यहेजकेल 17
किशोर (12 वर्ष और अधिक) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी
व्याख्या
यहेजकेल एक पुरोहित था जो निर्वासन में, बाबेल की नदियों के किनारे बैठा था। उसका देश अभी पूरी तरह गिरा नहीं था, पर दरारें साफ दिख रही थीं। और परमेश्वर उसे एक पहेली सुनाने को कहते हैं। ध्यान दें: उपदेश नहीं, पहेली। "क्या तुम इन बातों का अर्थ नहीं समझते?" (पद 12) एक ऐसा सवाल है जो सुनने वाले को सोचने पर मजबूर करता है।
पहेली यह है: एक बड़ा उकाब, लंबे पंखों वाला, रंग-बिरंगा, लबानोन तक उड़ता है और देवदार की सबसे ऊपर की कोमल टहनी तोड़ लेता है। उसे "व्यापारियों के एक नगर" में ले जाकर रख देता है। फिर वही उकाब देश का कुछ बीज लेकर उपजाऊ जमीन में, भरपूर पानी के पास बोता है। वह बीज अंगूर की एक लता बन जाता है। छोटी, फैलनेवाली, हरी। उकाब की ओर झुकी हुई।
फिर दूसरा उकाब आता है, वैसा ही बड़ा। और वह लता, जो पानी और अच्छी मिट्टी में लगाई गई थी, अपनी जड़ें और डालियाँ उस दूसरे उकाब की ओर खींचने लगती है। जिसने उसे लगाया, उसे छोड़कर वह किसी और की छाया चाहती है। परमेश्वर का सवाल कठोर है: "क्या वह फूले फलेगी?" (पद 9)। नहीं। उसे उखाड़ने के लिए बड़ी सेना की जरूरत भी नहीं पड़ेगी। पुरवाई हवा एक बार चलेगी और वह अपनी ही क्यारी में सूख जाएगी।
पद 11 से परमेश्वर पहेली खोल देते हैं। पहला उकाब बाबेल का राजा है। उसने यरूशलेम पर चढ़ाई की, राजा और प्रधानों को बंदी बनाकर ले गया, और राजवंश के एक व्यक्ति को गद्दी पर बैठाया। उससे एक वाचा बाँधी और शपथ खिलाई: तुम अधीन रहोगे। वह राज्य कमजोर रहेगा, पर वाचा पालने से टिका रहेगा। दूसरा उकाब मिस्र है। यरूशलेम का यह राजा शपथ तोड़कर, चुपके से मिस्र में दूत भेजता है, घोड़े और सेना माँगता है। उसे लगता है कि यही बचने का रास्ता है।
परमेश्वर का उत्तर सुनिए, क्योंकि यहाँ बात राजनीति से बहुत आगे बढ़ जाती है। परमेश्वर नहीं कहते, "उसने बाबेल की शपथ तोड़ी।" वे कहते हैं: "उसने मेरी शपथ तुच्छ जानी, और मेरी वाचा तोड़ी है" (पद 19)। एक मूर्तिपूजक सम्राट के सामने खाई गई कसम, परमेश्वर उसे अपनी कसम कहते हैं। क्योंकि वह उनके नाम पर खाई गई थी। और जब वह टूटी, तो परमेश्वर उसे व्यक्तिगत विश्वासघात मानते हैं: "उस विश्वासघात का मुकद्दमा उससे लड़ूँगा, जो उसने मुझसे किया है" (पद 20)। फिरौन नहीं आएगा। सेना नहीं बचाएगी। वह राजा बाबेल में मरेगा।
इसका अर्थ क्या है?
पहली बात जो चुभती है: परमेश्वर टूटे हुए वचनों को गंभीरता से लेते हैं। हमारी दुनिया में वादा एक विकल्प है। "मैं आऊँगा" का मतलब "अगर कुछ बेहतर न मिला"। रिश्ते में कही गई बातें, कमिटमेंट, दोस्ती में दी गई कसमें, सब बदलती परिस्थितियों के अधीन हैं। यहेजकेल 17 कहता है: परमेश्वर सुन रहे थे जब आपने वह बात कही। वे झूठ को कूटनीति नहीं, विश्वासघात कहते हैं।
दूसरी बात और गहरी है। वह लता मरी नहीं क्योंकि उसके पास पानी नहीं था। पद 8 साफ है: वह अच्छी भूमि में, बहुत जल के पास लगाई गई थी, ताकि फल लाए। उसकी मौत का कारण असंतोष था। उसे लगा कि दूसरे उकाब की छाया में जीवन ज्यादा सुरक्षित होगा। वह जड़ें वहाँ फैलाने लगी जहाँ जीवन नहीं था।
यह डर की कहानी है, विद्रोह से भी ज्यादा। वह राजा एक कमजोर राज्य का कमजोर शासक था और उसे यह मंजूर नहीं था। सिर उठाने की चाह, बड़ा दिखने की चाह, किसी शक्तिशाली की छत्रछाया में सुरक्षित महसूस करने की चाह। इसी ने उसे सुखा दिया। परमेश्वर उसे छोटे बने रहने के लिए बुला रहे थे, और छोटा बने रहना उसे मौत से भी बुरा लगा।
जुड़ा हुआ सूत्र
अध्याय यहीं खत्म हो सकता था, एक सूखी लता और एक कब्र के साथ। पर पद 22 में परमेश्वर कहते हैं: "मैं भी।" उकाब ने एक कोमल टहनी तोड़ी थी और उसे व्यापारियों के शहर में रख दिया था। अब परमेश्वर स्वयं एक कोमल कनखा तोड़ेंगे और उसे इस्राएल के ऊँचे पर्वत पर लगाएँगे। और वह कमजोर टहनी एक बलवंत, उत्तम देवदार बनेगी, जिसकी छाया में हर किस्म के पक्षी बसेरा करेंगे।
यह वादा दाऊद के घराने के बारे में है, और मसीहा के बारे में। एक कोमल कनखा, जो नासरत से आया, जिसमें कोई राजनीतिक ताकत नहीं थी, कोई सेना नहीं। लेकिन उसकी छाया में हर जाति के लोग आ गए। "भाँति-भाँति के सब पक्षी" यहूदी और अन्यजातियाँ दोनों हैं।
और अंत में परमेश्वर अपना हस्ताक्षर करते हैं: उन्होंने ऊँचे वृक्ष को नीचा और नीचे वृक्ष को ऊँचा किया, हरे को सूखा और सूखे को हरा भरा। यही परमेश्वर का तरीका है। जो खुद को ऊँचा करता है वह सूख जाता है; जो खुद को उनके हाथ में सौंपता है, उसे वे उठाते हैं। यीशु मसीह ने यही जिया, और क्रूस तक इसी में टिके रहे।
आपके लिए
आपके जीवन में भी उकाब उड़ते हैं। वे आपको सुरक्षा और महत्व का वादा करते हैं: वह ग्रुप जिसमें शामिल होने के लिए आप अपने विश्वास पर चुप रह जाते हैं, वे नंबर जो तय करते हैं कि आप कीमती हैं या नहीं, वह रिश्ता जिसमें आप अपने सिद्धांत गिरवी रख रहे हैं। और सबसे दर्दनाक सच यह है: आप वहाँ जड़ें फैला रहे हैं जबकि परमेश्वर ने आपको पानी के पास लगाया है।
तो एक ईमानदार सवाल: पिछले महीने आपने किससे कहा था कि आप कुछ करेंगे, और नहीं किया? परमेश्वर उसे भूले नहीं हैं, क्योंकि वे वचनों को हमसे ज्यादा गंभीरता से लेते हैं। एक कदम उठाइए। उस व्यक्ति के पास जाइए और सच बोलिए, बहाना नहीं।
और दूसरा: छोटा बने रहना सीखिए। जहाँ परमेश्वर ने आपको रखा है, वहाँ फल लाइए, भले वह जगह आपकी योजना से छोटी हो। क्योंकि वे सूखे वृक्ष को हरा भरा करते हैं, और आपके ऊँचा होने के लिए किसी उकाब की जरूरत नहीं है।
इस पर बात करें
आपके जीवन का "दूसरा उकाब" कौन या क्या है, जिसकी ओर आप जड़ें फैलाते हैं जब परमेश्वर पर भरोसा करना बहुत जोखिम भरा लगता है?
परमेश्वर ने एक मूर्तिपूजक राजा के सामने खाई गई शपथ को "मेरी शपथ" कहा। इससे उन वादों के बारे में क्या बदलता है जो आप उन लोगों से करते हैं जिनकी परवाह भी आप नहीं करते?
मिलकर प्रार्थना
प्रभु, आप देखते हैं कि मैं कहाँ जड़ें फैला रहा हूँ। मुझे उन जगहों से खींच लाइए जहाँ जीवन नहीं है। मुझे उस बात पर टिके रहने का साहस दीजिए जो मैंने कही है, और उस जगह पर संतोष दीजिए जहाँ आपने मुझे लगाया है। यीशु मसीह की छाया में मुझे बसेरा दीजिए, क्योंकि वही वह देवदार हैं जिसे आपने लगाया। आमीन।
यहेजकेल 17 के बारे में प्रश्न
पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।
यहेजकेल 17 किस विषय में है?
यहेजकेल 17 क्या कहता है?
यहेजकेल 17 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
किशोर यहेजकेल 17 से क्या सीख सकते हैं?
यहेजकेल 17 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
दूसरों ने क्या पाया
वह दाखलता सूखी ज़मीन में नहीं लगाई गई थी। उसे पानी मिला था, बढ़ने की जगह मिली थी। फिर भी उसने अपनी जड़ें दूसरे उकाब की ओर फैला दीं। और परमेश्वर पूछते हैं, "क्या वह फूले फलेगी?" उसे उखाड़ने के लिए बड़ी सेना की ज़रूरत भी नहीं पड़ी।
आज तेरी जड़ें किस ओर बढ़ रही हैं? जहाँ परमेश्वर ने तुझे लगाया है, वहाँ का पानी क्या सच में कम है?
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