1 इतिहास 28
पाठ
यरूशलेम में सब बुलाए गए हैं: गोत्रों के हाकिम, सहस्रपति, शतपति, राजा की सम्पत्ति के अधिकारी, वीर और शूरवीर। और बूढ़ा दाऊद, जिसके पाँव अब मुश्किल से उठते हैं, "खड़ा होकर" बोलता है। वह उन्हें बताता है कि मन्दिर बनाने का सपना उसका था, पर परमेश्वर ने वह काम उसके बेटे सुलैमान को सौंपा। फिर वह सुलैमान को भवन का पूरा नमूना सौंपता है, सोने-चाँदी का तौल तक, और अंत में एक वाक्य जो पिता के गले में अटकता है: "मत डर, और तेरा मन कच्चा न हो।"
मर्म
ध्यान दीजिए कि दाऊद क्या नहीं करता। वह परमेश्वर के इनकार को छिपाता नहीं, न उसे मीठा बनाता है। भरे दरबार में, अपने ही उत्तराधिकारी के सामने, वह दोहराता है: "तू मेरे नाम का भवन बनाने न पाएगा, क्योंकि तू युद्ध करनेवाला है और तूने लहू बहाया है।" यह इस अध्याय का धड़कता हुआ हृदय है। परमेश्वर का चुनाव और परमेश्वर का इनकार एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। दाऊद चुना गया, और दाऊद रोका गया। कृपा का अर्थ यह नहीं कि परमेश्वर आपकी हर धार्मिक महत्वाकांक्षा पर मुहर लगा देंगे। वह आपको चुन सकते हैं और फिर भी कह सकते हैं: यह काम तुम्हारा नहीं। और दाऊद इसे कड़वाहट के बिना स्वीकार करता है, बल्कि उस काम के लिए पत्थर, सोना और नक्शा तैयार करता है जिसका श्रेय किसी और को मिलेगा।
जोड़ने वाला सूत्र
पद 6 में एक वाक्य है जो सुलैमान से कहीं बड़ा है: "मैंने उसको चुन लिया है कि मेरा पुत्र ठहरे, और मैं उसका पिता ठहरूँगा।" यह नातान की भविष्यवाणी की गूँज है, और इस्राएल इसे सदियों तक याद रखेगा। पर सुलैमान का राज्य "सदा स्थिर" नहीं रहा; शर्त थी आज्ञापालन, और वह शर्त टूटी। इसलिए यह वादा आगे की ओर झुका रहा, एक ऐसे पुत्र की ओर जो टूटेगा नहीं। नए नियम में बपतिस्मा के समय यही शब्द यीशु पर उतरते हैं। और भवन? जो सुलैमान ने बनाया वह जल गया। जो मसीह में बना, वह जीवित पत्थरों का है। दाऊद का नक्शा एक छाया था; छाया का काम है किसी असली चीज़ की ओर इशारा करना।
दर्पण
हम में से अधिकांश किसी न किसी मोड़ पर दाऊद बनते हैं: वह प्रोजेक्ट जो आपने शुरू किया पर कोई और पूरा करेगा, वह सेवकाई जो किसी छोटे को सौंपी गई, वह सपना जो शरीर या समय ने छीन लिया। और भीतर एक आवाज़ कहती है, तो फिर मैं क्यों लगा रहूँ? दाऊद का जवाब चुभता है: वह सोना तौलता है, नक्शा लिखता है, कारीगर जुटाता है, उस भवन के लिए जिसके उद्घाटन पर वह जीवित नहीं होगा। यही परिपक्व विश्वास है, अपनी विरासत से ज़्यादा परमेश्वर के काम की चिंता। आज एक काम कीजिए: उस व्यक्ति का नाम लिखिए जो आपके बाद आपका काम सँभालेगा, चाहे कलीसिया में, घर में या दफ़्तर में, और उसे एक संदेश भेजकर वह एक बात बता दीजिए जो आपने सीखी है और जो उसके काम आएगी।
एक बारीकी
पद 18 में एक शब्द फिसल जाता है: "रथ अर्थात् यहोवा की वाचा का सन्दूक ढाँकनेवाले और पंख फैलाए हुए करूबों के नमूने।" रथ। सन्दूक को रथ कहा गया है। यह आकस्मिक नहीं। पंख फैलाए करूब कोई सजावट नहीं थे, वे उस सिंहासन के वाहक थे जिस पर बैठकर परमेश्वर चलते हैं। और यहीं पूरे अध्याय का तनाव खुलता है: दाऊद "विश्राम का एक भवन" बनाना चाहता था, पर जो परमेश्वर रथ पर चलते हैं उन्हें बाँधकर बिठाया नहीं जा सकता। मन्दिर परमेश्वर का पिंजरा नहीं, उनकी कृपा का चुना हुआ ठहराव है। जो इसे भूल गए, उन्होंने बाद में मन्दिर को ताबीज़ बना लिया, और परमेश्वर का रथ चल पड़ा।
पृष्ठभूमि
यह दाऊद के शासन का आख़िरी दृश्य है, लगभग 970 ईसा पूर्व के आसपास। सत्ता-हस्तांतरण उस दुनिया में ख़ूनी हुआ करता था; अदोनिय्याह का षड्यंत्र ताज़ा था, सेना के सेनापति बँटे हुए थे, और सुलैमान युवा और अनुभवहीन था। इसलिए दाऊद सिर्फ़ बेटे से निजी बातचीत नहीं करता, वह पूरी राजसभा को बुलाता है। यह सार्वजनिक वैधीकरण है: हाकिम, सहस्रपति, शूरवीर, सब गवाह हैं। पर दाऊद सत्ता की भाषा नहीं बोलता। वह उन्हें "हे मेरे भाइयों! और हे मेरी प्रजा के लोगों!" कहकर पुकारता है, और सिंहासन को "यहोवा के राज्य की गद्दी" कहता है। राजा अपने ही मंच पर खुद को दूसरे स्थान पर रख देता है।
पहले सुननेवाले
इतिहास की यह पुस्तक बहुत बाद में लिखी गई, बेबीलोन से लौटे हुए लोगों के लिए। उनके पास कोई दाऊदवंशी राजा नहीं था, कोई सेना नहीं, और जो मन्दिर वे बना रहे थे वह सुलैमान के मन्दिर की तुलना में दयनीय लगता था। बूढ़े लोग नींव देखकर रोए थे। ऐसे पाठकों के लिए सोने-चाँदी की तौल की यह लम्बी सूची ताना नहीं, दावा है: यह भवन कभी किसी की मनमानी नहीं था, इसका नक्शा "परमेश्वर के आत्मा की प्रेरणा से" आया था। और दाऊद के वे शब्द उनके अपने काँपते हाथों के लिए थे: "मत डर, और तेरा मन कच्चा न हो… वह न तो तुझे धोखा देगा और न तुझे त्यागेगा।"
चिंतन के प्रश्न
कौन-सा काम आप इसलिए अधूरा छोड़ने से डरते हैं क्योंकि उसका श्रेय आपको नहीं मिलेगा?
पद 9 कहता है कि यहोवा "मन को जाँचता और विचार में जो कुछ उत्पन्न होता है उसे समझता है"। आज आपके भीतर कौन-सा विचार है जिसे आप दूसरों से छिपा रहे हैं, पर उनसे नहीं?
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1 Chronicles 28 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
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1 इतिहास 28 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
1 इतिहास 28 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
1 Chronicles 28 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, तूने हर एक को उसका अपना काम सौंपा है, छोटा हो या बड़ा, हर सेवा तेरे सामने कीमती है। मुझे अपनी जगह पहचानने और उसमें मन लगाकर खड़े रहने की कृपा दे। जहाँ मैं दूसरों से अपनी तुलना करने लगूँ, वहाँ मुझे थाम ले, और जो तूने मेरे हाथ में दिया है उसे विश्वासयोग्यता से पूरा करने में मेरी मदद कर।
दाऊद ने यह नहीं कहा कि सुलैमान "मेरी गद्दी" पर बैठेगा, बल्कि "इस्राएल के ऊपर यहोवा के राज्य की गद्दी पर विराजे।" जिस सिंहासन के लिए वह जीवन भर लड़ा, उसे वह अंत में परमेश्वर का कहता है। तेरे हाथ में जो है, घर, काम, जिम्मेदारी, वह भी तेरा नहीं, उसका है। तू बस कुछ समय के लिए उस पर बैठा है। क्या तू ऐसे ही सँभालता है?
पिता, धन्यवाद कि आप छोटी से छोटी बात का हिसाब रखते हैं। काँटों, कटोरों और प्यालों तक के लिए चोखे सोने का तौल ठहराया गया, यह देखकर मन भर आता है। आपकी दृष्टि में मेरी छोटी सेवा, मेरा छोटा समर्पण भी तौला और मूल्यवान है। धन्यवाद कि आप ब्यौरों के परमेश्वर हैं।
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