गिनती 35
प्राथमिक आयु (6 से 12 वर्ष) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी
व्याख्या
गिनती अध्याय 35 में परमेश्वर मूसा से एक खास योजना के बारे में बात करते हैं। इस्राएल के लोग जल्दी ही कनान देश में पहुँचने वाले थे, वह देश जो परमेश्वर ने उन्हें देने की प्रतिज्ञा की थी। लेकिन एक गोत्र, यानी लेवी के वंशज, को अपनी अलग भूमि नहीं मिलनी थी। इसके बदले, हर गोत्र को अपनी भूमि में से कुछ नगर लेवियों को देने थे, ताकि वे वहाँ रह सकें और अपने पशुओं को चरा सकें।
इनमें से छह नगर बहुत खास थे। इन्हें "शरणनगर" कहा गया। सोचिए, यदि किसी व्यक्ति की गलती से, यानी बिना इरादे के, किसी की मृत्यु हो जाए, तो क्या होगा? उस समय मरे हुए व्यक्ति के परिवार में कोई "बदला लेनेवाला" हो सकता था, जो गुस्से में उस व्यक्ति को मार डालना चाहता। परमेश्वर ने कहा कि ऐसा व्यक्ति इन शरणनगरों में भाग सकता था। वहाँ वह सुरक्षित रहता, जब तक मंडली के सामने उसका न्याय नहीं हो जाता।
लेकिन परमेश्वर ने यह भी साफ किया कि यह नियम हर किसी के लिए नहीं था। यदि किसी ने जानबूझकर, बैर या शत्रुता से किसी को मारा हो, तो उसे शरण नहीं मिलनी थी। उसे मार डाला जाना था। परमेश्वर भेद करते हैं, गलती और द्वेष में, दुर्घटना और हत्या में।
जो व्यक्ति सचमुच भूल से किसी को मार डाला हो, उसे शरणनगर में तब तक रहना होता जब तक महायाजक की मृत्यु न हो जाए। उसके बाद ही वह अपने घर लौट सकता था।
इसका क्या मतलब है?
यह अध्याय हमें दिखाता है कि परमेश्वर न्याय और दया दोनों को गंभीरता से लेते हैं। एक तरफ, वे कहते हैं कि खून बहाना बहुत गंभीर बात है, यह पूरे देश को अशुद्ध कर देता है। परमेश्वर जीवन को इतना मूल्यवान मानते हैं कि इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता। दूसरी तरफ, वे उस व्यक्ति की भी परवाह करते हैं जिसने गलती से, बिना बुरे इरादे के, कुछ भयानक कर दिया। उसे भागने की जगह चाहिए, न्याय होने तक सुरक्षा चाहिए।
क्या आपने कभी सोचा है कि गुस्से में बदला लेना कितना आसान लगता है? परमेश्वर इस अध्याय में उस बदले को रोकते हैं। वे कहते हैं, रुको, पहले सच्चाई का पता लगाओ, फिर न्याय करो। यह बहुत बुद्धिमानी की बात है, क्योंकि गुस्से में लिया गया फैसला अक्सर गलत होता है।
बड़ी कहानी से संबंध
यह अध्याय एक बड़े सवाल की ओर इशारा करता है, जो पूरी बाइबल में चलता है: गलती करनेवाले का क्या होगा? क्या हमेशा सजा ही मिलेगी, या कोई शरण भी है?
शरणनगर एक चित्र की तरह हैं। जो व्यक्ति वहाँ भागकर पहुँच जाता, वह सुरक्षित होता, बदला लेनेवाले से बचा रहता। बाद में, प्रभु यीशु मसीह के बारे में भी यही सच है। जो कोई उनके पास भागकर आता है, उसे भी सुरक्षा मिलती है। परमेश्वर का न्याय सच में गंभीर है, पाप की कीमत चुकानी पड़ती है, लेकिन यीशु मसीह ने वह कीमत खुद चुका दी, ताकि जो उनके पास आए वह शरण पाए।
आपके लिए
क्या आपने कभी किसी को दोष दिया, बिना यह जाने कि सच में क्या हुआ था? यह अध्याय हमें सिखाता है कि जल्दी फैसला करना खतरनाक है। पहले सुनना चाहिए, समझना चाहिए, फिर बोलना चाहिए।
और यह भी सोचिए, जब आपसे कोई गलती हो जाती है, बिना बुरे इरादे के, तो क्या आप जानते हैं कि परमेश्वर के पास हमेशा शरण है? आपको छिपने की जरूरत नहीं, दौड़कर उनके पास आने की जरूरत है।
चर्चा के लिए
क्या तुम्हें लगता है कि हर गलती की सजा एक जैसी होनी चाहिए, या फर्क होना चाहिए इसमें कि किसी ने जानबूझकर या भूल से कुछ किया?
शरणनगर के बारे में सोचकर, क्या तुम्हें कोई ऐसी जगह याद आती है जहाँ तुम सुरक्षित महसूस करते हो जब कुछ गलत हो जाता है?
साथ में प्रार्थना
प्रिय परमेश्वर, आप न्याय करने वाले हैं, और आप दया करने वाले भी हैं। धन्यवाद कि आपने हमारे लिए यीशु मसीह में शरण दी है। जब हम गलती करें, तो हमें डरकर छिपने के बजाय आपके पास दौड़कर आने की समझ दीजिए। हमें सिखाइए कि हम जल्दी फैसला न करें, बल्कि सच्चाई को समझने की कोशिश करें। आमीन।
गिनती 35 के बारे में प्रश्न
पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।
गिनती 35 किस विषय में है?
गिनती 35 क्या कहता है?
गिनती 35 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
बच्चे गिनती 35 से क्या सीख सकते हैं?
गिनती 35 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
दूसरों ने क्या पाया
ये बातें तुम्हारी पीढ़ी-पीढ़ी में तुम्हारे सब रहने के स्थानों में तुम्हारे लिए न्याय की विधि ठहरें।" शरणनगरों के सारे नियमों के बाद यह मुहर लगती है। परमेश्वर का न्याय मूड या जगह से नहीं बदलता। जहाँ तू आज रहता है, वहाँ भी वही सच्चाई लागू है। क्या तू घर में, दफ्तर में, अकेले में एक ही इंसान है?
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