7 से 12 वर्ष के बच्चे के लिए

रोमियों 8

प्राथमिक आयु (7-12) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

व्याख्या

रोमियों 8 पौलुस की एक चिट्ठी का हिस्सा है, जो उन्होंने रोम के विश्वासियों को लिखी थी। यह अध्याय एक बड़े "इसलिए" से शुरू होता है। पौलुस कहता है, जो लोग मसीह यीशु में हैं, उन पर अब दण्ड की आज्ञा नहीं है। इसका मतलब है कि परमेश्वर अब उनसे नाराज़ नहीं है, भले ही वे पाप से जूझते हैं।

पौलुस दो तरह के जीवन की बात करता है, एक "शरीर के अनुसार" और एक "आत्मा के अनुसार"। इसका मतलब शरीर में बुराई नहीं है, बल्कि वह ज़िंदगी जो सिर्फ अपने आप पर, अपनी इच्छाओं पर टिकी रहती है। इसके विपरीत पवित्र आत्मा की अगुवाई में चलने वाला जीवन है, जो परमेश्वर की ओर खुला रहता है।

फिर पौलुस कुछ खूबसूरत कहता है, हमें गुलामी की नहीं, बल्कि "लेपालकपन" की आत्मा मिली है। यानी परमेश्वर ने हमें अपनाया है, जैसे कोई अपने घर में किसी बच्चे को गोद लेता है। इसलिए हम डर से नहीं, बल्कि भरोसे से उन्हें "अब्बा, पिता" कहकर पुकार सकते हैं।

आगे पौलुस पूरी सृष्टि की बात करता है, जो कराहती है, जैसे कोई दर्द में तड़पता हो, और छुटकारे की प्रतीक्षा करती है। हम भी, जिनके पास पवित्र आत्मा है, प्रतीक्षा करते हैं और आशा रखते हैं, तब भी जब हम देख नहीं पाते कि आगे क्या होगा।

अध्याय के अंत में पौलुस एक बड़ा सवाल पूछता है, कौन हमें मसीह के प्रेम से अलग कर सकता है? और वह खुद जवाब देता है, कुछ भी नहीं, न मृत्यु, न जीवन, न कोई और शक्ति।

इसका अर्थ क्या है?

यह अध्याय इस सवाल का जवाब देता है कि अगर परमेश्वर हमसे प्रेम करते हैं, तो जीवन में दुख और कठिनाई क्यों आती है। पौलुस इस सवाल को टालता नहीं। वह खुलकर कहता है कि इस समय दुःख और क्लेश हैं, और पूरी सृष्टि भी कराहती है। बाइबल यह नहीं कहती कि दुःख छोटी बात है, बल्कि यह कहती है कि आनेवाली महिमा इतनी बड़ी होगी कि आज के दुःख उसके सामने फीके पड़ जाएंगे। यह एक वादा है, जिसकी पूर्ति अभी पूरी तरह नहीं दिखती, इसलिए इसे धीरज से थामना पड़ता है।

समान सूत्र

यह सब मसीह यीशु के बिना समझ में नहीं आता। परमेश्वर ने अपने ही पुत्र को भेजा, जो पापमय शरीर में आया और बलिदान हुआ, ताकि हम पाप की सज़ा से स्वतंत्र हो सकें। मसीह मरे, लेकिन फिर जी भी उठे, और अब परमेश्वर की दाहिनी ओर हमारे लिए विनती करते हैं। यही वह वादा है जो पूरे बाइबल की कहानी से जुड़ता है, परमेश्वर अपने लोगों को नहीं छोड़ते। जैसे परमेश्वर ने पुराने समय में अपने लोगों से वाचा बांधी थी, वैसे ही अब मसीह में वे हमें अपना बच्चा बनाते हैं, पक्का और हमेशा के लिए।

तुम्हारे लिए

शायद तुम्हारे मन में भी कभी सवाल आता हो, अगर परमेश्वर मुझसे प्रेम करते हैं, तो फिर स्कूल में मुश्किल क्यों है, या घर में झगड़ा क्यों होता है, या कोई प्रिय व्यक्ति बीमार क्यों पड़ता है। यह अध्याय ऐसे सवालों को गलत नहीं मानता। यह ईमानदारी से कहता है कि दुनिया अभी पूरी तरह ठीक नहीं है, वह भी कराह रही है। लेकिन साथ ही यह कहता है कि तुम अकेले नहीं हो। पवित्र आत्मा तुम्हारी दुर्बलता में सहायता करता है, यहां तक कि जब तुम्हें पता नहीं कि प्रार्थना में क्या कहना है। और कुछ भी, सच में कुछ भी, तुम्हें मसीह के प्रेम से अलग नहीं कर सकता।

इस पर बात करें

अगर दुनिया अभी भी "कराहती" है, तो इसका मतलब क्या हो सकता है तुम्हारी अपनी ज़िंदगी में?

पौलुस कहता है कि आत्मा हमारी प्रार्थना में मदद करता है जब हम नहीं जानते क्या कहना है। क्या तुमने कभी ऐसा महसूस किया है?

साथ में प्रार्थना

प्रिय पिता, धन्यवाद कि हम आपको अब्बा, पिता कहकर पुकार सकते हैं। जब हमें समझ नहीं आता कि क्यों कुछ कठिन होता है, तो हमारे पास आएं और हमें याद दिलाएं कि आपका प्रेम हमें कभी नहीं छोड़ता। यीशु मसीह के नाम में, आमीन।

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रोमियों 8 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

रोमियों 8 किस विषय में है?
रोमियों 8 पौलुस की एक चिट्ठी का हिस्सा है, जो उन्होंने रोम के विश्वासियों को लिखी थी। यह अध्याय एक बड़े "इसलिए" से शुरू होता है। पौलुस कहता है, जो लोग मसीह यीशु में हैं, उन पर अब दण्ड की आज्ञा नहीं है। इसका मतलब है कि परमेश्वर अब उनसे नाराज़ नहीं है, भले ही वे पाप से जूझते हैं।
रोमियों 8 क्या कहता है?
फिर पौलुस कुछ खूबसूरत कहता है, हमें गुलामी की नहीं, बल्कि "लेपालकपन" की आत्मा मिली है। यानी परमेश्वर ने हमें अपनाया है, जैसे कोई अपने घर में किसी बच्चे को गोद लेता है। इसलिए हम डर से नहीं, बल्कि भरोसे से उन्हें "अब्बा, पिता" कहकर पुकार सकते हैं।
रोमियों 8 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
अध्याय के अंत में पौलुस एक बड़ा सवाल पूछता है, कौन हमें मसीह के प्रेम से अलग कर सकता है? और वह खुद जवाब देता है, कुछ भी नहीं, न मृत्यु, न जीवन, न कोई और शक्ति।
बच्चे रोमियों 8 से क्या सीख सकते हैं?
यह सब मसीह यीशु के बिना समझ में नहीं आता। परमेश्वर ने अपने ही पुत्र को भेजा, जो पापमय शरीर में आया और बलिदान हुआ, ताकि हम पाप की सज़ा से स्वतंत्र हो सकें। मसीह मरे, लेकिन फिर जी भी उठे, और अब परमेश्वर की दाहिनी ओर हमारे लिए विनती करते हैं। यही वह वादा है जो पूरे बाइबल की कहानी से जुड़ता है, परमेश्वर अपने लोगों को नहीं छोड़ते। जैसे परमेश्वर ने पुराने समय में अपने लोगों से वाचा बांधी थी, वैसे ही अब मसीह में वे हमें अपना बच्चा बनाते हैं, पक्का और हमेशा के लिए।
रोमियों 8 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
अगर दुनिया अभी भी "कराहती" है, तो इसका मतलब क्या हो सकता है तुम्हारी अपनी ज़िंदगी में?

दूसरों ने क्या पाया

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 7

शरीर पर मन लगाना तो परमेश्वर से बैर रखना है, क्योंकि न तो वह परमेश्वर की व्यवस्था के अधीन है और न हो सकता है।"

ध्यान दे, पौलुस यह नहीं कहता कि शरीरिक मन परमेश्वर के अधीन होता नहीं, वह कहता है हो ही नहीं सकता। यही बात हमें तोड़ती है। हम सोचते हैं थोड़ी और कोशिश, थोड़ा और संकल्प। पर यहाँ बात ताकत की नहीं, स्वभाव की है। तुझे सुधार नहीं, नया जीवन चाहिए। और वही तो मसीह देने आया है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 37

पौलुस ने पहले गिनाया था: क्लेश, संकट, उपद्रव, अकाल, नंगाई, संकट, तलवार। और फिर लिखा, "परन्तु इन सब बातों में हम उसके द्वारा जिसने हम से प्रेम किया है, जयवन्तों से भी बढ़कर हैं।"

ध्यान दे, वह नहीं कहता कि इन बातों से बाहर निकलकर, बल्कि इन्हीं के बीच में। तेरी जीत तेरी परिस्थिति बदलने से नहीं, उस प्रेम से आती है जो आग में तेरे साथ खड़ा है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 30

जिन्हें उसने पहले से ठहराया, उन्हें बुलाया भी, और जिन्हें बुलाया, उन्हें धर्मी भी ठहराया, और जिन्हें धर्मी ठहराया, उन्हें महिमा भी दी।" ध्यान दे, महिमा की बात भी बीते हुए समय में कही गई है। जो अभी होना बाकी है, परमेश्वर उसे ऐसे बोलता है मानो हो चुका हो। तेरा आज का आँसू उस कड़ी को तोड़ नहीं सकता। वह जिसे थामता है, अंत तक थामे रहता है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 4

व्यवस्था की मांग "हम में" पूरी होती है, हमारे द्वारा नहीं। यह छोटा सा फर्क तुम्हारे कंधों का बोझ उतार देता है। तुम कोशिश करके नियम पूरा नहीं कर पाए, इसलिए मसीह ने वह किया जो तुम न कर सके। अब सवाल यह नहीं कि तुम कितनी मेहनत करते हो, बल्कि यह कि तुम किसकी सुनते हुए चलते हो, शरीर की या आत्मा की।

किसी अन्य आयु वर्ग की तलाश है?

हमारे पास छोटे बच्चों (3-6 वर्ष) और किशोरों (12 वर्ष और अधिक) के लिए विशेष संस्करण भी हैं।

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For parents and teachers: 7 से 12 वर्ष के उन बच्चों के लिए लिखा गया जो स्वयं पढ़ सकते हैं। पारिवारिक भक्ति और स्कूल में बाइबल पाठ के लिए उत्तम। This explanation is generated automatically by language models. While we strive for theological soundness, the software can make mistakes.

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