3 से 6 वर्ष के बच्चे के लिए

याकूब 4

नन्हे और पूर्व-विद्यालय बच्चे (आयु 3-6) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

स्पष्टीकरण

एक कमरा था। उसमें दो बच्चे खेल रहे थे। एक ही खिलौना था, एक छोटी लाल गेंद। दोनों को वह गेंद चाहिए थी। एक ने खींचा। दूसरे ने भी खींचा। फिर वे चिल्लाए। फिर वे रोए। यह झगड़ा था।

याकूब ने पूछा, "यह झगड़े कहाँ से आते हैं?" उसने बताया, यह अंदर से आते हैं। हम कुछ चाहते हैं। और हम माँगते नहीं। हम बस खींचते हैं और लड़ते हैं।

इसका क्या मतलब है?

सोचो, वह बच्चा गेंद के लिए लड़ने के बदले क्या कर सकता था? वह अपनी माँ के पास जा सकता था। वह कह सकता था, "माँ, मुझे भी वह गेंद चाहिए।" तब झगड़ा नहीं होता।

परमेश्वर भी ऐसे ही हैं। याकूब कहता है, "परमेश्वर के निकट आओ, तो वे भी तुम्हारे निकट आएँगे।" जब हम कुछ चाहते हैं, हम परमेश्वर से माँग सकते हैं। हम खींचना और लड़ना नहीं चाहते।

परमेश्वर घमण्डी बच्चों से दूर रहते हैं। पर जो बच्चा छोटा और नम्र बनता है, उसके पास परमेश्वर आते हैं। सोचो, जब तुम गिर जाते हो, तुम रो नहीं सकते इतना बड़ा। तुम बस हाथ उठाते हो। परमेश्वर वैसे ही हमें उठाते हैं, जब हम नम्र होते हैं।

एक ही कड़ी

यीशु ऐसे ही थे। वे सबसे बड़े थे। पर वे नम्र बने। उन्होंने कभी झगड़ा नहीं किया। उन्होंने अपने पिता से माँगा। परमेश्वर ने कहा है, "परमेश्वर अभिमानियों से विरोध करता है, पर नम्रों पर अनुग्रह करता है।" यीशु दिखाते हैं कैसे नम्र बनते हैं।

तुम्हारे लिए

कल क्या होगा, यह भी हम नहीं जानते। याकूब कहता है, हमारा जीवन धुंध जैसा है। सुबह की धुंध कैसी होती है? पतली, सफेद, हल्की। थोड़ी देर में वह गायब हो जाती है। इसलिए जब हम कुछ योजना बनाते हैं, हम कह सकते हैं, "यदि प्रभु चाहे तो।"

आज जब तुम्हें कुछ चाहिए हो, याद रखो। खींचो मत। लड़ो मत। परमेश्वर के पास जाओ। हाथ जोड़ो। और माँगो।

बात करें

जब तुम्हें कोई खिलौना चाहिए होता है, तुम क्या करते हो, खींचते हो या माँगते हो?

तुम परमेश्वर के पास कैसे जा सकते हो, जब तुम्हें कुछ चाहिए?

साथ में प्रार्थना करें

प्रभु, मैं आपके पास आता हूँ। मुझे माफ़ करें, जब मैं लड़ता हूँ। मुझे नम्र बनाएँ। जो मुझे चाहिए, मैं आपसे माँगता हूँ। आमीन।

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याकूब 4 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

याकूब 4 किस विषय में है?
एक कमरा था। उसमें दो बच्चे खेल रहे थे। एक ही खिलौना था, एक छोटी लाल गेंद। दोनों को वह गेंद चाहिए थी। एक ने खींचा। दूसरे ने भी खींचा। फिर वे चिल्लाए। फिर वे रोए। यह झगड़ा था।
याकूब 4 क्या कहता है?
सोचो, वह बच्चा गेंद के लिए लड़ने के बदले क्या कर सकता था? वह अपनी माँ के पास जा सकता था। वह कह सकता था, "माँ, मुझे भी वह गेंद चाहिए।" तब झगड़ा नहीं होता।
याकूब 4 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
परमेश्वर घमण्डी बच्चों से दूर रहते हैं। पर जो बच्चा छोटा और नम्र बनता है, उसके पास परमेश्वर आते हैं। सोचो, जब तुम गिर जाते हो, तुम रो नहीं सकते इतना बड़ा। तुम बस हाथ उठाते हो। परमेश्वर वैसे ही हमें उठाते हैं, जब हम नम्र होते हैं।
नन्हे बच्चे याकूब 4 से क्या सीख सकते हैं?
कल क्या होगा, यह भी हम नहीं जानते। याकूब कहता है, हमारा जीवन धुंध जैसा है। सुबह की धुंध कैसी होती है? पतली, सफेद, हल्की। थोड़ी देर में वह गायब हो जाती है। इसलिए जब हम कुछ योजना बनाते हैं, हम कह सकते हैं, "यदि प्रभु चाहे तो।"
याकूब 4 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
जब तुम्हें कोई खिलौना चाहिए होता है, तुम क्या करते हो, खींचते हो या माँगते हो?

दूसरों ने क्या पाया

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 7

इसलिए परमेश्वर के अधीन हो जाओ; और शैतान का सामना करो, तो वह तुम्हारे पास से भाग निकलेगा।" ध्यान दे, क्रम क्या है। पहले समर्पण, फिर सामना। हम अक्सर उल्टा करते हैं, अपने बल पर लड़ते हैं और थक जाते हैं। जिस दिल ने घुटने टेकना सीख लिया, वही खड़ा रहना भी सीखता है। आज तू किस लड़ाई में अकेला उतरा हुआ है?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 14

सुबह की चाय के ऊपर उठती भाप को देखा है? एक पल दिखती है, फिर कुछ नहीं। याकूब यही कहता है, "तुम तो भाप के समान हो, जो थोड़ी देर दिखाई देती है, फिर लोप हो जाती है।" यह डराने के लिए नहीं, जगाने के लिए है। जिस बात को तू "बाद में" कहकर टालता रहा है, वह माफी, वह फोन, वह समर्पण, तेरे पास शायद उतना "बाद में" है ही नहीं।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 10

प्रभु के सामने दीन बनो, और वह तुम्हें शिरोमणि बनाएगा।" ध्यान दो, याकूब यह नहीं कहता कि लोगों के सामने झुको। झुकना प्रभु के सामने है, वहीं जहाँ कोई तालियाँ नहीं बजातीं। और ऊँचा उठाने का काम तुम्हारा नहीं, उसका है। शायद तुम्हारी थकान इसी से है कि तुम खुद को ऊपर उठाए रखने में लगे हो। छोड़ दो। झुक जाओ। उठाने वाला जाग रहा है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 9

याकूब यह उन लोगों से कह रहा है जो हँसते हुए दुनिया से दोस्ती कर रहे थे और अपने पाप को हल्का समझ रहे थे: "दुःखी हो, और शोक करो, और रोओ; तुम्हारी हँसी शोक में और तुम्हारा आनन्द उदासी में बदल जाए।" कभी-कभी हमारी हँसी सचमुच का आनन्द नहीं, बस पश्चाताप से बचने का पर्दा होती है। परमेश्वर के सामने रोना कमजोरी नहीं, वहीं से वह उठाता है।

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For parents and teachers: विशेष रूप से 3 से 6 वर्ष के बच्चों को ज़ोर से पढ़कर सुनाने के लिए लिखा गया। इसे अपने बच्चे के साथ बातचीत की शुरुआत के रूप में उपयोग करें, एकमात्र स्रोत के रूप में नहीं। This explanation is generated automatically by language models. While we strive for theological soundness, the software can make mistakes.

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