12 वर्ष और उससे अधिक आयु के किशोर के लिए

भजन संहिता 99

किशोर (12 वर्ष और अधिक) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

व्याख्या

भजन 99 एक ऐसा गीत है जो सीधे उस तख्त के सामने खड़ा कर देता है जिसे कोई देख नहीं सकता, पर जिसकी उपस्थिति टाली नहीं जा सकती। "यहोवा राजा हुआ है; देश-देश के लोग काँप उठें! वह करूबों पर विराजमान है; पृथ्वी डोल उठे!" (पद 1)। यह कोई विनम्र निवेदन नहीं है कि परमेश्वर को थोड़ा सम्मान दिया जाए। यह एक घोषणा है कि पूरी सृष्टि की सत्ता किसी और के हाथ में नहीं, बल्कि यहोवा के हाथ में है, और इस सच्चाई पर हिलना और काँपना ही सही प्रतिक्रिया है।

भजनकार आगे कहता है कि यहोवा सिय्योन में महान हैं और सब जातियों के ऊपर प्रधान हैं (पद 2)। फिर वह एक ही बात तीन बार दोहराता है, "वह पवित्र है" (पद 3, 5, 9)। यह दोहराव संयोग नहीं है। पवित्रता का अर्थ है कि परमेश्वर अलग हैं, वे किसी और चीज़ से मिलते-जुलते नहीं, वे अपनी सत्ता और शुद्धता में अद्वितीय हैं।

पद 4 में एक और परत खुलती है। राजा की शक्ति केवल ताकत नहीं, न्याय से जुड़ी हुई है, "राजा की सामर्थ्य न्याय से मेल रखती है, तू ही ने सच्चाई को स्थापित किया।" यहोवा ने याकूब के घराने में न्याय और धर्म की नींव खुद रखी। यह राजा मनमानी नहीं करता।

फिर भजनकार इतिहास की ओर मुड़ता है, मूसा, हारून और शमूएल की ओर, जिन्होंने यहोवा को पुकारा और जिनकी सुनी गई (पद 6)। परमेश्वर ने बादल के खम्भे में होकर उनसे बात की, और वे उसकी विधियों पर चले (पद 7)। और फिर एक ऐसी पंक्ति आती है जो इस भजन का दिल है, "तू उनके कामों का पलटा तो लेता था तो भी उनके लिये क्षमा करनेवाला परमेश्वर था" (पद 8)। यहाँ पवित्रता और क्षमा एक ही परमेश्वर में साथ रहते हैं, बिना एक-दूसरे को कमज़ोर किए।

भजन अंत में वहीं लौटता है जहाँ से शुरू हुआ था, आराधना के आह्वान पर, "हमारे परमेश्वर यहोवा को सराहो, और उसके पवित्र पर्वत पर दण्डवत् करो; क्योंकि हमारा परमेश्वर यहोवा पवित्र है!" (पद 9)।

इसका अर्थ क्या है?

यह भजन एक असुविधाजनक सच्चाई पेश करता है, जो आज की सोच से टकराती है। जिस दुनिया में हम बड़े हो रहे हैं, वहाँ हर व्यक्ति खुद अपने फैसलों का राजा है, अपने सत्य का निर्माता। कोई भी किसी के आगे "काँपने" की बात सुनना नहीं चाहता। पर भजन 99 कहता है कि वास्तविकता ऐसी नहीं है। एक सत्ता है जो हमसे ऊपर है, और वह सत्ता न्याय, सच्चाई और पवित्रता पर टिकी है, न कि मनमानी पर।

इसका मतलब डर से जीना नहीं है। ध्यान दो, यही भजन जो परमेश्वर की पवित्रता की बात तीन बार करता है, वही यह भी कहता है कि यहोवा मूसा, हारून और शमूएल की सुनते थे, कि वे "क्षमा करनेवाला परमेश्वर" थे। पवित्रता का मतलब दूरी नहीं है, बल्कि एक ऐसा चरित्र है जिसमें सच्चाई और दया दोनों असली हैं। परमेश्वर न तो इतने "सुरक्षित" हैं कि उनसे कोई हिसाब नहीं मांगा जाएगा, न ही इतने कठोर हैं कि पश्चाताप करनेवाले को अस्वीकार कर दें।

मूल सूत्र

यह भजन उस बड़ी कहानी का हिस्सा है जो पूरी बाइबल में चलती है, कि परमेश्वर राजा हैं, पर वे दूर के, ठंडे राजा नहीं। वे बादल के खम्भे में उतर आए, उन्होंने मूसा से बात की, उन्होंने अपनी प्रजा को माफ़ किया जब वे भटक गए। और यही रेखा सीधे यीशु मसीह तक जाती है। यूहन्ना ने लिखा कि वचन देह बना और हमारे बीच रहा। जो राजा करूबों पर विराजमान था, वही एक दिन मनुष्य बनकर आया, ताकि पवित्रता और क्षमा को अलग-अलग रखने की जरूरत ही न रहे। क्रूस पर वही हुआ जो भजन 99 पहले से गा रहा था, न्याय पूरा हुआ, और क्षमा भी असली निकली। पवित्रता ने पाप को हल्के में नहीं लिया, पर क्षमा ने भी पीछे हटने नहीं दिया।

तुम्हारे लिए

तुम शायद रोज़ इस दबाव में जीते हो कि खुद को साबित करना है, सही दिखना है, गलतियों को छुपाना है। इस भजन की खबर तुम्हें एक अजीब तरह की आज़ादी देती है। तुम्हें राजा नहीं बनना है, वह पद पहले से भरा हुआ है। तुम्हें अपनी पवित्रता खुद बनाकर दिखानी नहीं है, क्योंकि जो पवित्र है वह दूसरा है, और वह तुमसे भागता नहीं, बल्कि तुम्हारी सुनता है, जैसे उसने मूसा, हारून और शमूएल की सुनी। जब तुम्हारा विवेक तुम्हें कोसता है, यह भजन याद दिलाता है कि परमेश्वर हिसाब भी लेते हैं और क्षमा भी देते हैं, दोनों एक साथ, बिना झूठे समझौते के। इसका मतलब है कि तुम्हारी असफलताएँ आखिरी शब्द नहीं हैं।

चर्चा के लिए

अगर परमेश्वर सच में उतने पवित्र और न्यायी हैं जितना यह भजन कहता है, तो इसका तुम्हारे रोज़ के फैसलों पर क्या असर होना चाहिए?

पद 8 कहता है कि परमेश्वर हिसाब भी लेते हैं और क्षमा भी करते हैं। क्या तुम्हें यह विरोधाभास लगता है, या यह समझ में आता है? क्यों?

साथ प्रार्थना

प्रभु, आप राजा हैं, और हम इसे भूल जाते हैं। हमें याद दिलाइए कि आपकी पवित्रता डरावनी नहीं, बल्कि भरोसे के लायक है। जहाँ हम गिरे हैं, वहाँ अपनी क्षमा दिखाइए, और जहाँ हम भटक रहे हैं, वहाँ अपनी सच्चाई से हमें रोक लीजिए। आमीन।

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भजन संहिता 99 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

भजन संहिता 99 किस विषय में है?
भजन 99 एक ऐसा गीत है जो सीधे उस तख्त के सामने खड़ा कर देता है जिसे कोई देख नहीं सकता, पर जिसकी उपस्थिति टाली नहीं जा सकती। "यहोवा राजा हुआ है; देश-देश के लोग काँप उठें! वह करूबों पर विराजमान है; पृथ्वी डोल उठे!" (पद 1)। यह कोई विनम्र निवेदन नहीं है कि परमेश्वर को थोड़ा सम्मान दिया जाए। यह एक घोषणा है कि पूरी सृष्टि की सत्ता किसी और के हाथ में नहीं, बल्कि यहोवा के हाथ में है, और इस सच्चाई पर हिलना और काँपना ही सही प्रतिक्रिया है।
भजन संहिता 99 क्या कहता है?
पद 4 में एक और परत खुलती है। राजा की शक्ति केवल ताकत नहीं, न्याय से जुड़ी हुई है, "राजा की सामर्थ्य न्याय से मेल रखती है, तू ही ने सच्चाई को स्थापित किया।" यहोवा ने याकूब के घराने में न्याय और धर्म की नींव खुद रखी। यह राजा मनमानी नहीं करता।
भजन संहिता 99 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
भजन अंत में वहीं लौटता है जहाँ से शुरू हुआ था, आराधना के आह्वान पर, "हमारे परमेश्वर यहोवा को सराहो, और उसके पवित्र पर्वत पर दण्डवत् करो; क्योंकि हमारा परमेश्वर यहोवा पवित्र है!" (पद 9)।
किशोर भजन संहिता 99 से क्या सीख सकते हैं?
इसका मतलब डर से जीना नहीं है। ध्यान दो, यही भजन जो परमेश्वर की पवित्रता की बात तीन बार करता है, वही यह भी कहता है कि यहोवा मूसा, हारून और शमूएल की सुनते थे, कि वे "क्षमा करनेवाला परमेश्वर" थे। पवित्रता का मतलब दूरी नहीं है, बल्कि एक ऐसा चरित्र है जिसमें सच्चाई और दया दोनों असली हैं। परमेश्वर न तो इतने "सुरक्षित" हैं कि उनसे कोई हिसाब नहीं मांगा जाएगा, न ही इतने कठोर हैं कि पश्चाताप करनेवाले को अस्वीकार कर दें।
भजन संहिता 99 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
तुम शायद रोज़ इस दबाव में जीते हो कि खुद को साबित करना है, सही दिखना है, गलतियों को छुपाना है। इस भजन की खबर तुम्हें एक अजीब तरह की आज़ादी देती है। तुम्हें राजा नहीं बनना है, वह पद पहले से भरा हुआ है। तुम्हें अपनी पवित्रता खुद बनाकर दिखानी नहीं है, क्योंकि जो पवित्र है वह दूसरा है, और वह तुमसे भागता नहीं, बल्कि तुम्हारी सुनता है, जैसे उसने मूसा, हारून और शमूएल की सुनी। जब तुम्हारा विवेक तुम्हें कोसता है, यह भजन याद दिलाता है कि परमेश्वर हिसाब भी लेते हैं और क्षमा भी देते हैं, दोनों एक साथ, बिना झूठे समझौते के। इसका मतलब है कि तुम्हारी असफलताएँ आखिरी शब्द नहीं हैं।

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