12 वर्ष और उससे अधिक आयु के किशोर के लिए

गलातियों 3

किशोर (12 वर्ष और अधिक) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

व्याख्या

पौलुस यहाँ शिष्टाचार भूल जाता है। वह चिट्ठी की शुरुआत तारीफ से नहीं, बल्कि एक झिड़की से करता है: "हे निर्बुद्धि गलातियों, किसने तुम्हें मोह लिया?" यह वैसा ही है जैसे कोई शिक्षक क्लास में आकर बिना भूमिका के कहे: तुमने यह कैसे कर लिया?

क्या हुआ था? गलातिया की कलीसियाओं में लोग मसीह पर विश्वास करके शुरू हुए थे। उन्होंने पवित्र आत्मा को पाया, उनके बीच परमेश्वर की सामर्थ्य के काम हुए, और उन्होंने इस विश्वास के कारण दुःख भी उठाया। फिर कुछ शिक्षक आए जिन्होंने कहा: ठीक है, मसीह पर विश्वास तो अच्छा है, पर पूरे परमेश्वर के लोग बनने के लिए तुम्हें व्यवस्था के नियम भी निभाने होंगे। खतना, नियम, पालन, तब तुम पूरे हो।

पौलुस इसके खिलाफ एक सीधा सवाल रखता है: "तुम ने पवित्र आत्मा को, क्या व्यवस्था के कामों से, या विश्वास के समाचार से पाया?" उत्तर सबको मालूम है। कुछ भी कमाने से पहले परमेश्वर ने खुद को दे दिया था। तो फिर आत्मा से शुरू करके शरीर के प्रयासों पर खत्म क्यों होना?

इसके बाद पौलुस पीछे, बहुत पीछे जाता है, अब्राहम तक। मूसा की व्यवस्था से भी चार सौ तीस साल पहले। अब्राहम के पास न मंदिर था, न नियमों की किताब। उसके पास एक प्रतिज्ञा थी और उस पर भरोसा। "अब्राहम ने तो परमेश्वर पर विश्वास किया और यह उसके लिये धार्मिकता गिनी गई।" तो अब्राहम की असली सन्तान कौन है? खून के रिश्ते वाले नहीं, बल्कि विश्वास करनेवाले।

फिर पौलुस व्यवस्था के बारे में एक कठोर सच बोलता है। जो व्यवस्था के कामों पर भरोसा रखता है, वह श्राप के अधीन है, क्योंकि लिखा है कि जो सब बातों के करने में स्थिर नहीं रहता, वह श्रापित है। सब बातें। लगातार। बिना चूक। कोई इस परीक्षा में पास नहीं होता।

और यहीं क्रूस खड़ा है। "मसीह ने जो हमारे लिये श्रापित बना, हमें मोल लेकर व्यवस्था के श्राप से छुड़ाया।" पौलुस व्यवस्थाविवरण से हवाला देता है: "जो कोई काठ पर लटकाया जाता है वह श्रापित है।" वह श्राप, जो हमारा था, यीशु ने अपने ऊपर ले लिया।

तो व्यवस्था बेकार थी? नहीं। पौलुस कहता है वह अपराधों के कारण दी गई और वह हमारी शिक्षक थी, वह हमें मसीह तक पहुँचाने वाली संरक्षिका थी। उस समय के अमीर घरों में एक सेवक होता था जो बच्चे को स्कूल तक ले जाता, उस पर नजर रखता, उसे अनुशासन में रखता। जरूरी, पर अस्थायी। जब बच्चा बड़ा हो जाता है, वह भूमिका खत्म हो जाती है।

और अंत बहुत ऊँचा है: तुम सब विश्वास के द्वारा परमेश्वर की सन्तान हो। जिन्होंने बपतिस्मा लिया, उन्होंने मसीह को पहन लिया, जैसे कोई कपड़ा पहनता है। "अब न कोई यहूदी रहा और न यूनानी; न कोई दास, न स्वतंत्र; न कोई नर, न नारी; क्योंकि तुम सब मसीह यीशु में एक हो।"

इसका अर्थ क्या है?

यह अध्याय एक ही सवाल के इर्द-गिर्द घूमता है: परमेश्वर के सामने मेरा स्थान किस चीज पर टिका है, मेरे प्रदर्शन पर या उनकी प्रतिज्ञा पर?

गलातिया के लोग मूर्ख नहीं थे। वे सिर्फ इंसान थे। और इंसान को कमाया हुआ प्यार ज्यादा सुरक्षित लगता है, क्योंकि उस पर हमारा नियंत्रण रहता है। मुफ्त में मिली स्वीकृति डरावनी होती है, क्योंकि उसमें हमारे हाथ खाली रहते हैं।

पौलुस कहता है: यह रास्ता बंद है। नियमों का पालन तुम्हें धर्मी नहीं बना सकता, क्योंकि व्यवस्था कभी जीवन देने के लिए नहीं दी गई थी। वह आईने की तरह है। वह दिखाती है कि हम कहाँ चूक गए, पर वह हमें बदल नहीं सकती। जो व्यवस्था को उद्धार का सीढ़ी बनाता है, वह हर बार गिरता है।

मुख्य सूत्र

इस अध्याय का केंद्र आयत 13 है, और वहाँ पूरी बाइबल एक साथ आ जाती है। परमेश्वर ने अब्राहम से प्रतिज्ञा की थी कि उसके द्वारा सब जातियाँ आशीष पाएँगी। पौलुस बताता है कि उस प्रतिज्ञा का वंश एक ही व्यक्ति है, और वह मसीह है।

चार सौ तीस साल बाद आई व्यवस्था उस प्रतिज्ञा को रद्द नहीं कर सकी। परमेश्वर ने अपनी बात नहीं बदली। और जब समय आया, वही प्रतिज्ञा का वंश काठ पर लटका, श्राप बनकर, ताकि अब्राहम की आशीष उन तक भी पहुँचे जो अब्राहम के परिवार से बाहर थे। तुम्हारे और मेरे तक।

यह मसीही विश्वास का दिल है: परमेश्वर ने बदला नहीं लिया, उन्होंने कीमत चुकाई।

तुम्हारे लिए

तुम एक ऐसी दुनिया में जी रहे हो जो लगातार तुमसे साबित करने को कहती है। नंबर, दिखावट, फॉलोअर, माता-पिता की उम्मीदें, दोस्तों की नजर। और यह मानसिकता चुपचाप विश्वास में भी घुस आती है: अगर मैं ज्यादा प्रार्थना करूँ, ज्यादा अच्छा बनूँ, ज्यादा नियम निभाऊँ, तब परमेश्वर मुझसे खुश होंगे।

गलातियों 3 इस सोच को तोड़ता है। तुम परमेश्वर की सन्तान हो, इसलिए नहीं कि तुमने कुछ हासिल किया, बल्कि इसलिए कि तुमने मसीह को पहन लिया है। तुम्हारी पहचान तुम्हारे रिकॉर्ड पर नहीं, उनके काम पर टिकी है।

और आयत 28 में एक चुनौती है जो आराम से बैठने नहीं देती। यहूदी और यूनानी, दास और स्वतंत्र, नर और नारी, ये सारी दीवारें मसीह में गिर जाती हैं। तुम्हारे स्कूल में, कॉलेज में, ग्रुप चैट में भी दीवारें हैं। जाति, पैसा, भाषा, कौन कूल है और कौन नहीं। असली चुनौती यह है: इस हफ्ते जानबूझकर उस व्यक्ति के पास बैठो या उससे बात करो जिसे तुम्हारा ग्रुप गिनता ही नहीं। अगर मसीह में सब एक हैं, तो यह बात तुम्हारे व्यवहार में दिखनी चाहिए, वरना यह सिर्फ एक अच्छी आयत है।

इस पर बात करें

तुम्हारे भीतर वह आवाज कब सबसे तेज बोलती है जो कहती है "तुम अभी काफी नहीं हो"? और तुम आमतौर पर उसका जवाब कैसे देते हो, प्रदर्शन बढ़ाकर या प्रतिज्ञा पर भरोसा करके?

अगर मसीह में कोई भेद नहीं रहा, तो तुम्हारे जीवन की कौन सी दीवार वास्तव में गिरनी चाहिए, और वह अभी तक क्यों खड़ी है?

मिलकर प्रार्थना

परमेश्वर, हम अक्सर आपका प्यार कमाने की कोशिश करते हैं, जबकि आपने वह पहले ही दे दिया है। हमें याद दिलाइए कि हमारा स्थान आपके सामने मसीह के काम पर टिका है, हमारे प्रदर्शन पर नहीं। हमारे भीतर की दीवारें तोड़िए, और हमें सिखाइए कि हम आपकी सन्तान की तरह जीएँ। आमीन।

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गलातियों 3 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

गलातियों 3 किस विषय में है?
पौलुस यहाँ शिष्टाचार भूल जाता है। वह चिट्ठी की शुरुआत तारीफ से नहीं, बल्कि एक झिड़की से करता है: "हे निर्बुद्धि गलातियों, किसने तुम्हें मोह लिया?" यह वैसा ही है जैसे कोई शिक्षक क्लास में आकर बिना भूमिका के कहे: तुमने यह कैसे कर लिया?
गलातियों 3 क्या कहता है?
फिर पौलुस व्यवस्था के बारे में एक कठोर सच बोलता है। जो व्यवस्था के कामों पर भरोसा रखता है, वह श्राप के अधीन है, क्योंकि लिखा है कि जो सब बातों के करने में स्थिर नहीं रहता, वह श्रापित है। सब बातें। लगातार। बिना चूक। कोई इस परीक्षा में पास नहीं होता।
गलातियों 3 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
यह अध्याय एक ही सवाल के इर्द-गिर्द घूमता है: परमेश्वर के सामने मेरा स्थान किस चीज पर टिका है, मेरे प्रदर्शन पर या उनकी प्रतिज्ञा पर?
किशोर गलातियों 3 से क्या सीख सकते हैं?
चार सौ तीस साल बाद आई व्यवस्था उस प्रतिज्ञा को रद्द नहीं कर सकी। परमेश्वर ने अपनी बात नहीं बदली। और जब समय आया, वही प्रतिज्ञा का वंश काठ पर लटका, श्राप बनकर, ताकि अब्राहम की आशीष उन तक भी पहुँचे जो अब्राहम के परिवार से बाहर थे। तुम्हारे और मेरे तक।
गलातियों 3 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
और आयत 28 में एक चुनौती है जो आराम से बैठने नहीं देती। यहूदी और यूनानी, दास और स्वतंत्र, नर और नारी, ये सारी दीवारें मसीह में गिर जाती हैं। तुम्हारे स्कूल में, कॉलेज में, ग्रुप चैट में भी दीवारें हैं। जाति, पैसा, भाषा, कौन कूल है और कौन नहीं। असली चुनौती यह है: इस हफ्ते जानबूझकर उस व्यक्ति के पास बैठो या उससे बात करो जिसे तुम्हारा ग्रुप गिनता ही नहीं। अगर मसीह में सब एक हैं, तो यह बात तुम्हारे व्यवहार में दिखनी चाहिए, वरना यह सिर्फ एक अच्छी आयत है।

दूसरों ने क्या पाया

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 10

जो कोई व्यवस्था की पुस्तक में लिखी हुई सब बातों के करने में स्थिर नहीं रहता, वह श्रापित है।" ध्यान दे, शर्त "सब बातों" है, कुछ बातें नहीं। अपनी कोशिशों के भरोसे जीना ऐसा है जैसे टूटी डोर से लटकना। एक भी गाँठ खुली, तो सब खत्म। तू आज किस चीज़ पर टिका है, अपने अच्छे कामों की गिनती पर, या मसीह पर?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 29

और यदि तुम मसीह के हो, तो अब्राहम के वंश और प्रतिज्ञा के अनुसार वारिस भी हो।" ध्यान दो, पौलुस ने यह नहीं कहा कि तुम कितने अच्छे हो, किस घराने से हो, कितनी व्यवस्था निभाई। बस एक ही शर्त, तुम मसीह के हो। जिस विरासत के लिए अब्राहम ने वर्षों प्रतीक्षा की, वह तुम्हारे नाम लिख दी गई। तुम्हारी पहचान तुम्हारे अतीत से नहीं, उसके अपनेपन से बनी है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 19

वह अपराधों के कारण दी गई," पौलुस कहता है। व्यवस्था तुम्हें बुरा नहीं बनाती, वह सिर्फ नाम देती है उस बीमारी को जो पहले से भीतर है। और उसकी एक तारीख थी, "उस वंश के आने तक।" यानी वह हमेशा के लिए तुम्हारा न्यायी नहीं ठहरी। मसीह आ गया। अब जो दर्पण तुम्हें दोष दिखाता था, वह तुम्हें उसके पास ले जाता है जो धो देता है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 20

व्यवस्था मूसा के हाथ से आई, बीच में एक मध्यस्थ खड़ा था। पर अब्राहम से की गई प्रतिज्ञा में कोई बिचौलिया नहीं था, परमेश्वर ने खुद कहा और खुद ही निभाया। "अब मध्यस्थ एक का नहीं होता, परन्तु परमेश्वर एक ही है।"

सोचो, तुम्हारे उद्धार का वादा किसी सौदे पर नहीं टिका, जिसमें तुम्हारा हिस्सा पूरा न हो तो सब टूट जाए। वह अकेले उसकी वफ़ादारी पर टिका है। तुम्हारे कमज़ोर दिनों में भी वह वादा हिलता नहीं।

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