सभोपदेशक 6
किशोर (12 वर्ष और अधिक) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी
व्याख्या
सभोपदेशक फिर से एक बात कहता है जो सुनने में कठोर लगती है, पर वह झूठ नहीं बोल रहा। वह कहता है कि उसने सूर्य के नीचे एक बुराई देखी है जो मनुष्यों को बहुत भारी लगती है। कल्पना करो, एक व्यक्ति के पास इतना धन है, इतनी प्रतिष्ठा है कि उसे किसी चीज की कमी नहीं। जो उसका मन चाहे, वह पा सकता है। लेकिन परमेश्वर उसे उसमें से भोग करने ही नहीं देते। कोई दूसरा आकर उसका सब कुछ खा जाता है। लेखक इसे "व्यर्थ और भयानक दुःख" कहता है। यह शब्द हल्के में नहीं लिखे गए। भयानक, यानी असल में डरावना।
फिर वह एक और तस्वीर देता है, जो और भी कठोर है। एक पुरुष के सौ पुत्र हों, वह बहुत वर्ष जीवित रहे, उसकी उम्र बढ़ जाए, पर उसका मन कभी संतुष्ट न हो और मरने पर उसे ठीक से दफनाया भी न जाए। सभोपदेशक कहता है, ऐसे व्यक्ति से वह बच्चा बेहतर है जो अधूरे समय में मरा हुआ पैदा हुआ, जिसने सूरज को कभी देखा ही नहीं। यह पढ़ना कठिन है। पर लेखक का मतलब यह नहीं कि जीवन बुरा है। उसका मतलब है, बिना संतोष के लंबी उम्र और बहुत सी संतान भी खाली रह सकती है।
आगे वह कहता है कि सब मनुष्यों का परिश्रम अंततः पेट के लिए होता है, फिर भी मन नहीं भरता। बुद्धिमान और मूर्ख आखिर में एक ही जगह जाते हैं। आँखों से जो सामने है उसे देख लेना, दूर की कल्पनाओं में मन उड़ाने से बेहतर है, पर वह भी अंततः व्यर्थ और वायु को पकड़ने जैसा है। अध्याय के अंत में वह पूछता है, कौन जानता है कि मनुष्य के लिए क्या अच्छा है, कौन बता सकता है कि उसके बाद क्या होगा।
इसका मतलब क्या है?
यह अध्याय हमारी आधुनिक सोच पर सीधा प्रहार करता है। हमें सिखाया जाता है कि अगर पैसा हो, सफलता हो, नाम हो, रिश्ते हों, तो जीवन भर जाएगा। सभोपदेशक ने यह सब देखा और कहा, नहीं, ऐसा नहीं होता। एक व्यक्ति के पास सब कुछ हो सकता है और फिर भी उसका मन खाली रह सकता है। संतोष कोई चीज नहीं है जो धन खरीद सकता है।
यह भी ध्यान देने वाली बात है कि लेखक परमेश्वर को इस चित्र से बाहर नहीं रखता। वह कहता है, "परमेश्वर धन-सम्पत्ति देते हैं" पर "परमेश्वर उसको उसमें से खाने नहीं देते।" वह परमेश्वर को दोष नहीं दे रहा, पर वह ईमानदारी से मान रहा है कि जीवन में कुछ बातें हैं जो परमेश्वर के हाथ में हैं और हमारी समझ से बाहर हैं। यह किताब झूठा दिलासा नहीं देती। यह उतना ही ईमानदार है जितना कोई किताब हो सकती है।
समान सूत्र
सभोपदेशक बार-बार उस सवाल के सामने खड़ा करता है जिसका जवाब वह स्वयं नहीं दे पाता, "कौन बता सकता है कि उसके बाद सूर्य के नीचे क्या होगा?" पूरी पुरानी वाचा में यह सवाल खुला ही रह जाता है। मृत्यु के बाद क्या, संतोष कैसे मिलेगा, यह अनसुलझा रह जाता है।
यीशु मसीह इस खुले सवाल का जवाब बनकर आते हैं। वे कहते हैं कि जो भी उन पर विश्वास करता है वह मरने के बाद भी जीवित रहेगा। सभोपदेशक का लेखक नहीं जानता था कि सूर्य के नीचे मृत्यु के बाद क्या होता है, पर मसीह ने मृत्यु से बाहर आकर दिखा दिया कि सूर्य के नीचे का जीवन आखिरी बात नहीं है। और जहाँ सभोपदेशक कहता है कि मनुष्य का मन कभी नहीं भरता, वहीं यीशु कहते हैं कि जो उनके पास आता है वह फिर कभी प्यासा नहीं रहेगा। यह किसी सस्ती दिलासा की बात नहीं, यह मृत्यु और खालीपन के ठीक बीच में खड़े होकर दी गई प्रतिज्ञा है।
तुम्हारे लिए
तुम अभी उस उम्र में हो जहाँ दुनिया तुमसे कहती रहती है कि सफलता, दिखावट, लोकप्रियता ही तुम्हें भर देगी। सोशल मीडिया पर हर कोई अपने सबसे अच्छे पल दिखाता है, और तुम्हें लगता है कि बाकी सब की जिंदगी तुमसे बेहतर चल रही है। सभोपदेशक तुमसे कह रहा है, रुको और देखो, सबसे अमीर, सबसे प्रतिष्ठित व्यक्ति के पास भी वह शांति नहीं होती जो तुम सोचते हो। संतोष कोई ऐसी चीज नहीं जो अगले सेमेस्टर के नंबर, अगली नौकरी, अगला रिश्ता तुम्हें देगा।
यह मत सोचो कि यह अध्याय तुम्हें निराश करने के लिए लिखा गया है। यह तुम्हें सच के सामने खड़ा कर रहा है ताकि तुम झूठी उम्मीदों के पीछे अपना जीवन न बिता दो। जब तुम्हारा मन कहे कि "अगर मुझे यह मिल जाए तो मैं ठीक हो जाऊँगा," याद रखो कि सभोपदेशक ने वह रास्ता आजमाया और अंत में खाली हाथ रहा। जो सच में भरता है, वह बाहर से नहीं आता।
बात करें
अगर तुम्हारे पास वह सब कुछ मिल जाए जिसकी तुम अभी सबसे ज्यादा कामना करते हो, तो क्या तुम्हें लगता है कि तुम्हारा मन सच में भर जाएगा? ईमानदारी से सोचो।
सभोपदेशक कहता है कि कोई नहीं जानता कि मरने के बाद क्या होगा। तुम्हें क्या लगता है, यीशु का जी उठना इस अनिश्चितता को कैसे बदलता है, या नहीं बदलता?
संगति में प्रार्थना
प्रभु, हम मानते हैं कि हम अक्सर उन चीजों के पीछे दौड़ते हैं जो कभी हमारा मन नहीं भर पातीं। हमें सच देखने की हिम्मत दें, और हमें याद दिलाएँ कि सच्चा संतोष केवल आप में मिलता है। हमें यीशु मसीह पर टिकाए रखें, जो हमारे लिए मृत्यु से आगे का रास्ता बन गए। आमीन।
सभोपदेशक 6 के बारे में प्रश्न
पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।
सभोपदेशक 6 किस विषय में है?
सभोपदेशक 6 क्या कहता है?
सभोपदेशक 6 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
किशोर सभोपदेशक 6 से क्या सीख सकते हैं?
सभोपदेशक 6 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
दूसरों ने क्या पाया
चाहे वह दो हजार वर्ष जीवित रहे, परन्तु कुछ सुख न भोगे, तो क्या?" सुलैमान लम्बी उम्र को नहीं, बल्कि बिना स्वाद के जीने को खाली कहता है। तू भी शायद सब कुछ "बाद के लिए" बचा रहा है, रोटी, हँसी, अपनों के साथ बैठना। पर जो आज परमेश्वर के हाथ से मिला है, उसे आज ही ग्रहण कर। कल की गिनती तेरे हाथ में नहीं।
छाया के समान" जीवन बिताने वाले से सभोपदेशक पूछता है कि उसके लिए भला क्या है, और उत्तर नहीं देता। यह चुप्पी क्रूर नहीं, दयालु है। तू अपनी योजनाओं की लंबी सूची पकड़े बैठा है, पर कल का एक दिन भी तेरे हाथ में नहीं। तो आज जो सामने है, वही रोटी, वही चेहरा, वही काम, उसे परमेश्वर के हाथ से लेकर जी। छाया छोटी है, पर वह प्रकाश के कारण ही बनती है।
आँखों से देख लेना मन की चंचलता से उत्तम है: यह भी व्यर्थ और मानो वायु को पकड़ना है।"
जो तेरे हाथ में है, उसे देख। जो नहीं है, उसके पीछे मन दौड़ता रहता है, और थकता ही जाता है। सुलैमान कहता है, यह हवा पकड़ने जैसा है।
आज रुककर सोच: परमेश्वर ने जो दिया है, क्या तूने उसे सच में देखा भी है? या मन कहीं और भटक रहा है, किसी और जीवन के पीछे जो कभी तेरा था ही नहीं?
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