यूहन्ना 11
किशोर (12 वर्ष और अधिक) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी
व्याख्या
बैतनिय्याह यरूशलेम से बस दो मील दूर है। एक परिवार, दो बहनें और एक भाई, जिनके घर में यीशु का आना-जाना था। लाज़र बीमार पड़ता है, और बहनें कोई लंबा धार्मिक निवेदन नहीं भेजतीं। वे केवल कहलवाती हैं: "हे प्रभु, देख, जिससे तू प्यार करता है, वह बीमार है।" यही उनका पूरा तर्क है। तेरा प्रेम, हमारी ज़रूरत, बस।
और फिर वह होता है जो पढ़ने में चुभता है। यूहन्ना लिखता है कि यीशु मार्था, मरियम और लाज़र से प्रेम रखते थे, और उसके ठीक बाद: "जब उसने सुना, कि वह बीमार है, तो जिस स्थान पर वह था, वहाँ दो दिन और ठहर गया।" प्रेम और ठहरना, एक ही साँस में। कोई जल्दबाज़ी नहीं, कोई दौड़ता कदम नहीं।
जब वे चलने का कहते हैं, तो चेले घबराते हैं, क्योंकि यहूदिया में लोग पथराव करने को तैयार बैठे हैं। यीशु मृत्यु को "सो जाना" कहते हैं, चेले शब्द को शब्द-ब-शब्द ले लेते हैं, और तब वे साफ कह देते हैं: "लाज़र मर गया है।" थोमा की प्रतिक्रिया कड़वी और वफ़ादार दोनों है: "आओ, हम भी उसके साथ मरने को चलें।"
वे पहुँचते हैं तो कब्र चार दिन पुरानी है। यह विवरण महत्वपूर्ण है। चार दिन का अर्थ है, कोई संदेह नहीं बचा, कोई "शायद बेहोश था" नहीं बचा। मार्था दौड़कर आती है और वह वाक्य कहती है जो हम सब कभी न कभी कहते हैं: "हे प्रभु, यदि तू यहाँ होता, तो मेरा भाई कदापि न मरता।" शिकायत और विश्वास एक ही वाक्य में गुँथे हुए हैं। यीशु उसे डाँटते नहीं। वे उसे अपनी ओर खींचते हैं: "पुनरुत्थान और जीवन मैं ही हूँ।" और फिर वह सवाल, जो सीधा उसके चेहरे पर आता है: "क्या तू इस बात पर विश्वास करती है?"
मरियम आती है और ठीक वही शब्द दोहराती है, पर घुटनों पर गिरकर, रोते हुए। और अब कुछ ऐसा होता है जिसकी हम परमेश्वर के पुत्र से अपेक्षा नहीं करते। वे "आत्मा में बहुत ही उदास और व्याकुल" होते हैं। दो शब्दों का वाक्य: "यीशु रोया।" वे जानते हैं कि पाँच मिनट में लाज़र चलकर बाहर आएगा, और फिर भी वे रोते हैं। मृत्यु उन्हें भी क्रोधित और दुखी करती है।
पत्थर हटाने का आदेश आता है, और मार्था व्यावहारिक होकर टोकती है: अब तो दुर्गन्ध आती है। यीशु ऊँचे स्वर से पुकारते हैं, "हे लाज़र, निकल आ!" और वह निकल आता है, कफन में हाथ-पाँव बंधे हुए, मुँह पर कपड़ा लिपटा। "उसे खोलकर जाने दो।"
अध्याय यहीं ख़त्म नहीं होता, और यही सबसे चौंकाने वाली बात है। कुछ लोग विश्वास करते हैं। कुछ सीधे फरीसियों के पास रिपोर्ट करने जाते हैं। महासभा जुड़ती है, और महायाजक कैफा वह वाक्य बोलता है जिसका पूरा अर्थ वह खुद नहीं समझता: बेहतर है कि एक मनुष्य लोगों के लिये मरे। उसी दिन से वे यीशु को मार डालने की योजना बनाने लगते हैं। एक आदमी को जीवन मिला, और उसकी क़ीमत जीवन देने वाले की मृत्यु ठहरी।
इसका अर्थ क्या है?
यह अध्याय उस प्रश्न से टकराता है जिससे हम बचना चाहते हैं: अगर परमेश्वर प्रेम करते हैं, तो देर क्यों करते हैं? यूहन्ना इस प्रश्न को छिपाता नहीं, वह इसे पद 5 और 6 में आमने-सामने रख देता है। परमेश्वर की चुप्पी उनकी अनुपस्थिति नहीं है। दो दिन का ठहरना उदासीनता नहीं था, वह एक बड़ी योजना थी जिसे मार्था और मरियम उस समय देख नहीं सकतीं थीं।
दूसरी बात और भी गहरी है। यीशु दुख के सामने भाषण नहीं देते, वे रोते हैं। परमेश्वर का पुत्र मृत्यु के सामने ठंडा और तटस्थ खड़ा नहीं रहता। अगर आपने कभी सोचा कि विश्वास का अर्थ भावनाओं को दबा देना है, तो पद 35 इसे तोड़ देता है। और मार्था की शिकायत को यीशु ने पाप नहीं कहा। ईमानदार शिकायत भी प्रार्थना हो सकती है।
जोड़ने वाला सूत्र
यूहन्ना यह घटना संयोग से यहाँ नहीं रखता। यह उस बड़ी कहानी का द्वार है जो कुछ ही हफ़्तों बाद एक और कब्र पर पहुँचेगी। लाज़र को कब्र से बुलाया गया, पर वह कफन में बंधा हुआ निकला, क्योंकि उसे एक दिन फिर मरना था। यीशु अपनी कब्र से निकलेंगे और कपड़े पीछे छोड़ देंगे, क्योंकि वे फिर कभी नहीं मरेंगे। लाज़र को दूसरों ने खोला, यीशु को किसी ने नहीं खोला।
और कैफा की राजनीतिक चालाकी अनजाने में सुसमाचार बन जाती है: एक मनुष्य लोगों के लिये मरे। यूहन्ना जोड़ता है कि यह केवल उस जाति के लिये नहीं था, वरन् इसलिए भी कि परमेश्वर की तितर-बितर सन्तानों को एक कर दे। यानी आपके लिए भी। जो कब्र के सामने कहते हैं "पुनरुत्थान और जीवन मैं ही हूँ", वे यह अधिकार से कह सकते हैं, क्योंकि वे उस कब्र में स्वयं उतरने जा रहे हैं।
आपके लिए
आपकी उम्र में कुछ प्रार्थनाएँ पहली बार बिना जवाब लौटती हैं। किसी की मृत्यु, माता-पिता का अलग होना, कोई बीमारी, कोई भीतरी अंधेरा जो हटता नहीं। और आप देखते हैं कि आकाश चुप है। इस अध्याय का उपहार यह नहीं है कि परमेश्वर हमेशा समय पर आते हैं जैसा हम समय को नापते हैं। उपहार यह है कि उनकी देरी उनके प्रेम का खंडन नहीं करती।
तो यह करें: उस एक चीज़ का नाम लिखिए जिसमें आपको लगता है परमेश्वर देर से आए। उसे अस्पष्ट न छोड़िए, ठीक-ठीक नाम दीजिए। और फिर उसी काग़ज़ पर यीशु का प्रश्न लिखिए: "क्या तू इस बात पर विश्वास करती है?" यह सवाल आम विश्वास के बारे में नहीं है, यह उस विशेष दर्द के बारे में है।
और एक कठिन बात। मार्था ने कहा, अब दुर्गन्ध आती है। हम सब के भीतर कुछ ऐसा है जिसे हम चार दिन का, बंद, ढका हुआ रखना चाहते हैं, क्योंकि खोलने पर शर्म आएगी। यीशु कहते हैं, पत्थर उठाओ। इस हफ़्ते किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति के सामने वह पत्थर उठाइए। यीशु दुर्गन्ध से पीछे नहीं हटते, वे उसमें बोलते हैं।
इस पर बात कीजिए
यीशु ने जानबूझकर दो दिन ठहरने का निर्णय लिया। यदि परमेश्वर आपके किसी दुख में जानबूझकर देर करें, तो क्या आप उन पर भरोसा कर पाएँगे? ईमानदारी से उत्तर दीजिए।
यीशु रोए, यह जानते हुए भी कि वे लाज़र को जिलाएँगे। यह उस तरीके के बारे में क्या कहता है जिससे हम दुखी लोगों के पास जाते हैं, समझाने के बजाय साथ रोने के बारे में?
मिलकर प्रार्थना
प्रभु यीशु, आपने कब्र के सामने रोना भी जाना और पुकारना भी। मेरे उन जगहों को नाम दीजिए जहाँ मैं मरा हुआ महसूस करता हूँ, और वहाँ पत्थर हटा दीजिए। जब आप देर करते दिखें, तब भी मुझे थामे रखिए। आपके प्रेम पर मैं भरोसा करना सीखना चाहता हूँ। आमीन।
यूहन्ना 11 के बारे में प्रश्न
पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।
यूहन्ना 11 किस विषय में है?
यूहन्ना 11 क्या कहता है?
यूहन्ना 11 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
किशोर यूहन्ना 11 से क्या सीख सकते हैं?
यूहन्ना 11 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
दूसरों ने क्या पाया
चेलों ने राहत की साँस ली, "हे प्रभु, यदि वह सो गया है, तो बच जाएगा।" उन्हें लगा अब यहूदिया जाने की जरूरत नहीं, खतरा टल गया। पर यीशु मौत की बात कर रहे थे। कितनी बार हम भी उसकी बातों में वही अर्थ ढूँढ़ते हैं जो हमें आसान रास्ता दे। सोचो, आज उसका कौन सा वचन तुमने अपनी सुविधा के हिसाब से समझ लिया है?
कैसा विचित्र दृश्य है। कैफा, जो उस साल का महायाजक था, परिषद में खड़ा होकर कहता है, "तुम कुछ भी नहीं जानते।" वह सोचता है कि वह यीशु की हत्या की योजना बना रहा है, पर असल में परमेश्वर उसके होठों से भविष्यवाणी करवा रहा है कि यीशु पूरी जाति के लिए मरेगा।
कभी सोचा है? जो लोग खुद को सबसे बुद्धिमान समझते हैं, वे अक्सर सबसे कम समझते हैं। और परमेश्वर इतना बड़ा है कि विरोधियों की जीभ से भी अपनी सच्चाई बोल देता है।
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