2 थिस्सलुनीकियों 1
किशोर (12 वर्ष और अधिक) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी
व्याख्या
यह चिट्ठी एक ऐसी मंडली को लिखी गई है जो दबाव में जी रही है। थिस्सलुनीके के विश्वासी नए थे, शायद कुछ ही महीनों के, और उनके शहर में मसीह पर विश्वास करना सामाजिक आत्महत्या जैसा था। पौलुस, सिलवानुस और तीमुथियुस उन्हें लिखते हैं, और शुरुआत में ही वे उन्हें याद दिलाते हैं कि वे कहाँ "में" हैं: "हमारे पिता परमेश्वर और प्रभु यीशु मसीह में"। यह उनका असली पता है, चाहे शहर उन्हें कुछ भी समझे।
फिर धन्यवाद आता है। पौलुस लिखते हैं कि उनका विश्वास "बहुत बढ़ता जाता है" और आपस का प्रेम भी। और ध्यान दो, यह किसी शान्त, आरामदायक माहौल में नहीं हो रहा। पद 4 में वह "उपद्रव और क्लेश" की बात करते हैं जिन्हें वे सह रहे हैं। पौलुस दूसरी मंडलियों के सामने उन पर घमण्ड करते हैं, इसलिए नहीं कि वे शानदार लोग हैं, बल्कि इसलिए कि दबाव में उनका धीरज और विश्वास दिखाई देता है।
पद 5 से चिट्ठी का लहजा गंभीर हो जाता है। पौलुस कहते हैं कि यह सब "परमेश्वर के सच्चे न्याय का स्पष्ट प्रमाण" है। फिर वे उस दिन की बात करते हैं जब प्रभु यीशु "अपने सामर्थी स्वर्गदूतों के साथ, धधकती हुई आग में स्वर्ग से प्रगट होगा"। जो सताते हैं उन्हें बदला मिलेगा, जो सताए जाते हैं उन्हें चैन। जो परमेश्वर को नहीं पहचानते और सुसमाचार को नहीं मानते, वे "प्रभु के सामने से, और उसकी शक्ति के तेज से दूर होकर अनन्त विनाश का दण्ड पाएँगे"।
और अंत में प्रार्थना: कि परमेश्वर उन्हें इस बुलाहट के योग्य समझे, और भलाई की हर इच्छा और विश्वास के हर काम को सामर्थ्य के साथ पूरा करे, ताकि यीशु का नाम उनमें महिमा पाए, और वे उसमें।
इसका अर्थ क्या है?
सबसे पहले वह बात जो शायद खटकती है। यह अध्याय आग, बदले और अनन्त विनाश की बात करता है। ऐसे शब्द हमारे कानों को कठोर लगते हैं, और उन्हें नरम कर देने का मन करता है। पर सोचो कि ये शब्द किसे लिखे गए हैं। उन लोगों को नहीं जो दूसरों को धमकाना चाहते हैं, बल्कि उन लोगों को जिनके साथ अन्याय हो रहा है। यह धमकी नहीं, यह दिलासा है। परमेश्वर कहते हैं: मैंने देखा है। जो तुम्हारे साथ हुआ, वह मेरी नज़र से नहीं छूटा। एक दिन हिसाब होगा।
यही बात दुःख को भी नया अर्थ देती है। पद 5 यह नहीं कहता कि तुम्हारा दुःख अपने आप में अच्छा है। यह कहता है कि परमेश्वर का न्याय सच्चा है, और इसलिए तुम्हारा सहना व्यर्थ नहीं। सच्चाई के लिए कीमत चुकाना इस बात का चिह्न है कि तुम किस राज्य के हो।
दूसरी बात। ध्यान दो कि पौलुस किस चीज़ के लिए धन्यवाद देते हैं। इसलिए नहीं कि मंडली बड़ी है, या कि उनके पास अच्छे संगीतकार हैं, या कि उनका जीवन सफल दिख रहा है। सिर्फ दो चीज़ें: बढ़ता हुआ विश्वास और बढ़ता हुआ प्रेम। यही परमेश्वर के लिए सफलता का पैमाना है। बाकी सब आँकड़े हैं।
और तीसरी बात, जो अक्सर छूट जाती है। पद 11 में पौलुस प्रार्थना करते हैं कि परमेश्वर "भलाई की हर एक इच्छा" को पूरा करे। यानी तुम्हारे भीतर जो अच्छा करने की चाह जागी है, वह भी परमेश्वर की देन है, और उसे पूरा करने की ताकत भी उन्हीं से आती है। मसीही जीवन "अपने बल पर बेहतर इंसान बनने" का प्रोजेक्ट नहीं है।
जोड़ने वाला सूत्र
पूरा अध्याय एक दिन की ओर देख रहा है: वह दिन जब यीशु मसीह प्रगट होंगे। पहली बार वे छिपकर आए, एक चरनी में, एक कब्ज़े वाले देश में, और अंत में एक क्रूस पर मारे गए। तब उनकी शक्ति का तेज छिपा हुआ था। दूसरी बार वे छिपकर नहीं आएँगे।
पर ध्यान दो पद 10 क्या कहता है। वे किस लिए आएँगे? "अपने पवित्र लोगों में महिमा पाने, और सब विश्वास करनेवालों में आश्चर्य का कारण होने को।" यानी उस दिन का केंद्र यह नहीं होगा कि कौन सज़ा पा रहा है। केंद्र यह होगा कि मसीह अपने लोगों में चमकेंगे। और वे लोग कोई परिपूर्ण, बेदाग नमूने नहीं हैं। वे थिस्सलुनीके के डरे हुए, सताए हुए, नए विश्वासी हैं।
यही बाइबल की पूरी कहानी है। परमेश्वर एक ऐसे लोगों को बुलाते हैं जो अपने बल पर योग्य नहीं, और अनुग्रह के द्वारा उन्हें योग्य ठहराते हैं। पद 12 इसे साफ़ कहता है: यह सब "हमारे परमेश्वर और प्रभु यीशु मसीह के अनुग्रह के अनुसार" होता है।
तुम्हारे लिए
तुम शायद इस वजह से नहीं सताए जाते कि तुम मसीही हो। पर दबाव के और भी रूप हैं। वह चुप्पी जब बातचीत ऐसी दिशा में मुड़ जाती है जहाँ तुम्हारा विश्वास हास्यास्पद लगेगा। वह पल जब सबसे आसान रास्ता होता है खुद को थोड़ा सा एडिट कर देना, थोड़ा कम मसीही दिखना, ताकि माहौल असहज न हो। यह सूली से हल्का है, पर यह वही परीक्षा है।
और यह भी हो सकता है कि तुम्हारा असली सवाल न्याय का हो। कि तुमने देखा है कि जो लोग दूसरों को कुचलते हैं वे आराम से जीते हैं, और जो ईमानदार हैं वे पिसते हैं। यह अध्याय तुमसे यह नहीं कहता कि चीज़ें उतनी बुरी नहीं। यह कहता है: तुम सही देख रहे हो, और यह हमेशा ऐसा नहीं रहेगा।
एक चुनौती, और यह हल्की नहीं है। इस हफ्ते एक ऐसी जगह पर मसीह के होने की बात मत छिपाओ जहाँ तुम आमतौर पर छिपाते हो। कोई भाषण मत दो, बस झूठ मत बोलो। और उसके बाद जो असहजता आए, उसे परमेश्वर के सामने रख दो।
दूसरी बात, वह मत सोचो कि यह तुम्हें अपनी ताकत से करना है। पौलुस की प्रार्थना याद रखो। परमेश्वर से माँगो कि वे तुम्हारे भीतर भलाई की इच्छा जगाएँ और उसे पूरा करने की सामर्थ्य दें। और अपनी मंडली के लिए, अपने दोस्तों के लिए वही प्रार्थना करना सीखो: बढ़ता हुआ विश्वास, बढ़ता हुआ प्रेम। बाकी सब बाद में।
इस पर बात करें
अगर परमेश्वर के न्याय की बात तुम्हें असहज करती है, तो पूछो कि क्यों। क्या इसलिए कि यह कठोर लगता है, या इसलिए कि तुम खुद को कठघरे में खड़ा पाते हो?
पौलुस दो चीज़ों के लिए धन्यवाद देते हैं: विश्वास और प्रेम। अगर कोई तुम्हारे जीवन को इन्हीं दो पैमानों से देखे, तो उसे क्या दिखाई देगा?
मिलकर प्रार्थना
प्रभु यीशु, आप एक दिन प्रगट होंगे, और तब सब कुछ अपनी जगह पर आ जाएगा। तब तक हमें धीरज दीजिए। हमारे भीतर भलाई की इच्छा जगाइए और उसे पूरा करने की सामर्थ्य भी दीजिए। जहाँ हम डरते हैं, वहाँ हमें साहस दीजिए, और हमारे जीवन में आपका नाम महिमा पाए। आमीन।
2 थिस्सलुनीकियों 1 के बारे में प्रश्न
पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।
2 थिस्सलुनीकियों 1 किस विषय में है?
2 थिस्सलुनीकियों 1 क्या कहता है?
2 थिस्सलुनीकियों 1 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
किशोर 2 थिस्सलुनीकियों 1 से क्या सीख सकते हैं?
2 थिस्सलुनीकियों 1 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
दूसरों ने क्या पाया
क्योंकि परमेश्वर के निकट यह न्याय है कि जो तुम्हें क्लेश देते हैं, उन्हें बदले में क्लेश दे।" पौलुस सताए हुए विश्वासियों से यह नहीं कहता कि बदला लो। वह कहता है, हिसाब परमेश्वर के हाथ में है। तेरा आँसू भूला नहीं गया। जो घाव किसी ने तुझे दिया, उसका लेखा वही रखता है जो सच्चा न्यायी है। तू अपने कंधे से यह बोझ उतार दे।
पौलुस दो बातें अलग करता है, "जो परमेश्वर को नहीं पहचानते" और जो "सुसमाचार को नहीं मानते।" यानी सुसमाचार सिर्फ जानने की खबर नहीं, मानने की पुकार है। और याद रख, ये शब्द सताए हुए विश्वासियों को लिखे गए थे, उन्हें डराने नहीं, दिलासा देने। बदला लेना परमेश्वर का काम है, तेरा नहीं। पर एक सवाल तेरे लिए बचा रहता है, तूने सुसमाचार को सिर्फ सुना है, या उसकी मानी भी है?
पौलुस उन लोगों को लिख रहा था जो सताए जा रहे थे, और उन्हें बताता है कि मसीह "अपने पवित्र लोगों में महिमा पाने" के लिये आएगा। ध्यान दे, उनके द्वारा नहीं, उनके भीतर। आज तेरा जीवन छोटा, थका और कुचला हुआ लग सकता है, फिर भी वही जगह है जहाँ वह अपनी महिमा चमकाने आ रहा है।
तुम्हारा धीरज ही सबूत है। पौलुस उन सताए हुए विश्वासियों से कहता है, "यह परमेश्वर के सच्चे न्याय का स्पष्ट चिन्ह है, कि तुम उस राज्य के योग्य ठहरो, जिसके लिये तुम दुःख भी उठाते हो।" जो आग तुम्हें मिटाने आई थी, वही तुम्हारी पहचान बन गई। सोचो, आज तुम जो चुपचाप सह रहे हो, क्या वह परमेश्वर की नज़र में व्यर्थ है?
छोटे बच्चों के लिए कुछ ढूँढ रहे हैं?
हमारे पास छोटे बच्चों (3-6 वर्ष) और प्राथमिक आयु (7-12) के लिए विशेष संस्करण भी हैं।
बच्चों की बाइबल टूल में खोलें