एज्रा 7
नन्हे और पूर्व-विद्यालय बच्चे (आयु 3-6) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी
एज्रा अध्याय 7
व्याख्या
एक आदमी था। उसका नाम एज्रा था।
एज्रा दूर देश में रहता था। उस देश का नाम बाबेल था।
एज्रा को परमेश्वर की बातें बहुत पसंद थीं। वह हर दिन परमेश्वर का वचन पढ़ता था। वह उसे समझना चाहता था। वह उसके अनुसार जीना चाहता था।
एक दिन एज्रा ने सोचा, "मैं यरूशलेम जाऊँगा।" यरूशलेम बहुत दूर था। वहाँ परमेश्वर का भवन था।
राजा का नाम अर्तक्षत्र था। राजा ने एज्रा से कहा, "तुम जा सकते हो।" राजा ने एक चिट्ठी लिखी। चिट्ठी में सोना था, चाँदी थी। बहुत सारा गेहूँ भी था, और तेल भी।
यह सब परमेश्वर के भवन के लिए था।
एज्रा खुश हुआ। बहुत खुश। उसने अपने साथ और लोगों को बुलाया। याजक भी आए, गवैये भी आए। सब मिलकर चल पड़े।
रास्ता लंबा था। पहले महीने से पाँचवें महीने तक वे चलते रहे। और चलते रहे। और चलते रहे।
फिर, एक दिन, उन्होंने यरूशलेम को देखा।
इसका अर्थ क्या है?
एज्रा ने परमेश्वर के वचन को अपने मन में रखा था। इसीलिए वह जानता था कि क्या करना है।
परमेश्वर ने राजा के मन में भी एक इच्छा डाली। राजा ने सोना दिया, चाँदी दी। राजा को पता नहीं था, पर परमेश्वर जानते थे।
परमेश्वर हर जगह काम करते हैं। दूर देश में भी। राजाओं के मन में भी।
एक ही कहानी
परमेश्वर का भवन बहुत महत्वपूर्ण था। वहाँ लोग परमेश्वर से मिलने आते थे।
बहुत समय बाद, यीशु आए। यीशु ने कहा, अब मुझसे मिलो। यीशु के पास आने के लिए किसी भवन की ज़रूरत नहीं। यीशु खुद रास्ता हैं।
एज्रा वचन पढ़ता था और परमेश्वर को जानता था। हम यीशु को जान सकते हैं। यीशु हमसे प्रेम करते हैं।
तुम्हारे लिए
तुम भी परमेश्वर की बातें सुन सकते हो। बाइबल की कहानियाँ सुनना अच्छा है।
जब तुम परमेश्वर की बात सुनते हो, तुम्हारा मन भी एज्रा जैसा हो सकता है।
क्या तुम्हें भी परमेश्वर की बातें सुनना पसंद है?
बात करें
क्या तुम्हें कोई लंबी यात्रा याद है?
एज्रा परमेश्वर के वचन को कितना प्यार करता था?
साथ में प्रार्थना
प्रभु यीशु, एज्रा आपकी बातें सुनता था। मैं भी सुनना चाहता हूँ। मुझे भी आपसे प्रेम करना सिखाइए। आमीन।
एज्रा 7 के बारे में प्रश्न
पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।
एज्रा 7 किस विषय में है?
एज्रा 7 क्या कहता है?
एज्रा 7 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
नन्हे बच्चे एज्रा 7 से क्या सीख सकते हैं?
एज्रा 7 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
दूसरों ने क्या पाया
गवैये, द्वारपाल, मन्दिर के सेवक। ये नाम याजकों के साथ ही गिने गए, "राजा अर्तक्षत्र के सातवें वर्ष में... यरूशलेम को गए।" जो दरवाज़े पर खड़ा रहता था, उसका सफ़र भी उतना ही दर्ज हुआ जितना अगुवे का। तू सोचता है तेरी सेवा छोटी है, किसी को दिखती नहीं। परमेश्वर की सूची में वह छूटी नहीं।
अर्तक्षत्र कोई भक्त नहीं था, फिर भी उसने लिखवाया: "जो-जो आज्ञा स्वर्ग के परमेश्वर की ओर से मिले, वह स्वर्ग के परमेश्वर के भवन के लिये ठीक-ठीक पूरी की जाए।" एक परदेशी राजा परमेश्वर के काम में लापरवाही सहन नहीं करता था। और तू? जो तेरे हाथ में परमेश्वर का काम है, उसे तू आधा-अधूरा छोड़ देता है या ठीक-ठीक पूरा करता है?
एक अन्यजाति राजा एज्रा के हाथ में बची हुई चाँदी सोना सौंपकर कहता है, "जो कुछ तुझको... उचित जान पड़े, वही अपने परमेश्वर की इच्छा के अनुसार करना।" कितना बड़ा भरोसा! पर यह भरोसा अचानक नहीं आया। एज्रा ने पहले अपना मन व्यवस्था खोजने में लगाया था, इसलिए उसकी पसंद परमेश्वर की इच्छा से टकराती नहीं थी। तुझे भी कभी आदेश नहीं, बस आज़ादी मिलती है। उस घड़ी तेरा मन किसकी इच्छा चुनता है?
एक विदेशी राजा का फरमान, और उसमें नाम लिखे हैं याजकों के, लेवियों के, गवैयों के, द्वारपालों के, नतीनों के: "इनमें से किसी पर कर, चुंगी, अथवा राहदारी लगाना उचित नहीं।" ध्यान दो, गवैये और द्वारपाल भी छूट गए। परमेश्वर की गिनती में छोटा सेवक भी छूटता नहीं। तू सोचता है तेरा काम किसी को दिखता नहीं? जिसने अर्तक्षत्र का मन फेरा, वह तेरा नाम भी जानता है।
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