12 वर्ष और उससे अधिक आयु के किशोर के लिए

फिलिप्पियों 3

किशोर (12 वर्ष और अधिक) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

The Explanation

पौलुस फिलिप्पी की कलीसिया को लिख रहे हैं, और वे बहुत सीधी भाषा में एक चेतावनी देते हैं। कुछ लोग सिखा रहे थे कि यीशु मसीह पर विश्वास काफी नहीं है, कि तुम्हें यहूदी व्यवस्था के अनुसार भी जीना होगा, खतना करवाना होगा, तब जाकर परमेश्वर के सामने तुम ठीक ठहरोगे। पौलुस इसे इतनी गंभीरता से लेते हैं कि वे उन्हें "कुत्ते" और "बुरे काम करनेवाले" कहते हैं। यह कठोर भाषा है, पर वे किसी छोटी बात पर नहीं झगड़ रहे। सवाल यह है कि इंसान परमेश्वर के सामने कैसे स्वीकार्य ठहरता है, अपने प्रदर्शन से या किसी और तरीके से।

फिर पौलुस अपनी खुद की कहानी बताते हैं। अगर बात नियमों और उपलब्धियों की हो, तो वे किसी से पीछे नहीं। जन्म से यहूदी, फरीसी, व्यवस्था का पालन करने में निर्दोष, इतने उत्साही कि कलीसिया को सताया। यानी उनके पास वह सब कुछ था जिस पर एक धार्मिक इंसान गर्व कर सकता है। और फिर वे कहते हैं कि यह सब उन्होंने "हानि" और "कूड़ा" समझ लिया है, मसीह की तुलना में। यह शब्द हल्के में नहीं आया, यह वही आदमी बोल रहा है जिसने अपनी पूरी पहचान उस उपलब्धियों की सूची पर बनाई थी।

पौलुस कहते हैं कि वे अब चाहते हैं कि उनकी धार्मिकता खुद के प्रयास से नहीं बल्कि मसीह पर विश्वास से आए। वे मसीह को, उसके पुनरुत्थान की सामर्थ्य को, और उसके दुखों में हिस्सेदारी को जानना चाहते हैं, ताकि वे मरे हुओं में से जी उठें। पर साथ ही वे साफ कहते हैं कि वे अभी तक वहाँ नहीं पहुँचे। वे "सिद्ध" होने का दावा नहीं करते। वे एक दौड़ में हैं, पीछे की बातें भूलकर आगे की ओर दौड़ते हुए, उस इनाम की ओर जिसके लिए परमेश्वर ने उन्हें बुलाया है।

अंत में वे चेतावनी देते हैं कि कुछ लोग ऐसे भी हैं जो क्रूस के दुश्मन बन गए हैं, जिनका ईश्वर पेट है, जो सांसारिक चीज़ों में मन लगाते हैं। इसके विपरीत, पौलुस याद दिलाते हैं कि हमारा असली देश स्वर्ग में है, और हम मसीह के आने की प्रतीक्षा कर रहे हैं, जो हमारी दीन देह को बदलकर अपनी महिमा जैसी बना देंगे।

What Does This Mean?

यह अध्याय पहचान के बारे में है। पौलुस के पास एक ऐसी सूची थी जिस पर हर कोई ईर्ष्या करता, जन्म, प्रशिक्षण, धार्मिक उपलब्धियाँ। और उन्होंने उस पूरी सूची को कूड़ा कहा। इसका मतलब यह नहीं कि उपलब्धियाँ बुरी हैं। इसका मतलब यह है कि अगर तुम अपनी पहचान, अपनी कीमत, उस सूची पर टिकाओगे, तो वह तुम्हें कभी संतुष्ट नहीं करेगी, और वह तुम्हें परमेश्वर के सामने भी नहीं ठहरा सकती।

पौलुस यह भी दिखाते हैं कि विश्वास कोई एक बार की घटना नहीं, वह एक दौड़ है। वे खुद कहते हैं कि वे पहुँच नहीं चुके। यह ईमानदारी बहुत कीमती है। जो आदमी परमेश्वर के लिए इतना जिया, वह भी कहता है, "मैं अभी तक सिद्ध नहीं हूँ, मैं दौड़ रहा हूँ।"

The Common Thread

यह पूरा अध्याय मसीह के सुसमाचार के केंद्र तक जाता है। धार्मिकता, यानी परमेश्वर के सामने ठीक होना, व्यवस्था के पालन से नहीं मिलती, बल्कि विश्वास से मिलती है, "परमेश्वर की ओर से विश्वास करने पर मिलती है।" यह वही सुसमाचार है जो पूरी बाइबल में बहता है, कि इंसान अपने प्रयासों से परमेश्वर तक नहीं पहुँचता, परमेश्वर खुद मसीह में इंसान तक आते हैं। पौलुस का पुनरुत्थान की आशा और मसीह के दोबारा आने की प्रतीक्षा भी उसी बड़ी कहानी का हिस्सा है, जो शुरू क्रूस पर मसीह की मृत्यु से हुई और अंत में हमारी देह के बदलने पर पूरी होगी।

For You

तुम्हारी उम्र में तुम्हारी अपनी सूची बन रही है। मार्क्स, सोशल मीडिया पर लाइक्स, किस टीम में चुने गए, कौन सा कॉलेज, कौन सा दोस्तों का समूह। यह सूची झूठी नहीं है, पर पौलुस की तरह पूछने लायक है, क्या तुम इस सूची पर अपनी पहचान टिका रहे हो। अगर हाँ, तो हर असफलता तुम्हें अंदर से तोड़ देगी, और हर सफलता भी बस अगली सफलता की माँग करेगी।

पौलुस जो कह रहे हैं वह यह नहीं है कि मेहनत मत करो, पढ़ाई मत करो। वे कह रहे हैं कि तुम्हारी असली पहचान किसी और जगह टिकनी चाहिए, मसीह में, जो तुम्हें बिना शर्त पकड़े हुए हैं। और यह भी याद रखो कि दौड़ अभी खत्म नहीं हुई। तुम्हें आज ही "परिपक्व ईसाई" बनने का दबाव महसूस नहीं करना चाहिए। पौलुस भी दौड़ रहे थे। तुम भी दौड़ो, गिरो तो उठो, पर पीछे की गलतियों में मत अटके रहो।

Talk About It

तुम्हारी अपनी ज़िंदगी में वह "सूची" क्या है जिस पर तुम अपनी कीमत टिकाते हो, और अगर वह छिन जाए तो क्या बचेगा?

पौलुस कहते हैं कि वे अभी तक "पहुँचे नहीं" हैं। क्या तुम्हें अपने विश्वास में हमेशा "सही" या "मजबूत" दिखने का दबाव महसूस होता है, और यह कहाँ से आता है?

Praying Together

प्रभु, हम अक्सर अपनी उपलब्धियों में अपनी पहचान ढूँढ़ते हैं। हमें दिखाइए कि हमारी असली कीमत आपसे मिलती है, न कि हमारे प्रदर्शन से। जब हम गिरें, हमें आगे बढ़ने की हिम्मत दीजिए, जैसे पौलुस ने दी। आमीन।

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फिलिप्पियों 3 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

फिलिप्पियों 3 किस विषय में है?
पौलुस फिलिप्पी की कलीसिया को लिख रहे हैं, और वे बहुत सीधी भाषा में एक चेतावनी देते हैं। कुछ लोग सिखा रहे थे कि यीशु मसीह पर विश्वास काफी नहीं है, कि तुम्हें यहूदी व्यवस्था के अनुसार भी जीना होगा, खतना करवाना होगा, तब जाकर परमेश्वर के सामने तुम ठीक ठहरोगे। पौलुस इसे इतनी गंभीरता से लेते हैं कि वे उन्हें "कुत्ते" और "बुरे काम करनेवाले" कहते हैं। यह कठोर भाषा है, पर वे किसी छोटी बात पर नहीं झगड़ रहे। सवाल यह है कि इंसान परमेश्वर के सामने कैसे स्वीकार्य ठहरता है, अपने प्रदर्शन से या किसी और तरीके से।
फिलिप्पियों 3 क्या कहता है?
पौलुस कहते हैं कि वे अब चाहते हैं कि उनकी धार्मिकता खुद के प्रयास से नहीं बल्कि मसीह पर विश्वास से आए। वे मसीह को, उसके पुनरुत्थान की सामर्थ्य को, और उसके दुखों में हिस्सेदारी को जानना चाहते हैं, ताकि वे मरे हुओं में से जी उठें। पर साथ ही वे साफ कहते हैं कि वे अभी तक वहाँ नहीं पहुँचे। वे "सिद्ध" होने का दावा नहीं करते। वे एक दौड़ में हैं, पीछे की बातें भूलकर आगे की ओर दौड़ते हुए, उस इनाम की ओर जिसके लिए परमेश्वर ने उन्हें बुलाया है।
फिलिप्पियों 3 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
यह अध्याय पहचान के बारे में है। पौलुस के पास एक ऐसी सूची थी जिस पर हर कोई ईर्ष्या करता, जन्म, प्रशिक्षण, धार्मिक उपलब्धियाँ। और उन्होंने उस पूरी सूची को कूड़ा कहा। इसका मतलब यह नहीं कि उपलब्धियाँ बुरी हैं। इसका मतलब यह है कि अगर तुम अपनी पहचान, अपनी कीमत, उस सूची पर टिकाओगे, तो वह तुम्हें कभी संतुष्ट नहीं करेगी, और वह तुम्हें परमेश्वर के सामने भी नहीं ठहरा सकती।
किशोर फिलिप्पियों 3 से क्या सीख सकते हैं?
यह पूरा अध्याय मसीह के सुसमाचार के केंद्र तक जाता है। धार्मिकता, यानी परमेश्वर के सामने ठीक होना, व्यवस्था के पालन से नहीं मिलती, बल्कि विश्वास से मिलती है, "परमेश्वर की ओर से विश्वास करने पर मिलती है।" यह वही सुसमाचार है जो पूरी बाइबल में बहता है, कि इंसान अपने प्रयासों से परमेश्वर तक नहीं पहुँचता, परमेश्वर खुद मसीह में इंसान तक आते हैं। पौलुस का पुनरुत्थान की आशा और मसीह के दोबारा आने की प्रतीक्षा भी उसी बड़ी कहानी का हिस्सा है, जो शुरू क्रूस पर मसीह की मृत्यु से हुई और अंत में हमारी देह के बदलने पर पूरी होगी।
फिलिप्पियों 3 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
पौलुस जो कह रहे हैं वह यह नहीं है कि मेहनत मत करो, पढ़ाई मत करो। वे कह रहे हैं कि तुम्हारी असली पहचान किसी और जगह टिकनी चाहिए, मसीह में, जो तुम्हें बिना शर्त पकड़े हुए हैं। और यह भी याद रखो कि दौड़ अभी खत्म नहीं हुई। तुम्हें आज ही "परिपक्व ईसाई" बनने का दबाव महसूस नहीं करना चाहिए। पौलुस भी दौड़ रहे थे। तुम भी दौड़ो, गिरो तो उठो, पर पीछे की गलतियों में मत अटके रहो।

दूसरों ने क्या पाया

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 17

हे भाइयो, तुम सब मिलकर मेरी सी चाल चलो" ऐसा कहने का साहस पौलुस को कहाँ से मिला? ठीक पिछली आयतों में उसने माना था कि वह अभी पहुँचा नहीं, बस दौड़ रहा है। यानी वह अपनी सिद्धता नहीं, अपनी दिशा दिखा रहा था। सोचो, क्या कोई तुम्हारे पीछे चलकर मसीह तक पहुँच सकता है? तुम्हारी चाल किसी की राह बन रही है, चाहे तुम जानो या न जानो।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 4

पौलुस कहता है, "यदि किसी को शरीर पर भरोसा रखने का विचार हो, तो मैं उससे भी बढ़कर रख सकता हूँ।" वह खाली हाथ नहीं था। उसके पास वंश, शिक्षा, नाम, सब था। और उसी भरे हाथ से उसने सब कुछ नीचे रखा। खाली हाथ छोड़ना आसान है, भरे हाथ छोड़ना मुश्किल। तेरे हाथ में आज क्या है जिस पर तू चुपके से भरोसा कर रहा है?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 1

पौलुस यह जेल से लिख रहा है, और फिर भी कहता है, "प्रभु में आनन्दित रहो।" साथ में जोड़ता है कि एक ही बात बार बार लिखने में उसे कोई कष्ट नहीं। सोचो, जो बातें हमें सबसे ज़्यादा चाहिए, वही हम सबसे जल्दी भूलते हैं। इसीलिए परमेश्वर थकता नहीं, वह धीरज से फिर वही कहता है। आज तुम्हें भी।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 12

पौलुस वर्षों तक मसीह की सेवा कर चुका था, फिर भी लिखता है, "यह नहीं कि मैं पा चुका हूँ, या सिद्ध हो चुका हूँ; पर उस पदार्थ को पकड़ने के लिये दौड़ा चला जाता हूँ, जिसके लिये मसीह यीशु ने मुझे पकड़ा था।" ध्यान दे, दौड़ने से पहले उसे पकड़ा गया था। तू अपनी अधूरी हालत से निराश है, पर जो हाथ तुझे थामे है वह डगमगाता नहीं। आज भी चलता रह।

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For parents and teachers: किशोरों और युवाओं के लिए लिखा गया। युवा समूह, कन्फर्मेशन कक्षा, या व्यक्तिगत बाइबल अध्ययन के लिए उत्तम। This explanation is generated automatically by language models. While we strive for theological soundness, the software can make mistakes.

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