6 से 12 वर्ष के बच्चे के लिए

प्रकाशितवाक्य 2

प्राथमिक आयु (6 से 12 वर्ष) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

स्पष्टीकरण

प्रकाशितवाक्य 2 में यीशु मसीह चार कलीसियाओं यानी मसीही समूहों को पत्र लिखवाते हैं। वे स्वर्ग से बोल रहे हैं, पर इन पत्रों में कुछ भी दूर या अलग नहीं लगता, क्योंकि वे हर कलीसिया को बिलकुल वैसे ही जानते हैं जैसे कोई करीबी दोस्त जानता है।

इफिसुस की कलीसिया बहुत मेहनती थी और झूठे शिक्षकों को पहचान लेती थी। पर यीशु कहते हैं, "तूने अपना पहला सा प्रेम छोड़ दिया है।" उन्होंने सही काम तो किए, पर दिल ठंडा पड़ गया था। इसलिए यीशु कहते हैं, मन फिराओ, यानी वापस लौटो, और पहले जैसा प्रेम करो।

स्मुरना की कलीसिया गरीब थी और सताई जा रही थी, पर यीशु कहते हैं कि असल में वह धनी है। उन्हें और भी दुःख झेलने होंगे, पर यीशु डरने को नहीं कहते, बल्कि विश्वासयोग्य रहने को कहते हैं।

पिरगमुन की कलीसिया वहाँ रहती थी जहाँ बुराई का जोर बहुत था, फिर भी वे यीशु के नाम पर दृढ़ खड़े रहे। पर कुछ लोग वहाँ गलत शिक्षाओं को मान रहे थे, जो उन्हें मूर्तियों की पूजा और गलत रास्तों की ओर खींच रही थीं।

थुआतीरा की कलीसिया में प्रेम और विश्वास बढ़ रहा था, पर वे एक झूठी भविष्यद्वक्तिन को सहन कर रहे थे, जो लोगों को गलत रास्ते पर ले जा रही थी। यीशु उसे मन फिराने का मौका देते हैं, पर कहते हैं कि अगर वह नहीं मानी, तो परिणाम भारी होंगे।

हर पत्र के अंत में यीशु कहते हैं, "जो जय पाए," उसे इनाम मिलेगा, जीवन के पेड़ का फल, जीवन का मुकुट, गुप्त मन्ना, या भोर का तारा। ये सब चित्र हैं जो बताते हैं कि जो अंत तक यीशु के साथ बना रहता है, उसे अद्भुत और हमेशा का जीवन मिलेगा।

इसका क्या मतलब है?

ये पत्र दिखाते हैं कि यीशु हर कलीसिया को बहुत ध्यान से देखते हैं, न सिर्फ उनका बाहरी व्यवहार, बल्कि उनका दिल भी। कोई भी कलीसिया पूरी तरह सही नहीं थी। किसी में मेहनत थी पर प्रेम कम था, किसी में सहनशीलता थी पर गलत शिक्षा को बढ़ने दिया गया था। यीशु न तो आँखें मूँद लेते हैं, न ही सिर्फ डाँटते रहते हैं। वे सच बताते हैं, और फिर रास्ता भी देते हैं कि कैसे वापस लौटा जाए।

यह भी ध्यान देने की बात है कि यीशु हर जगह "मन फिराओ" कहते हैं। इसका मतलब है दिशा बदलना, वापस मुड़ना। यह डाँट नहीं, बल्कि प्रेम से बुलाना है, क्योंकि वे चाहते हैं कि ये लोग उनके पास लौट आएँ।

बड़ी कहानी से जुड़ाव

ये पत्र अकेले नहीं खड़े हैं। हर पत्र में यीशु को कुछ खास नाम से बताया गया है, जैसे "जो प्रथम और अन्तिम है, जो मर गया था और अब जीवित हो गया है।" यह वही यीशु हैं जिन्होंने क्रूस पर जान दी और फिर जी उठे। वे मरे हुओं में से जी उठने वाले राजा हैं, इसलिए वे हर कलीसिया से, चाहे वह कमजोर हो या मजबूत, बात करने का अधिकार रखते हैं। उनका वचन हमेशा वैसा ही रहता है, जैसा उन्होंने इन सात कलीसियाओं से कहा था, प्रेम में सच बोलना और वापस आने का रास्ता देना।

तुम्हारे लिए

कभी सोचो, क्या तुम्हारे जीवन में भी ऐसा हो सकता है कि तुम बहुत सारी सही बातें करते हो, पर यीशु के लिए तुम्हारा दिल ठंडा पड़ गया हो? या शायद तुम्हें लगता है कि तुम कमजोर हो, गरीब हो, पर यीशु की नज़र में तुम सच में धनी हो। यह पढ़ना अच्छा है कि यीशु डराने के लिए नहीं, बल्कि बुलाने के लिए बोलते हैं। वे चाहते हैं कि तुम उनसे फिर से प्रेम करो, जैसे पहले करते थे। और जब कुछ गलत तुम्हारे आस पास बढ़ रहा हो, चाहे वह झूठ हो या गलत आदत, यीशु चाहते हैं कि तुम उसे पहचानो और उससे दूर रहो, न कि उसे सहन करते रहो।

आपस में बात करें

अगर यीशु आज तुम्हें एक पत्र लिखें, तो वे किस बात के लिए तुम्हारी तारीफ करेंगे, और किस बात में तुमसे मन फिराने को कहेंगे?

तुम्हें क्या लगता है, "पहला सा प्रेम" खोना कैसा महसूस होता होगा, और उसे वापस पाने के लिए क्या किया जा सकता है?

साथ में प्रार्थना

प्रभु यीशु, आप हमें पूरी तरह जानते हैं, हमारी मेहनत भी और हमारे दिल की ठंडक भी। कृपया हमें वह पहला प्रेम फिर से दीजिए जो हमने शुरू में आपसे किया था। जब हमारे आस पास गलत बातें बढ़ें, तो हमें सच पहचानने की समझ दीजिए। हमें अंत तक आपके साथ बने रहने की शक्ति दीजिए। आमीन।

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प्रकाशितवाक्य 2 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

प्रकाशितवाक्य 2 किस विषय में है?
प्रकाशितवाक्य 2 में यीशु मसीह चार कलीसियाओं यानी मसीही समूहों को पत्र लिखवाते हैं। वे स्वर्ग से बोल रहे हैं, पर इन पत्रों में कुछ भी दूर या अलग नहीं लगता, क्योंकि वे हर कलीसिया को बिलकुल वैसे ही जानते हैं जैसे कोई करीबी दोस्त जानता है।
प्रकाशितवाक्य 2 क्या कहता है?
पिरगमुन की कलीसिया वहाँ रहती थी जहाँ बुराई का जोर बहुत था, फिर भी वे यीशु के नाम पर दृढ़ खड़े रहे। पर कुछ लोग वहाँ गलत शिक्षाओं को मान रहे थे, जो उन्हें मूर्तियों की पूजा और गलत रास्तों की ओर खींच रही थीं।
प्रकाशितवाक्य 2 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
ये पत्र दिखाते हैं कि यीशु हर कलीसिया को बहुत ध्यान से देखते हैं, न सिर्फ उनका बाहरी व्यवहार, बल्कि उनका दिल भी। कोई भी कलीसिया पूरी तरह सही नहीं थी। किसी में मेहनत थी पर प्रेम कम था, किसी में सहनशीलता थी पर गलत शिक्षा को बढ़ने दिया गया था। यीशु न तो आँखें मूँद लेते हैं, न ही सिर्फ डाँटते रहते हैं। वे सच बताते हैं, और फिर रास्ता भी देते हैं कि कैसे वापस लौटा जाए।
बच्चे प्रकाशितवाक्य 2 से क्या सीख सकते हैं?
कभी सोचो, क्या तुम्हारे जीवन में भी ऐसा हो सकता है कि तुम बहुत सारी सही बातें करते हो, पर यीशु के लिए तुम्हारा दिल ठंडा पड़ गया हो? या शायद तुम्हें लगता है कि तुम कमजोर हो, गरीब हो, पर यीशु की नज़र में तुम सच में धनी हो। यह पढ़ना अच्छा है कि यीशु डराने के लिए नहीं, बल्कि बुलाने के लिए बोलते हैं। वे चाहते हैं कि तुम उनसे फिर से प्रेम करो, जैसे पहले करते थे। और जब कुछ गलत तुम्हारे आस पास बढ़ रहा हो, चाहे वह झूठ हो या गलत आदत, यीशु चाहते हैं कि तुम उसे पहचानो और उससे दूर रहो, न कि उसे सहन करते रहो।
प्रकाशितवाक्य 2 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
प्रभु यीशु, आप हमें पूरी तरह जानते हैं, हमारी मेहनत भी और हमारे दिल की ठंडक भी। कृपया हमें वह पहला प्रेम फिर से दीजिए जो हमने शुरू में आपसे किया था। जब हमारे आस पास गलत बातें बढ़ें, तो हमें सच पहचानने की समझ दीजिए। हमें अंत तक आपके साथ बने रहने की शक्ति दीजिए। आमीन।

दूसरों ने क्या पाया

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 22

थुआतीरा की कलीसिया से कहा गया, "देख, मैं उसे खाट पर डालनेवाला हूँ और जो उसके साथ व्यभिचार करते हैं, यदि वे उसके कामों से मन न फिराएँ, तो उन पर बड़ा क्लेश डालूँगा।" जो खाट पाप का ठिकाना बनी, वही अब रोक बन जाती है। पर ध्यान दे, "यदि" शब्द अब भी खड़ा है। चेतावनी के बीच में भी मसीह दरवाज़ा खुला छोड़ देता है। तू किस बात पर अब तक मन फिराने से रुका है?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 7

इफिसुस की कलीसिया मेहनती थी, सच्चाई की पहरेदार थी, पर पहला प्रेम छोड़ चुकी थी। और उसी से यीशु कहते हैं, "जो जय पाए, मैं उसे उस जीवन के वृक्ष में से जो परमेश्वर के स्वर्गलोक में है, फल खाने को दूँगा।" जो पेड़ अदन में बंद हुआ था, वह फिर खुल रहा है। सोचो, तुम्हारी सेवा तो चल रही है, पर क्या तुम्हारा दिल अब भी उसी से लगा है जिसने तुम्हें बुलाया था?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 15

पिरगमुन की कलीसिया बाहर के दबाव में डटी रही, अन्तिपास ने जान तक दे दी। फिर भी यीशु कहते हैं, "वैसे ही तेरे यहाँ भी ऐसे लोग हैं, जो नीकुलइयों की शिक्षा को मानते हैं।" बाहर की लड़ाई जीतकर भी भीतर कुछ चुपचाप पलता रह सकता है। जिसे तू "बस थोड़ा सा है" कहकर सहता आया है, प्रभु उसे देख रहे हैं।

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