योएल 3
किशोर (12 वर्ष और अधिक) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी
व्याख्या
योएल 3 एक ऐसा अध्याय है जो पढ़ते समय रुककर सोचने पर मजबूर करता है। यहाँ परमेश्वर एक न्यायाधीश की तरह बोल रहे हैं। सदियों से इस्राएल के लोगों को दूसरी जातियों ने बंधुआ बनाया, बेचा, तितर-बितर किया। अब परमेश्वर कहते हैं कि वे इन सब जातियों को "यहोशापात की तराई" में इकट्ठा करेंगे। "यहोशापात" नाम का अर्थ ही है, "यहोवा न्याय करते हैं।"
आरोप गंभीर हैं। जातियों ने परमेश्वर के लोगों पर चिट्ठी डाली, जैसे कोई सस्ते सामान का बँटवारा कर रहा हो। बच्चों को वेश्यावृत्ति के बदले में और दाखमधु के बदले में बेच दिया गया (पद 3)। सोर, सीदोन और पलिश्तीन के नगरों ने मंदिर की चाँदी-सोना लूटा और यहूदी लड़के-लड़कियों को यूनानियों के हाथ बेच दिया। परमेश्वर कहते हैं, "तुम्हारा दिया हुआ बदला, तुम्हारे ही सिर पर डाल दूँगा।"
फिर दृश्य बदलता है। पद 9 से एक व्यंग्यात्मक ललकार आती है, "युद्ध की तैयारी करो।" किसान अपने हल की फाल को तलवार बना लें, हँसिया को बर्छी बना लें। यह यशायाह 2 का उल्टा है, जहाँ तलवारें हल बनती हैं। यहाँ शांति के औज़ार हथियार बन रहे हैं, क्योंकि जातियाँ परमेश्वर के विरुद्ध खड़ी होने आ रही हैं।
पद 13 में कटनी की तस्वीर है। खेत पक चुका है, दाख के हौज़ भर गए हैं, क्योंकि "उनकी बुराई बहुत बड़ी है।" यही चित्र प्रकाशितवाक्य 14 में भी मिलता है। "निबटारे की तराई" में भीड़ की भीड़ है। सूरज, चाँद, तारे अपना प्रकाश नहीं देंगे। यहोवा सिय्योन से गरजेंगे, आकाश और पृथ्वी काँपेंगे।
लेकिन इसी भयानक दृश्य के बीच एक वाक्य है जो सब कुछ बदल देता है, "परन्तु यहोवा अपनी प्रजा के लिये शरणस्थान… ठहरेगा" (पद 16)। और अंत में एक अद्भुत तस्वीर, पहाड़ों से नया दाखमधु टपकेगा, टीलों से दूध बहेगा, यहोवा के भवन से एक सोता निकलेगा।
इसका क्या मतलब है?
यह अध्याय दो सच्चाइयाँ एक साथ रखता है, जिन्हें हम अक्सर अलग करना चाहते हैं। एक तरफ, परमेश्वर का न्याय असली है। बुराई अनदेखी नहीं जाती। जो बच्चे बेचे गए, जो खून बहाया गया, जो लूटा गया, परमेश्वर उसे भूले नहीं। दूसरी तरफ, इसी परमेश्वर के पास उनके लिए शरण है जो उनके हैं।
आज की दुनिया में "न्याय" शब्द फैशन में है, हर कोई न्याय चाहता है, जब तक वह दूसरों पर लागू हो। योएल याद दिलाते हैं कि सच्चा न्याय परमेश्वर का काम है, और वह पक्षपाती नहीं है। जो जातियाँ ताकतवर लगती थीं, सोर और सीदोन के व्यापारिक शहर, वे भी उनके सामने खड़े होंगे।
यह हमें यह भी सिखाता है कि इतिहास बेकाबू नहीं है। ऐसा नहीं कि बुरे लोग जीत जाते हैं और परमेश्वर हार जाते हैं। एक दिन आएगा, "यहोवा का दिन," जब सब कुछ सही जगह पर रखा जाएगा।
जोड़ने वाला सूत्र
यीशु ने खुद मत्ती 24 में उन्हीं शब्दों का इस्तेमाल किया जो योएल 3:15 में हैं, "सूर्य और चन्द्रमा अपना प्रकाश न देंगे।" प्रकाशितवाक्य 14 में स्वर्गदूत हँसुआ लेकर पृथ्वी की फ़सल काटता है, यह सीधे योएल 3:13 से आया है।
यानी योएल जिस "यहोवा के दिन" की बात कर रहे हैं, वह यीशु के दूसरे आगमन से जुड़ा है। और यहाँ एक गहरी बात है, क्रूस पर यीशु ने वह न्याय अपने ऊपर ले लिया जो हमारे हिस्से में आना चाहिए था। जो सोता पद 18 में परमेश्वर के भवन से निकलता है, वह यीशु में पूरा होता है, जिन्होंने कहा, "जो कोई प्यासा हो वह मेरे पास आकर पीए।"
यह अध्याय जिस अंतिम तस्वीर पर खत्म होता है, दूध और दाखमधु से भरी पहाड़ियाँ, वह प्रकाशितवाक्य 21-22 की नई सृष्टि की झलक है। परमेश्वर अपने लोगों के बीच सदा के लिए वास करेंगे।
तुम्हारे लिए
तुम्हारी उम्र में यह सवाल सच में आता है, क्या न्याय जैसी कोई चीज़ है? तुम खबरें देखते हो, स्कूल में अन्याय देखते हो, शायद अपने घर में भी। कोई धोखा देकर आगे बढ़ जाता है, कोई ईमानदार होकर पीछे रह जाता है। सोशल मीडिया पर लोग एक-दूसरे को नीचा दिखाते हैं और फिर भी सब चलता रहता है।
योएल 3 कहता है, ऐसा नहीं है कि परमेश्वर देख नहीं रहे। जो बच्चे दो हज़ार साल पहले बेचे गए, उनका हिसाब भी है। जो आज बेचे जा रहे हैं, मानव तस्करी में, बाल मज़दूरी में, उनका भी हिसाब है। यह जानना डरावना भी है और राहत देने वाला भी।
लेकिन एक सवाल तुम्हें अपने आप से पूछना है, "मैं किस तरफ़ खड़ा हूँ?" पद 16 कहता है परमेश्वर अपनी प्रजा के लिए शरणस्थान हैं। शरण उन्हें मिलती है जो उनके पास आते हैं। यीशु के पास जाना, अपनी असलियत के साथ, अपने संदेहों के साथ, अपने पापों के साथ, यही वह जगह है जहाँ न्याय के दिन डर नहीं, शांति होगी।
और एक बात, कड़वाहट मत पालो। जब कोई तुम्हारे साथ अन्याय करे, बदला लेने की ज़रूरत नहीं है। परमेश्वर कहते हैं, "मैं बदला दूँगा।" तुम्हारा काम है, उनकी शरण में रहना।
बात करो इस पर
1. अगर परमेश्वर सच में न्यायी हैं, तो दुनिया में इतनी बुराई अब तक क्यों चल रही है? क्या "देर" का मतलब "अन्याय" है, या कुछ और?
2. योएल कहते हैं कि परमेश्वर अपने लोगों के लिए शरण हैं। तुम्हारे जीवन में ऐसी कौन सी चीज़ें हैं जिनसे तुम्हें सच में शरण की ज़रूरत है, और क्या तुम उन्हें परमेश्वर के सामने लाते हो?
साथ में प्रार्थना
प्रभु, आप न
योएल 3 के बारे में प्रश्न
पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।
योएल 3 किस विषय में है?
योएल 3 क्या कहता है?
योएल 3 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
किशोर योएल 3 से क्या सीख सकते हैं?
योएल 3 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
दूसरों ने क्या पाया
क्योंकि देखो, उन दिनों में और उस समय, जब मैं यहूदा और यरूशलेम को बँधुआई से लौटा लाऊँगा," परमेश्वर कहता है। ध्यान दे, लौटाने वाला वही है। जो तुझसे छीन लिया गया, वह उसे भूला नहीं है। तेरी घड़ी तेरे हाथ में नहीं, उसके हाथ में है, और वह देर से आने वाला नहीं, ठीक समय पर आने वाला है।
जिस आवाज़ से आकाश और पृथ्वी थरथराते हैं, वही आवाज़ तेरे लिए शरण बन जाती है। "परन्तु यहोवा अपनी प्रजा के लिये शरणस्थान, और इस्राएलियों के लिये गढ़ ठहरेगा।" सोच, जो गरजना जातियों को डराता है, वही तुझे ढाँप लेता है। तेरा डर इसलिए नहीं जाता कि तूफ़ान छोटा है, बल्कि इसलिए कि जो गरजता है, वह तेरी ओर है।
अपने हलों को पीटकर तलवारें, और अपनी हँसियों को पीटकर बर्छियाँ बनाओ" यह आवाहन नहीं, ताना है। परमेश्वर जातियों को उनके अपने घमंड के साथ न्याय की घाटी में बुला रहा है। और सबसे दुखद पंक्ति यह है, "जो बलहीन हो वह भी कहे, 'मैं वीर हूँ।'" कमज़ोर आदमी का खुद को योद्धा कहना। कहीं तुम भी तो अपनी उगाने वाली चीज़ों को काटने वाले हथियारों में नहीं ढाल रहे?
और मेरी प्रजा पर चिट्ठी डाली, और एक लड़के को वेश्या के बदले में दे दिया, और एक लड़की को दाखमधु के बदले में बेचकर पी गए।" एक बच्चा, एक रात के नशे के बराबर। परमेश्वर यह भूला नहीं। जिन्हें दुनिया ने सस्ता आँका, उनका मोल वह खुद चुकाता है। सोच, तूने किसे इतना कम मूल्य का समझ रखा है?
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