूका 24 किस विषय में है?
सप्ताह के पहले दिन, यानी रविवार की सुबह, कुछ स्त्रियाँ यीशु की कब्र पर गईं। वे सुगन्धित वस्तुएँ लेकर आई थीं, क्योंकि उस समय शव पर ऐसी चीज़ें लगाने का रिवाज़ था। पर जब वे वहाँ पहुँचीं, तो कब्र का भारी पत्थर पहले ही लुढ़का हुआ था, और भीतर यीशु का शरीर नहीं था। वे हैरान खड़ी थीं कि अचानक दो पुरुष चमकते वस्त्र पहने उनके सामने आ खड़े हुए। ये स्वर्गदूत थे। उन्होंने कहा, जीवित को मरे हुओं में क्यों ढूँढ़ती हो, वे यहाँ नहीं, जी उठे हैं। उन्हें याद आया कि यीशु ने खुद पहले ही यह बात कही थी।
लूका 24 क्या कहता है?
उसी दिन दो शिष्य इम्माऊस गाँव जा रहे थे और रास्ते में सारी घटनाओं पर बात कर रहे थे। तभी यीशु खुद उनके साथ चलने लगे, पर उनकी आँखें ऐसी बंद कर दी गईं कि वे उन्हें पहचान न सके। यीशु ने उनसे पूछा कि किस बारे में बात कर रहे हो, और फिर पवित्रशास्त्र से समझाया कि मसीह को दुःख उठाकर ही महिमा में जाना था। शाम को जब वे साथ भोजन करने बैठे और यीशु ने रोटी तोड़ी, तभी उनकी आँखें खुलीं और उन्होंने उसे पहचान लिया। उसी क्षण यीशु उनकी नज़रों से ओझल हो गए।
लूका 24 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
यह अध्याय बताता है कि यीशु सचमुच मर गए थे, और सचमुच फिर से जीवित हो उठे। यह कोई कल्पना या भूत-प्रेत की कहानी नहीं है। उन्होंने हाथ-पाँव दिखाए, खाना खाया, शिष्यों से बातें कीं। यह ध्यान देने लायक है कि शुरू में किसी ने भी तुरंत विश्वास नहीं किया, स्त्रियों की बात पर नहीं, और इम्माऊस के शिष्यों की आँखें भी बंद रहीं। पहचानना आसान नहीं था। शायद यह हमें भी सांत्वना देता है, क्योंकि विश्वास करना हमेशा तुरंत नहीं आता, यहाँ उन लोगों के लिए भी नहीं आया जो यीशु को बरसों से जानते थे।
बच्चे लूका 24 से क्या सीख सकते हैं?
कभी-कभी तुम्हें भी लगता होगा कि परमेश्वर दूर है, या जो तुमने सुना है वह सच होने में बहुत मुश्किल लगता है। इम्माऊस के शिष्यों के साथ भी ऐसा हुआ, यीशु उनके पास था, पर वे पहचान नहीं पाए। शायद तुम्हारे जीवन में भी परमेश्वर काम कर रहे हों, और तुम्हें अभी वह दिखाई न दे। यह ठीक है कि सवाल पूछो, शक करो, पर उस शक को यीशु के पास लाओ, जैसे शिष्यों ने लाया। वे धीरज से उनके साथ रहे, समझाते रहे, जब तक उनकी आँखें खुल न गईं।
लूका 24 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
इम्माऊस के शिष्यों का मन रोटी तोड़ते समय ही क्यों खुला, पहले शास्त्र समझाते समय नहीं?

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