इफिसियों 4
किशोर (12 वर्ष और अधिक) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी
व्याख्या
पौलुस यह पत्री जेल से लिख रहा है। पहले तीन अध्यायों में उसने बताया कि परमेश्वर ने मसीह में क्या किया है। अब अध्याय 4 से वह पलटता है और कहता है, "इसलिए…" यानी अब बारी है जीने की। जो तुम्हें दिया गया है, उसके अनुसार चलो।
वह लिखता है कि हम एक ही देह हैं, एक ही आत्मा, एक ही प्रभु, एक ही विश्वास, एक ही बपतिस्मा, एक ही परमेश्वर और पिता। यह सूची पढ़ने में सूखी लग सकती है, पर पौलुस असल में विविध लोगों के एक झुंड को याद दिला रहा है कि उनकी जड़ एक ही है। यहूदी, ग़ैर-यहूदी, ग़ुलाम, आज़ाद, अमीर, ग़रीब, सब एक शरीर में।
फिर वह कहता है कि मसीह ने ऊपर चढ़कर लोगों को दान दिए। कुछ को प्रेरित, कुछ को भविष्यद्वक्ता, कुछ को सुसमाचार सुनानेवाले, कुछ को रखवाले और उपदेशक। इन दानों का मक़सद यह है कि पवित्र लोग सिद्ध हों, सेवा का काम हो, और मसीह की देह बढ़े। यह देह तब तक बढ़ती रहेगी जब तक हम सब विश्वास और मसीह की पहचान में एक न हो जाएँ।
क्यों? "ताकि हम आगे को बालक न रहें, जो मनुष्यों की ठग-विद्या और चतुराई से…इधर-उधर घुमाए जाते हों।" यहाँ पौलुस के मन में एक तस्वीर है, समुद्र में एक छोटी सी नाव, हर लहर के साथ इधर-उधर। ऐसे मत रहो। "प्रेम में सच बोलें" और मसीह में बढ़ते जाएँ।
अध्याय के दूसरे हिस्से में पौलुस बहुत सीधा हो जाता है। पुराने मनुष्यत्व को उतार डालो, नये मनुष्यत्व को पहन लो। जैसे कपड़े बदलते हैं। झूठ छोड़ो, सच बोलो। क्रोध करो पर पाप मत करो, सूरज ढलने से पहले उसे जाने दो। चोरी करनेवाला अब मेहनत करे, इसलिए कि दूसरों को दे सके। मुँह से गंदी बात नहीं, बल्कि वह बात जो सुननेवाले को उठाए। पवित्र आत्मा को शोकित मत करो। कड़वाहट, क्रोध, कलह, निन्दा दूर करो। एक दूसरे पर कृपालु और करुणामय बनो। और जैसे परमेश्वर ने मसीह में तुम्हें क्षमा किया, वैसे ही तुम भी क्षमा करो।
इसका क्या अर्थ है?
पौलुस दो चीज़ों को जोड़कर रखता है, पहचान और चालचलन। तुम कौन हो, यह पहले तय हुआ है। मसीह ने तुम्हें बुलाया, तुम्हें दान दिए, तुम पर आत्मा की छाप है। अब जो तुम हो, उसके योग्य जियो।
आज की भाषा में कहें तो यह "authenticity" या असलियत का सवाल है। पौलुस नहीं कह रहा कि तुम अच्छे बनोगे तो परमेश्वर तुम्हें स्वीकार करेगा। वह कह रहा है कि परमेश्वर ने पहले ही तुम्हें स्वीकार किया है, अब उस असलियत के मुताबिक जियो। पुराना मनुष्यत्व वह पुरानी शख़्सियत है जो झूठ, क्रोध, लालच, गंदी बातों से बनी थी। नया मनुष्यत्व वह है जो परमेश्वर के अनुसार सत्य की धार्मिकता और पवित्रता में सृजा गया है।
और यह अकेले नहीं होता। पूरा अध्याय "एक दूसरे" के इर्द-गिर्द घूमता है। एक दूसरे की सह लो, एक दूसरे पर कृपालु हो, एक दूसरे को क्षमा करो। मसीही जीवन अकेले सुधरने का प्रोजेक्ट नहीं है, यह एक शरीर का हिस्सा बनने की बात है।
बड़ी कहानी
यह अध्याय अकेला खड़ा नहीं है। पौलुस श्लोक 8 में भजन 68 का हवाला देता है, "वह ऊँचे पर चढ़ा, और बन्दियों को बाँध ले गया।" फिर वह जोड़ता है कि जो चढ़ा वह पहले उतरा भी था, पृथ्वी की निचली जगहों तक।
यह यीशु की पूरी कहानी है। स्वर्ग से उतरना, क्रूस तक जाना, मृतकों में से जी उठना, स्वर्ग में चढ़ना। और अब वहाँ से वह अपने लोगों को दान देता है। अध्याय 4 का हर उपदेश उसी क्रूस से बहता है। "जैसे परमेश्वर ने मसीह में तुम्हारे अपराध क्षमा किए, वैसे ही तुम भी एक दूसरे के अपराध क्षमा करो।" क्षमा का मापदंड यीशु का क्रूस है।
पौलुस यह भी कहता है कि पवित्र आत्मा तुम पर "छुटकारे के दिन के लिये" छाप है। एक दिन सब पूरा होगा। तब तक हम बढ़ते जाते हैं, मसीह के पूरे डील-डौल तक।
तुम्हारे लिए
तेरह-चौदह साल की उम्र से आगे कुछ चीज़ें तेज़ी से बदलती हैं। दोस्तों का दायरा, स्क्रीन पर आने वाली आवाज़ें, अपनी पहचान के सवाल। कौन कहता है तुम कौन हो? इंस्टाग्राम? स्कूल का ग्रुप? तुम्हारा अपना दिमाग़ आधी रात को?
पौलुस कहता है, तुम्हारी पहचान परमेश्वर की बुलाहट से आती है, बाहर की आवाज़ों से नहीं। और वह चाहता है कि तुम "आगे को बालक न रहो" जो हर हवा से इधर-उधर घुमाए जाओ। यह कड़ी बात है। इसका मतलब है कि हर ट्रेंड, हर opinion, हर वीडियो जो तुम्हें बहा ले जाना चाहती है, उसे परखना सीखो। सच क्या है? मसीह में क्या है?
फिर व्यावहारिक बातें। सूरज ढलने से पहले क्रोध को जाने दो। यानी वह मैसेज जो तुमने ग़ुस्से में टाइप किया है, भेजने से पहले रुको। वह बात जो तुम किसी की पीठ पीछे कहने वाले हो, रुको। मुँह से क्या निकल रहा है? क्या यह किसी को उठाता है, या गिराता है?
और शायद सबसे मुश्किल, क्षमा। किसी ने तुम्हारे साथ सचमुच ग़लत किया है। पौलुस यह हल्के में नहीं कहता। वह कहता है, मसीह ने तुम्हारे साथ जो किया, उसे देखो, फिर देखो कि तुम्हारे पास क्या है देने को।
बात करो
तुम्हारी पहचान इस वक़्त सबसे ज़्यादा किन आवाज़ों से बनती है? क्या वे आवाज़ें उस बुलाहट से मेल खाती हैं जिसकी बात पौलुस करता है?
"सूरज ढलने से पहले क्रोध जाने दो।" क्या कोई ऐसी नाराज़गी है जो तुम में बहुत दिनों से पड़ी है? उसे जाने देना कैसा दिखेगा?
प्रार्थना
प्रभु,
इफिसियों 4 के बारे में प्रश्न
पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।
इफिसियों 4 किस विषय में है?
इफिसियों 4 क्या कहता है?
इफिसियों 4 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
किशोर इफिसियों 4 से क्या सीख सकते हैं?
इफिसियों 4 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
दूसरों ने क्या पाया
और सबका एक ही परमेश्वर और पिता है, जो सब के ऊपर, और सब के मध्य में, और सब में है।" ध्यान दे, पौलुस यह बात कलीसिया की फूट के बीच लिख रहा है। जिस भाई से तेरा मन खिंचा हुआ है, उसी के भीतर भी वही पिता बसा है। उसे ठुकराते समय तू किसे दूर कर रहा है?
हर एक अंग के ठीक-ठीक कार्य करने से" शरीर बढ़ता है। यानी जोड़ भी ज़रूरी है, वह हिस्सा जो दिखता नहीं, बस दो को थामे रखता है। शायद कलीसिया में तुम्हारा काम वही है, किसी को जोड़े रखना, थामे रखना। छोटा लगता है? पर तुम्हारे बिना देह वहीं रुक जाती है। और यह सब बढ़ोतरी एक ही दिशा में है, प्रेम में।
जीत के बाद राजा लूट का माल अपने लोगों में बाँटता था। मसीह भी ऊँचे पर चढ़ा, पर जीत अपने पास नहीं रखी: "वह ऊँचे पर चढ़ा और बन्धुवाई को बन्दी बनाकर ले गया, और मनुष्यों को दान दिए।" जो तुझे बाँधे रखता था, अब वही उसका बन्दी है। और तेरे भीतर जो वरदान है, वह उसी विजय का हिस्सा है। उसे दबाकर मत रख।
चोरी करनेवाला फिर चोरी न करे; बल्कि भले काम करने में अपने हाथों से परिश्रम करे, इसलिये कि जिसे प्रयोजन हो, उसे देने को उसके पास कुछ हो।"
रुकिए और देखिए, पौलुस केवल यह नहीं कहते कि चोरी छोड़ो। वह उन्हीं हाथों को नया काम देते हैं। जो हाथ लेने के लिए बढ़ते थे, वही अब देने के लिए मेहनत करें।
क्या आपका परिश्रम केवल अपने लिए है, या उसमें किसी ज़रूरतमंद का हिस्सा भी छिपा है?
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