13 वर्ष और उससे बड़े किशोर के लिए

2 इतिहास 2

किशोर (13 वर्ष और उससे बड़े) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

The Explanation

सुलैमान राजा बन चुके हैं, और अब वे वह काम शुरू करने जा रहे हैं जिसका सपना उनके पिता दाऊद ने देखा था, लेकिन खुद कभी पूरा नहीं कर पाए, यहोवा के लिए एक भवन बनाना। यह कोई छोटा प्रोजेक्ट नहीं है। एक लाख तिरपन हजार छः सौ लोग इस काम में लगते हैं, सत्तर हजार बोझा ढोने वाले, अस्सी हजार पत्थर काटने वाले, और साढ़े तीन हजार मुखिया उन सबकी निगरानी करने वाले। यह आंकड़े अपने आप में कुछ कहते हैं, यह मंदिर किसी छोटे जोश का नतीजा नहीं था।

सुलैमान सोर के राजा हीराम से मदद मांगते हैं, ठीक वैसे ही जैसे उनके पिता ने मांगी थी। वे चाहते हैं लकड़ी, लबानोन के देवदार, सनोवर और चन्दन के वृक्ष, और एक ऐसा कारीगर जो सोने, चाँदी, पीतल, लोहे और कपड़े की बारीक कारीगरी जानता हो। ध्यान देने वाली बात यह है कि सुलैमान यह सब मांगते हुए एक बात बहुत साफ कहते हैं, "जो भवन मैं बनाने पर हूँ, वह महान होगा, क्योंकि हमारा परमेश्वर सब देवताओं में महान है।" और फिर तुरंत वे खुद को सुधारते हैं, "परन्तु किस में इतनी शक्ति है कि उसके लिये भवन बनाए, वह तो स्वर्ग में, वरन् सबसे ऊँचे स्वर्ग में भी नहीं समाता?"

हीराम जवाब देते हैं, और उनका जवाब सिर्फ व्यापारिक नहीं है। वे कहते हैं, "यहोवा अपनी प्रजा से प्रेम रखता है, इससे उसने तुझे उनका राजा कर दिया।" एक विदेशी राजा, जो इस्राएल के परमेश्वर की उपासना नहीं करता, फिर भी यहोवा की महिमा और उनके प्रेम को पहचानता है। वह अपना सबसे कुशल कारीगर हूराम-अबी को भेजता है, और लकड़ी भिजवाने का पूरा इंतज़ाम करता है। बदले में सुलैमान गेहूँ, जौ, तेल और दाखमधु भेजते हैं। यह एक असली, व्यवस्थित, सावधानी से किया गया समझौता है, कागज़ात, मात्राएँ, योजनाएँ।

What Does This Mean?

यह अध्याय पहली नज़र में सिर्फ निर्माण का हिसाब-किताब लगता है, लेकिन इसके पीछे एक गहरी बात छुपी है। सुलैमान जानते हैं कि वे परमेश्वर के लिए कुछ बड़ा बना रहे हैं, लेकिन वे यह भी जानते हैं कि कोई भी भवन, चाहे वह कितना भी भव्य क्यों न हो, परमेश्वर को समा नहीं सकता। वे खुद अपनी परियोजना की सीमा को पहचानते हैं। यह विनम्रता है जो बहुत से धार्मिक उत्साह में गुम हो जाती है। जब हम कुछ परमेश्वर के लिए करते हैं, चाहे वह गाना हो, सेवा हो, या कोई बड़ा काम, खतरा यह रहता है कि हम भूल जाएँ कि परमेश्वर हमारे किए हुए से कहीं बड़े हैं। सुलैमान यह गलती नहीं करते। वे सबसे बड़ा भवन बनाना चाहते हैं, फिर भी कहते हैं कि यह सिर्फ धूप जलाने की जगह है, परमेश्वर का घर नहीं जिसमें वे कैद हों।

और यह भी ध्यान देने लायक है कि यह काम अकेले नहीं हुआ। इस्राएली मेहनत करते हैं, लेकिन सोर के लोग भी, जो इस्राएली नहीं हैं, इसमें शामिल होते हैं। परमेश्वर की महिमा का काम कभी-कभी उन हाथों से भी होता है जो उसे पूरी तरह नहीं पहचानते।

The Common Thread

यह मंदिर जो सुलैमान बना रहे हैं, वह इतिहास में एक अस्थायी घर था, पत्थर और देवदार की लकड़ी से बना, जो बाद में टूट भी गया। लेकिन यह कहानी हमें उस बड़ी सच्चाई की ओर इशारा करती है जो यूहन्ना के सुसमाचार में पूरी होती है, जब यीशु मसीह कहते हैं कि उनका शरीर ही वह मंदिर है जिसे गिराया जाएगा और तीन दिन में फिर खड़ा किया जाएगा। सुलैमान ने जो सवाल पूछा था, "किस में इतनी शक्ति है कि उसके लिये भवन बनाए, वह तो सबसे ऊँचे स्वर्ग में भी नहीं समाता?", उसका जवाब यीशु में मिलता है। परमेश्वर किसी पत्थर की इमारत में नहीं समाए, बल्कि वे स्वयं मनुष्य बनकर हमारे बीच आ गए। अब परमेश्वर का निवास कोई भवन नहीं, बल्कि वे लोग हैं जो मसीह में विश्वास करते हैं, जिनमें पवित्र आत्मा रहते हैं। जो चीज़ सुलैमान सत्तर हजार मजदूरों से भी पूरी नहीं कर सके, परमेश्वर ने खुद पूरी की, बिना किसी निर्माण सामग्री के, सिर्फ प्रेम से।

For You

तुम्हारी ज़िंदगी में भी शायद ऐसी चीज़ें हैं जिन्हें तुम परमेश्वर के लिए बड़ा बनाना चाहते हो, एक सेवा, एक मंत्रालय, एक निर्णय, एक सपना। यह अच्छी बात है। लेकिन सुलैमान की विनम्रता याद रखो। तुम्हारा सबसे बड़ा प्रयास भी परमेश्वर को समाहित नहीं कर सकता, और यह बात तुम्हें शर्मिंदा नहीं, बल्कि आज़ाद करनी चाहिए। तुम्हें परमेश्वर को प्रभावित करने के लिए कुछ बड़ा बनाने की ज़रूरत नहीं है। वे पहले से ही सबसे बड़े हैं, और उन्होंने तुम्हारे भीतर आकर रहना चुना है। यह भी सोचो कि हीराम, एक बाहरी व्यक्ति, ने परमेश्वर के काम को पहचाना और उसमें हाथ बँटाया। शायद तुम्हारे आस-पास भी ऐसे लोग हैं जो खुद विश्वासी नहीं हैं, फिर भी परमेश्वर उनके ज़रिए कुछ अच्छा कर सकते हैं। इससे अभिमान नहीं, बल्कि खुलापन सीखो।

Talk About It

सुलैमान ने परमेश्वर के लिए सबसे बड़ा भवन बनाने की कोशिश की, फिर भी कहा कि वह उन्हें समा नहीं सकता। तुम अपनी ज़िंदगी में परमेश्वर को किसी "बक्से" में बंद करने की कोशिश कब करते हो?

हीराम, जो इस्राएल का नहीं था, फिर भी यहोवा के काम में शामिल हुआ। क्या तुम्हारी ज़िंदगी में ऐसे लोग हैं जो विश्वासी नहीं हैं, लेकिन जिनसे तुमने परमेश्वर के बारे में कुछ सीखा है?

Praying Together

प्रभु, हम आपके लिए कुछ बड़ा करना चाहते हैं, लेकिन हमें याद दिलाइए कि आप हमारे किसी भी प्रयास से कहीं बड़े हैं। धन्यवाद कि आपने पत्थर के घर में नहीं, बल्कि हमारे भीतर रहना चुना। हमें विनम्र बनाइए, और हमारी आँखें खोलिए ताकि हम देख सकें कि आप कहाँ कहाँ काम कर रहे हैं, यहाँ तक कि उन लोगों के ज़रिए भी जिन्हें हम उम्मीद नहीं करते। आमीन।

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2 इतिहास 2 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

2 इतिहास 2 किस विषय में है?
सुलैमान राजा बन चुके हैं, और अब वे वह काम शुरू करने जा रहे हैं जिसका सपना उनके पिता दाऊद ने देखा था, लेकिन खुद कभी पूरा नहीं कर पाए, यहोवा के लिए एक भवन बनाना। यह कोई छोटा प्रोजेक्ट नहीं है। एक लाख तिरपन हजार छः सौ लोग इस काम में लगते हैं, सत्तर हजार बोझा ढोने वाले, अस्सी हजार पत्थर काटने वाले, और साढ़े तीन हजार मुखिया उन सबकी निगरानी करने वाले। यह आंकड़े अपने आप में कुछ कहते हैं, यह मंदिर किसी छोटे जोश का नतीजा नहीं था।
2 इतिहास 2 क्या कहता है?
हीराम जवाब देते हैं, और उनका जवाब सिर्फ व्यापारिक नहीं है। वे कहते हैं, "यहोवा अपनी प्रजा से प्रेम रखता है, इससे उसने तुझे उनका राजा कर दिया।" एक विदेशी राजा, जो इस्राएल के परमेश्वर की उपासना नहीं करता, फिर भी यहोवा की महिमा और उनके प्रेम को पहचानता है। वह अपना सबसे कुशल कारीगर हूराम-अबी को भेजता है, और लकड़ी भिजवाने का पूरा इंतज़ाम करता है। बदले में सुलैमान गेहूँ, जौ, तेल और दाखमधु भेजते हैं। यह एक असली, व्यवस्थित, सावधानी से किया गया समझौता है, कागज़ात, मात्राएँ, योजनाएँ।
2 इतिहास 2 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
और यह भी ध्यान देने लायक है कि यह काम अकेले नहीं हुआ। इस्राएली मेहनत करते हैं, लेकिन सोर के लोग भी, जो इस्राएली नहीं हैं, इसमें शामिल होते हैं। परमेश्वर की महिमा का काम कभी-कभी उन हाथों से भी होता है जो उसे पूरी तरह नहीं पहचानते।
किशोर 2 इतिहास 2 से क्या सीख सकते हैं?
तुम्हारी ज़िंदगी में भी शायद ऐसी चीज़ें हैं जिन्हें तुम परमेश्वर के लिए बड़ा बनाना चाहते हो, एक सेवा, एक मंत्रालय, एक निर्णय, एक सपना। यह अच्छी बात है। लेकिन सुलैमान की विनम्रता याद रखो। तुम्हारा सबसे बड़ा प्रयास भी परमेश्वर को समाहित नहीं कर सकता, और यह बात तुम्हें शर्मिंदा नहीं, बल्कि आज़ाद करनी चाहिए। तुम्हें परमेश्वर को प्रभावित करने के लिए कुछ बड़ा बनाने की ज़रूरत नहीं है। वे पहले से ही सबसे बड़े हैं, और उन्होंने तुम्हारे भीतर आकर रहना चुना है। यह भी सोचो कि हीराम, एक बाहरी व्यक्ति, ने परमेश्वर के काम को पहचाना और उसमें हाथ बँटाया। शायद तुम्हारे आस-पास भी ऐसे लोग हैं जो खुद विश्वासी नहीं हैं, फिर भी परमेश्वर उनके ज़रिए कुछ अच्छा कर सकते हैं। इससे अभिमान नहीं, बल्कि खुलापन सीखो।
2 इतिहास 2 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
हीराम, जो इस्राएल का नहीं था, फिर भी यहोवा के काम में शामिल हुआ। क्या तुम्हारी ज़िंदगी में ऐसे लोग हैं जो विश्वासी नहीं हैं, लेकिन जिनसे तुमने परमेश्वर के बारे में कुछ सीखा है?

दूसरों ने क्या पाया

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 14

मन्दिर बनाने के लिए जो कारीगर चुना गया, उसका परिचय ऐसे दिया गया: "वह एक दानी स्त्री का पुत्र है, और उसका पिता सोरवासी था।" आधा इस्राएली, आधा परदेशी। किसी की नज़र में शायद वह पूरी तरह कहीं का नहीं था, पर उसके हाथ परमेश्वर के भवन को गढ़ रहे थे। तेरी मिलीजुली कहानी तुझे अयोग्य नहीं बनाती। परमेश्वर तेरे हुनर को जानता है, और उसे बुलाने का हक़ भी रखता है।

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