1 इतिहास 16
पाठ
दाऊद वाचा का सन्दूक येरूशलेम में अपने खड़े कराए तम्बू में रखवाता है, होमबलि और मेलबलि चढ़ाई जाती है, और वह प्रजा को यहोवा के नाम से आशीर्वाद देकर हर स्त्री-पुरुष को "एक-एक रोटी और एक-एक टुकड़ा माँस और किशमिश की एक-एक टिकिया" बँटवा देता है। फिर वह आसाप और लेवियों को सन्दूक के सामने स्तुति की स्थायी सेवा सौंपता है, और उस दिन के लिए एक भजन देता है जो वाचा की याद से शुरू होकर सारी पृथ्वी के लोगों को बुलावे तक पहुँचता है। अन्त में सेवा दो जगहों पर बँट जाती है, येरूशलेम में सन्दूक के सामने और गिबोन में पुराने निवास के सामने, और प्रजा अपने-अपने घर लौट जाती है।
मूल बात
इस अध्याय का धड़कता हुआ केन्द्र यह है कि परमेश्वर की उपस्थिति कोई निजी सम्पत्ति नहीं, बल्कि सार्वजनिक आनन्द है। दाऊद सन्दूक को महल में नहीं, तम्बू में रखता है, और पहला काम जो करता है वह है बाँटना: आशीर्वाद, रोटी, माँस, किशमिश। परमेश्वर की निकटता से सबसे पहले पेट भरता है और गला खुलता है। भजन इसी को धर्मशास्त्र में बदल देता है: यहोवा वाचा बाँधनेवाला है, "यह वही वचन है जो उसने हजार पीढ़ियों के लिये ठहरा दिया," और वही पूरी पृथ्वी का राजा है। यानी इस्राएल का चुनाव किसी दीवार का नाम नहीं, दरवाज़े का नाम है। जिस परमेश्वर ने अब्राहम से शपथ खाई, वही देश-देश के लोगों को गीत गाने बुला रहा है।
मुख्य सूत्र
ध्यान दीजिए कि सन्दूक येरूशलेम में है, पर होमबलि की वेदी गिबोन में रह जाती है। आराधना का हृदय और आराधना की विधि दो अलग पहाड़ियों पर बँट गए हैं, और यह विभाजन सुलैमान के मन्दिर तक खटकता रहेगा। यह अधूरापन आकस्मिक नहीं; पूरा पुराना नियम इसी तनाव में जीता है कि उपस्थिति और बलिदान एक जगह कब मिलेंगे। मसीह में वे मिलते हैं: वही परमेश्वर की उपस्थिति का तम्बू है और वही वेदी पर चढ़ा मेमना। और पद 23 का बुलावा, "प्रतिदिन उसके किए हुए उद्धार का शुभ समाचार सुनाते रहो," वही धागा है जो आगे चलकर प्रेरितों के मुँह में सुसमाचार बनकर निकलता है। दाऊद का दरबारी गीत असल में मिशन का बीज है।
दर्पण
हम आराधना को अक्सर भीतरी मामला बना लेते हैं, एक शान्त कमरा, एक निजी अनुभव। दाऊद का दिन शोरगुल वाला था: तुरहियां, झाँझ, माँस की गंध, भीड़ के हाथों में रोटी। उसने कोई आत्मिक उपदेश नहीं दिया, उसने खाना बाँटा। पूछिए अपने आप से: पिछली बार परमेश्वर के प्रति मेरे आभार ने किसी और की थाली तक पहुँचकर कब आकार लिया? हम भजन तो गाते हैं और फिर घर लौटकर अपने खर्च, अपने समय, अपने रिश्तों को उसी हिसाब-किताब से चलाते हैं जैसे कुछ हुआ ही न हो। पद 34 कहता है, "उसकी करुणा सदा की है," पर सदा की करुणा माँगती है कि हम भी थोड़ा खुले हाथ से जिएँ। आज ही, किसी एक व्यक्ति को जिसके साथ आपने कभी परमेश्वर की चर्चा नहीं की, एक छोटा-सा खाना या मिठाई भेजिए या हाथ में दीजिए, बिना किसी शर्त के।
मुख्य पात्र
दाऊद यहाँ योद्धा से ज़्यादा प्रबन्धक और गायक दिखता है। वह राजा है, पर वह सन्दूक के आगे अपनी वंशावली नहीं गाता; वह अब्राहम, इसहाक और याकूब की कहानी गाता है, और खुद को उस लम्बी शृंखला की एक कड़ी मानता है। उसकी स्मृति में इस्राएल की कमज़ोरी भी ज़िन्दा है: "उस समय तो तुम गिनती में थोड़े थे, बल्कि बहुत ही थोड़े और उस देश में परदेशी थे।" यह एक सफल राजा की विनम्र आत्मकथा है। और वह चीज़ों को टिकाऊ बनाना जानता है: एक दिन का उत्सव उसे काफी नहीं लगता, इसलिए वह गायक ठहराता है, द्वारपाल ठहराता है, सुबह-शाम की बलि ठहराता है। भक्ति को वह भावना नहीं, व्यवस्था बनाता है, ताकि वह उसके मरने के बाद भी बची रहे।
श्रोताओं का परिचय
इतिहास की यह पुस्तक बहुत बाद के पाठकों के लिए लिखी गई, उन लोगों के लिए जो बेबीलोन से लौटकर एक टूटी दीवारवाले येरूशलेम में छोटी-सी बस्ती बसा रहे थे। उनके पास न दाऊद जैसा राजा था, न सुलैमान जैसा वैभव; उनके पास एक मामूली मन्दिर था और फारसी साम्राज्य की छाया। उनके कानों में पद 35 चुभता भी था और सान्त्वना भी देता था: "हमको इकट्ठा करके अन्यजातियों से छुड़ा।" यह प्रार्थना उनकी अपनी थी। उन्होंने इस अध्याय में यह सुना कि गायकों की सेवा, द्वारपालों की ड्यूटी, रोज़ की स्तुति, यह सब किसी राजा के मनमौजी शौक नहीं थे, बल्कि दाऊद की ठहराई हुई नींव थी। छोटी जमात भी सही नींव पर खड़ी हो सकती है।
पृष्ठभूमि
घटना दाऊद के शासन के आरम्भिक वर्षों में घटती है, जब येरूशलेम अभी-अभी यबूसियों से लिया गया नया राजधानी-नगर था। सन्दूक बीस साल से किर्यत्यारीम में पड़ा रह गया था, और उज्जा की मृत्यु की याद अभी ताज़ा थी; लोग जानते थे कि यह पेटी खिलौना नहीं। उस दिन शहर की हवा में जली चर्बी की गंध थी, धूल थी, तुरहियों की तीखी आवाज़ थी। राजनीतिक रूप से यह एक चतुर कदम भी था: जो राजा परमेश्वर के सन्दूक को अपने नगर लाता है, उसका सिंहासन गोत्रों की नज़र में जायज़ ठहरता है। पर दाऊद ने सन्दूक को महल में नहीं, अलग तम्बू में रखा, और खुद याजकीय अधिकार नहीं छीना। सत्ता और श्रद्धा के बीच उसने एक रेखा खींची, जिसे तोड़ने पर बाद के राजा गिरेंगे।
चिंतन
आपकी आराधना में से कौन-सा हिस्सा दूसरों तक पहुँचता है, और कौन-सा सिर्फ आपके भीतर रह जाता है?
गिबोन और येरूशलेम की तरह, आपके जीवन में कौन-सी दो चीज़ें अभी अलग-अलग पड़ी हैं जिन्हें परमेश्वर एक करना चाहते हैं?
1 Chronicles में और गहराई से जानें
चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।
Shows why the retold history of Chronicles is a book of hope.
1 Chronicles: An Introduction and Commentary
A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.
Explains what it meant then, and bridges it honestly to life now.
Faith.network earns a small commission on Kobo purchases made through these links, at no extra cost to you. It helps keep the studies free.
1 Chronicles 16 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
1 इतिहास 16 का क्या अर्थ है?
1 इतिहास 16 किस विषय में है?
1 इतिहास 16 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
1 इतिहास 16 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
1 इतिहास 16 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
1 Chronicles 16 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, मेरे दिन अक्सर शिकायतों से भर जाते हैं, पर आज मैं गाना चाहता हूँ। आपने जो उद्धार मुझे दिया है, उसे मैं हर दिन याद रखूँ और चुपचाप न रहूँ। मेरी ज़िंदगी से किसी और तक भी यह खुशखबरी पहुँचे।
संदूक यरूशलेम पहुँच चुका था, जश्न का दिन था, और उसी गीत के बीच दाऊद कहता है, "हे हमारे उद्धारकर्ता परमेश्वर, हमारा उद्धार कर, और हमको इकट्ठा करके अन्यजातियों से छुड़ा।" सबसे बड़ी खुशी के पल में भी उसे याद था कि अपने लोग अब भी बिखरे हैं। स्तुति के बीच में माँगना शर्म की बात नहीं। और उद्धार का मकसद देख: कि हम उसके पवित्र नाम का धन्यवाद करें।
सन्दूक अभी-अभी यरूशलेम पहुँचा था, दाऊद का दिल खुशी से भरा था, और उसी घड़ी वह गाता है: "जाति जाति में उसके महिमा का, और देश देश के लोगों में उसके आश्चर्यकर्मों का वर्णन करो।" जो कुछ परमेश्वर ने तेरे साथ किया, वह सिर्फ तेरे कमरे की बात नहीं। किसे बताया है तूने इस हफ्ते?
उस समय तो वे गिनती में थोड़े थे, वरन् बहुत ही थोड़े और उस देश में परदेशी थे।" दाऊद यह गीत तब गाता है जब सन्दूक यरूशलेम पहुँच चुका है, जब सब कुछ भरा-पूरा दिखता है। फिर भी वह उन दिनों को नहीं भूलता जब वे मुट्ठी भर लोग थे, बेघर से। तुम्हारी गिनती कम हो सकती है, तुम्हारी जगह पराई लग सकती है, पर परमेश्वर की वाचा गिनती नहीं गिनती।
इस अंश को किसी और स्तर पर देखें
शुरुआती, धर्मशास्त्री, या कोई अलग लंबाई? सेटिंग्स बदलें और अपना संस्करण बनाएँ।
अध्ययन टूल में खोलें
