इफिसियों 3
किशोर (12 वर्ष और अधिक) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी
व्याख्या
पौलुस यह पत्र किसी शान्त अध्ययन कक्ष से नहीं लिख रहा। वह कैद में है। और ध्यान दो कि वह अपने आप को क्या कहता है: "मैं पौलुस जो तुम अन्यजातियों के लिये मसीह यीशु का बन्दी हूँ।" रोम की जंजीरें असली थीं, पर पौलुस उन्हें रोम की जंजीरें नहीं कहता। वह कहता है: मैं मसीह का बन्दी हूँ, और यह कैद तुम्हारे लिए है। यह आदमी अपनी परिस्थिति को हार के रूप में नहीं, सेवा के रूप में पढ़ता है।
इसके बाद वह एक शब्द बार-बार दोहराता है: भेद। हमारे कानों में "भेद" रहस्यमय और उलझा हुआ लगता है, पर पौलुस के लिए इसका मतलब है: कुछ ऐसा जो सदियों तक छिपा था और अब खोल दिया गया है। और वह भेद क्या है? "मसीह यीशु में सुसमाचार के द्वारा अन्यजातीय लोग विरासत में सहभागी, और एक ही देह के और प्रतिज्ञा के भागी हैं।" यानी: जो लोग परमेश्वर के लोगों की सीमा के बाहर खड़े थे, बाहरी, अजनबी, अब अंदर हैं। पूरी तरह अंदर। मेहमान के तौर पर नहीं, वारिस के तौर पर।
पौलुस अपने बारे में एक हैरान करने वाली बात कहता है: वह "सब पवित्र लोगों में से छोटे से भी छोटा" है, और फिर भी उसे यह काम मिला कि वह "मसीह के अगम्य धन" का समाचार सुनाए। अगम्य, यानी जिसका अंत नापा न जा सके।
फिर वह कुछ और बड़ा कहता है: कलीसिया के द्वारा परमेश्वर का ज्ञान "उन प्रधानों और अधिकारियों पर, जो स्वर्गीय स्थानों में हैं" प्रगट किया जाता है। जब अलग-अलग पृष्ठभूमि के लोग एक देह बनकर जीते हैं, तो अदृश्य जगत में एक संदेश जाता है।
अध्याय के आधे हिस्से में पौलुस रुक जाता है और घुटने टेक देता है। वह अपने पाठकों के लिए प्रार्थना करता है: कि वे "अपने भीतरी मनुष्यत्व में सामर्थ्य पाकर बलवन्त" हों, कि मसीह विश्वास के द्वारा उनके हृदय में बसे, कि वे प्रेम में जड़ पकड़ें, और मसीह के उस प्रेम की चौड़ाई, लम्बाई, ऊँचाई और गहराई समझ सकें, "जो ज्ञान से परे है।" और अंत में वह उस परमेश्वर की स्तुति करता है जो "हमारी विनती और समझ से कहीं अधिक काम कर सकता है।"
इसका अर्थ क्या है?
तीन बातें इस अध्याय को असहज और सुंदर बनाती हैं।
पहली: तुम्हारा अंदर होना तुम्हारी उपलब्धि नहीं है। पौलुस के जमाने में अन्यजातियों के पास न वंशावली थी, न धार्मिक इतिहास, न योग्यता। उन्हें अंदर लिया गया क्योंकि परमेश्वर ने एक "सनातन मनसा", एक अनन्तकाल का इरादा, मसीह में पूरा किया। अगर तुम्हें कभी लगता है कि तुम विश्वास की दुनिया में बाहरी हो, कि तुम्हारा घर पर्याप्त धार्मिक नहीं है, कि तुमने बहुत देर से शुरू किया, तो यह अध्याय तुम्हारे लिए है। सुसमाचार बाहर वालों की खबर है।
दूसरी: प्रार्थना का निशाना बाहर नहीं, भीतर है। पौलुस यह नहीं माँगता कि उनके हालात सुधरें। वह माँगता है कि भीतर का इंसान मजबूत हो। हम आम तौर पर उल्टा प्रार्थना करते हैं। हम चाहते हैं कि परीक्षा आसान हो, रिश्ता ठीक हो, दबाव हटे। पौलुस जानता है कि जीवन की असली लड़ाई वहाँ लड़ी जाती है जहाँ कोई नहीं देखता।
तीसरी: प्रेम को जानने का मतलब उसे नाप लेना नहीं है। पौलुस चौड़ाई, लम्बाई, ऊँचाई और गहराई गिनता है, जैसे किसी चीज़ को नापने की कोशिश कर रहा हो, और फिर हाथ खड़े कर देता है: यह प्रेम "ज्ञान से परे है।" ईमानदारी से कहें तो यही विश्वास का सबसे कठिन हिस्सा है। तुम मसीह के प्रेम को साबित नहीं कर सकते जैसे कोई गणित का सवाल। तुम उसमें जड़ पकड़ सकते हो, जैसे पेड़ मिट्टी में।
जोड़ने वाला सूत्र
यह अध्याय एक ही केंद्र के चारों ओर घूमता है: मसीह यीशु। भेद मसीह का भेद है। विरासत मसीह में मिलती है। परमेश्वर का अनन्त इरादा "हमारे प्रभु मसीह यीशु में" पूरा हुआ। और यही कारण है कि पौलुस कह सकता है कि हमें "साहस और भरोसे से निकट आने का अधिकार है।"
रुककर सोचो कि यह कितना बड़ा दावा है। पुराने नियम में परमेश्वर के सामने आना एक भारी, नियंत्रित, डरावनी बात थी। यहाँ पौलुस कहता है: साहस के साथ, भरोसे के साथ, अधिकार के साथ। यह ढीठपन नहीं है, यह मसीह के काम का नतीजा है। परमेश्वर ने कभी योजना नहीं बदली, उन्होंने वह खोल दी जो शुरू से उनके मन में थी।
तुम्हारे लिए
तुम एक ऐसी दुनिया में जीते हो जहाँ तुम्हारी कीमत लगातार नापी जाती है। ग्रेड, फॉलोअर, शरीर, प्रतिभा, कौन तुम्हें अपने ग्रुप में रखता है। सब कुछ बाहर से नापा जाता है। पौलुस की प्रार्थना उस पूरे तंत्र के आर-पार जाती है और कहती है: तुम्हारा भीतर का इंसान मजबूत हो।
तो व्यवहार में क्या? दो बातें।
एक, अपनी प्रार्थना बदलो। इस हफ्ते सिर्फ हालात के लिए मत माँगो। माँगो: "मुझे भीतर से मजबूत कीजिए, चाहे बाहर कुछ न बदले।" यह खतरनाक प्रार्थना है, क्योंकि परमेश्वर उसका जवाब दे सकते हैं और तुम्हारी परिस्थिति वैसी ही रह सकती है।
दो, कलीसिया को गंभीरता से लो। पौलुस कहता है कि परमेश्वर का ज्ञान कलीसिया के द्वारा प्रगट होता है। हाँ, वही कलीसिया जो कभी-कभी उबाऊ लगती है और जिसमें असली दरारें हैं। असली चुनौती यह है: उस समुदाय में एक ऐसे इंसान से जुड़ो जो तुमसे पूरी तरह अलग है, उम्र में, पृष्ठभूमि में, राय में, और उसे छोड़ो नहीं। यही "एक ही देह" होना दिखता है, और यही स्वर्गीय स्थानों तक संदेश भेजता है।
और जब यह सब बहुत बड़ा लगे, तो अध्याय का आखिरी वाक्य याद रखो: परमेश्वर तुम्हारी विनती और समझ से कहीं अधिक काम कर सकते हैं।
इस पर बात करो
तुम अपनी प्रार्थनाओं में सबसे ज्यादा क्या माँगते हो: कि हालात बदलें, या कि तुम भीतर से बदलो? ईमानदारी से जवाब दो, और सोचो कि यह तुम्हारे बारे में क्या बताता है।
पौलुस कहता है कि मसीह का प्रेम ज्ञान से परे है। तुम्हारे जीवन में कोई ऐसा पल है जब तुमने उस प्रेम को समझा नहीं, पर महसूस किया? और अगर नहीं, तो उस खालीपन के बारे में तुम क्या करना चाहोगे?
मिलकर प्रार्थना
परमेश्वर, आपके सामने हम घुटने टेकते हैं। हमें बाहर से मजबूत दिखने की कोशिश छोड़ने की हिम्मत दीजिए, और अपने आत्मा से हमारे भीतर के इंसान को बलवन्त कीजिए। मसीह हमारे हृदय में बसें। हमें अपने प्रेम में जड़ पकड़ने दीजिए, उस प्रेम में जिसे हम कभी पूरी तरह नाप नहीं पाएँगे। और जहाँ हमारी समझ छोटी पड़ती है, वहाँ आप हमारी विनती से कहीं अधिक कीजिए। आमीन।
इफिसियों 3 के बारे में प्रश्न
पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।
इफिसियों 3 किस विषय में है?
इफिसियों 3 क्या कहता है?
इफिसियों 3 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
किशोर इफिसियों 3 से क्या सीख सकते हैं?
इफिसियों 3 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
दूसरों ने क्या पाया
पौलुस यह बात जेल की जंजीरों में लिखता है, और फिर भी कहता है, "उस सनातन उद्देश्य के अनुसार जो उसने हमारे प्रभु मसीह यीशु में पूरा किया।" उसकी कैद परमेश्वर की योजना का टूटना नहीं थी। सोच, जो बात तुझे आज देर या चूक लगती है, वह भी शायद उसी अनन्त उद्देश्य का हिस्सा हो। परमेश्वर के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं, सिर्फ मसीह में एक ही योजना है, और तू उसमें छूटा हुआ नहीं है।
ताकि अब कलीसिया के द्वारा, स्वर्गीय स्थानों में प्रधानों और अधिकारियों पर परमेश्वर का विभिन्न प्रकार का ज्ञान प्रगट किया जाए।" सोचो, स्वर्ग के प्राणी परमेश्वर की बुद्धि देखने के लिए कहाँ ताक रहे हैं? तुम्हारी उस छोटी सी मंडली की ओर, जहाँ अलग अलग लोग एक साथ बैठते हैं। जिस भाई से मेल करना तुम्हें भारी लगता है, उसी मेल में परमेश्वर अपनी बुद्धि दिखाना चाहता है।
पौलुस ने यह नहीं कहा कि परमेश्वर की महिमा आकाश में या मन्दिर की भव्यता में हो, बल्कि लिखा, "उसी की महिमा कलीसिया में और मसीह यीशु में, सब पीढ़ियों में युगानुयुग होती रहे।" यानी उन थके, टूटे, आम लोगों के बीच जो रविवार को इकट्ठे होते हैं। तेरी वह छोटी मंडली, जिसे तू कभी कमज़ोर समझता है, परमेश्वर ने उसे ही अपनी महिमा दिखाने की जगह चुना है।
पौलुस यह नहीं कहता कि तुम अकेले मसीह के प्रेम को समझ लोगे। वह प्रार्थना करता है कि तुम "सब पवित्र लोगों के साथ भली भाँति समझने की शक्ति पाओ।" उस प्रेम की चौड़ाई, लम्बाई, ऊँचाई और गहराई इतनी बड़ी है कि एक जीवन उसे नाप नहीं सकता। इसलिए जिस भाई से तुम दूर हो गए हो, हो सकता है उसी के पास प्रेम का वह कोना हो जो तुमने अब तक नहीं देखा।
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