12 वर्ष और उससे अधिक आयु के किशोर के लिए

मत्ती 11

किशोर (12 वर्ष और अधिक) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

व्याख्या

यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाला जेल में बंद है। वही यूहन्ना जिसने यीशु को यरदन नदी में बपतिस्मा दिया था, जिसने बड़ी हिम्मत से लोगों को पश्चाताप का प्रचार किया था। अब वह एक अंधेरी कोठरी में बैठा है, और उसके भीतर एक सवाल उठता है जो उसे शायद खुद भी हैरान करता होगा: "क्या आप वही हैं जिनके आने की हम राह देख रहे थे, या हम किसी और की प्रतीक्षा करें?"

यह सवाल छोटा नहीं है। यूहन्ना ने अपना पूरा जीवन इसी उम्मीद पर लगा दिया था कि मसीह आ रहे हैं। और अब जब वह जेल में है, तो शक की परछाई उसके मन में उतर आती है।

यीशु उसे डाँटते नहीं। वे उसके शक पर नाराज़ नहीं होते। वे बस उसे बताते हैं कि क्या हो रहा है: अंधे देखते हैं, लंगड़े चलते हैं, कोढ़ी शुद्ध किए जाते हैं, बहरे सुनते हैं, मुर्दे जिलाए जाते हैं, और गरीबों को सुसमाचार सुनाया जाता है। ये वही चिन्ह हैं जिनकी भविष्यद्वाणी यशायाह ने की थी। और फिर वे एक अजीब आशीष जोड़ते हैं: "धन्य है वह, जो मेरे कारण ठोकर न खाए।"

इसके बाद यीशु भीड़ की ओर मुड़ते हैं और यूहन्ना की तारीफ करते हैं। वे कहते हैं, यूहन्ना कोई कमज़ोर आदमी नहीं था, कोई हवा से हिलनेवाला सरकंडा नहीं। वह भविष्यद्वक्ताओं से भी बड़ा था, वही दूत जिसके बारे में मलाकी ने लिखा था।

फिर यीशु उस पीढ़ी की तुलना बाजार में बैठे उन बच्चों से करते हैं जो शिकायत करते हैं, हमने बाँसुरी बजाई, तुम नाचे नहीं; हमने विलाप किया, तुम रोए नहीं। यूहन्ना उपवास करता आया, तो लोगों ने कहा उसमें दुष्टात्मा है। यीशु खाते-पीते आए, तो लोगों ने उन्हें पेटू कहा। लोग बहाना ढूँढ ही लेते हैं।

यीशु उन शहरों को उलाहना देते हैं जहाँ उन्होंने सबसे अधिक चमत्कार किए, पर लोगों ने मन नहीं फिराया। खुराजीन, बैतसैदा, कफरनहूम, ये धार्मिक शहर थे। यीशु कहते हैं, न्याय के दिन सदोम की दशा तुमसे बेहतर होगी। यह चौंकानेवाली बात है।

और फिर, अचानक, अध्याय का सुर बदल जाता है। यीशु ऊपर देखते हैं और प्रार्थना करते हैं: "हे पिता, मैं आपका धन्यवाद करता हूँ, कि आपने इन बातों को ज्ञानियों से छिपा रखा, और बालकों पर प्रगट किया।"

और फिर वह न्यौता आता है, जो शायद पूरे नए नियम की सबसे कोमल पंक्तियों में से एक है: "हे सब परिश्रम करनेवालों और बोझ से दबे लोगों, मेरे पास आओ; मैं तुम्हें विश्राम दूँगा।"

इसका क्या अर्थ है?

यह अध्याय एक साथ बहुत कुछ करता है। सबसे पहले, यह ईमानदार है। यह छिपाता नहीं कि यूहन्ना, वही महान भविष्यद्वक्ता, शक के दौर से गुज़रा। विश्वास हमेशा साफ आसमान नहीं होता। कभी-कभी वह जेल की कोठरी में उठा एक सवाल भी होता है।

दूसरा, यीशु का उत्तर दिलचस्प है। वे यूहन्ना को कोई तर्क नहीं देते। वे कहते हैं: देखो क्या हो रहा है। इस बात पर ध्यान दो कि परमेश्वर का राज्य कैसा दिखता है। यह ताकत, तख्तापलट, या रोमी शासन के अंत जैसा नहीं दिखता। यह टूटे हुए लोगों के चंगे होने जैसा दिखता है।

तीसरा, यीशु के "जुए" की बात। उस समय के धर्मगुरु लोगों पर सैकड़ों नियमों का बोझ लादते थे। यीशु कहते हैं, मेरा जूआ अलग है। मेरा जूआ सहज है। मैं परमेश्वर को जानने का एक नया तरीका लेकर आया हूँ, जो थकाता नहीं, विश्राम देता है।

बड़ी कहानी से जुड़ाव

पूरा पुराना नियम एक व्यक्ति की ओर इशारा कर रहा था। यूहन्ना उस लंबी कतार का आखिरी भविष्यद्वक्ता था। उसके बाद, "वे" आते हैं। यीशु खुद यहाँ जो कर रहे हैं, वह यशायाह 35 और 61 अध्यायों की भविष्यद्वाणियों को पूरा कर रहा है।

और वह पिता के साथ अपने अनोखे रिश्ते के बारे में कहते हैं: "कोई पुत्र को नहीं जानता, केवल पिता; और कोई पिता को नहीं जानता, केवल पुत्र।" यह त्रिएकत्व की झलक है। परमेश्वर को जानने का रास्ता यीशु से होकर जाता है, किसी और से नहीं।

तुम्हारे लिए

तुम्हारी उम्र में एक बड़ा बोझ है जिसका नाम कोई नहीं लेता। अच्छे नंबर लाओ, अच्छे दिखो, दोस्तों में लोकप्रिय रहो, सोशल मीडिया पर सही तस्वीर बनाओ, माता-पिता की उम्मीदों पर खरे उतरो, और साथ में शायद "अच्छा मसीही" भी बनो। थकान असली है।

यीशु उस थकान को जानते हैं। "हे सब परिश्रम करनेवालों और बोझ से दबे लोगों, मेरे पास आओ।" यह कोई भावुक कविता नहीं है। यह एक असली न्यौता है।

पर ध्यान दो, वे यह नहीं कहते कि जूआ हट जाएगा। वे कहते हैं, मेरा जूआ लो। यीशु के पीछे चलने का मतलब है कि तुम्हारे कंधे पर कुछ आएगा, पर वह वजन सही किस्म का होगा। ऐसा वजन जो तुम्हें तोड़ता नहीं, बनाता है।

और अगर तुम्हारे मन में यूहन्ना जैसे सवाल हैं, "क्या आप सचमुच वही हैं?", तो जान लो कि यीशु ऐसे सवालों से नाराज़ नहीं होते। शक विश्वास का शत्रु नहीं, कई बार उसका रास्ता होता है। पर शक को ईमानदारी से यीशु के सामने रखो, न कि अपने भीतर सड़ने दो।

इस पर बात करें

पहला: यूहन्ना जेल में था और उसे शक हुआ। तुम्हारे "जेल" कौन से हैं, यानी वे परिस्थितियाँ जहाँ तुम्हारा विश्वास डगमगाता है? और तुम आमतौर पर उन शकों का क्या करते हो?

*दूसरा: यीशु कहते हैं उनका जूआ हलका है। पर सच में, क्या मसीही जीवन तुम्हें हलका लगता है, या भारी? अगर भारी लगता है, तो शायद तुम कौन सा जूआ ढो रहे हो ज

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मत्ती 11 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

मत्ती 11 किस विषय में है?
यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाला जेल में बंद है। वही यूहन्ना जिसने यीशु को यरदन नदी में बपतिस्मा दिया था, जिसने बड़ी हिम्मत से लोगों को पश्चाताप का प्रचार किया था। अब वह एक अंधेरी कोठरी में बैठा है, और उसके भीतर एक सवाल उठता है जो उसे शायद खुद भी हैरान करता होगा: "क्या आप वही हैं जिनके आने की हम राह देख रहे थे, या हम किसी और की प्रतीक्षा करें?
मत्ती 11 क्या कहता है?
फिर यीशु उस पीढ़ी की तुलना बाजार में बैठे उन बच्चों से करते हैं जो शिकायत करते हैं, हमने बाँसुरी बजाई, तुम नाचे नहीं; हमने विलाप किया, तुम रोए नहीं। यूहन्ना उपवास करता आया, तो लोगों ने कहा उसमें दुष्टात्मा है। यीशु खाते-पीते आए, तो लोगों ने उन्हें पेटू कहा। लोग बहाना ढूँढ ही लेते हैं।
मत्ती 11 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
यह अध्याय एक साथ बहुत कुछ करता है। सबसे पहले, यह ईमानदार है। यह छिपाता नहीं कि यूहन्ना, वही महान भविष्यद्वक्ता, शक के दौर से गुज़रा। विश्वास हमेशा साफ आसमान नहीं होता। कभी-कभी वह जेल की कोठरी में उठा एक सवाल भी होता है।
किशोर मत्ती 11 से क्या सीख सकते हैं?
और वह पिता के साथ अपने अनोखे रिश्ते के बारे में कहते हैं: "कोई पुत्र को नहीं जानता, केवल पिता; और कोई पिता को नहीं जानता, केवल पुत्र।" यह त्रिएकत्व की झलक है। परमेश्वर को जानने का रास्ता यीशु से होकर जाता है, किसी और से नहीं।
मत्ती 11 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
और अगर तुम्हारे मन में यूहन्ना जैसे सवाल हैं, "क्या आप सचमुच वही हैं?", तो जान लो कि यीशु ऐसे सवालों से नाराज़ नहीं होते। शक विश्वास का शत्रु नहीं, कई बार उसका रास्ता होता है। पर शक को ईमानदारी से यीशु के सामने रखो, न कि अपने भीतर सड़ने दो।

दूसरों ने क्या पाया

अंतर्दृष्टि संपादकीय

In Matthew 11 Jesus says: come to me, all you who are weary and burdened. Not come once you have recovered, not come when you try harder, but come right now. Grace is not a reward for those who make it, it is a hand for those who don't.

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 16

मैं इस पीढ़ी की तुलना किस से करूँ?" यीशु बच्चों के एक खेल की याद दिलाते हैं, जहाँ कोई साथ देना ही नहीं चाहता। बाँसुरी बजी, कोई नाचा नहीं; विलाप हुआ, कोई रोया नहीं। यूहन्ना उपवास करता आया, तो दोष लगा; यीशु खाता पीता आया, तो भी दोष लगा। असल बात यह थी कि मन पहले ही तय कर चुका था। कहीं तू भी परमेश्वर से उत्तर नहीं, बहाने ही न ढूँढ़ रहा हो?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 30

जूआ कभी अकेले के लिए नहीं बनता, वह दो बैलों को जोड़ता है। यीशु कहते हैं, "क्योंकि मेरा जूआ सहज और मेरा बोझ हल्का है।" हल्का इसलिए नहीं कि काम खत्म हो गया, बल्कि इसलिए कि तू अब अकेला नहीं खींच रहा। जो बोझ तुझे कल रात तक कुचल रहा था, क्या तूने उसे उनके साथ बाँटा है, या अब भी अपने ही कंधे पर ढो रहा है?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 3

यूहन्ना, वही जिसने यरदन में यीशु पर स्वर्ग खुलते देखा था, अब जेल की कोठरी से पूछता है, "क्या आनेवाला तू ही है, या हम किसी दूसरे की प्रतीक्षा करें?" उसका सवाल पाप नहीं था, अंधेरे की सच्चाई थी। और यीशु ने उसे डाँटा नहीं। तेरे मन में भी अगर ऐसा सवाल उठता है, तो उसे दबा मत। उसे यीशु तक पहुँचा दे, जैसे यूहन्ना ने किया।

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