हाग्गै 2
पाठ
सातवें महीने के इक्कीसवें दिन, जब बुज़ुर्ग लोग नए मन्दिर को देखकर आँसू बहा रहे थे कि यह सुलैमान के मन्दिर की तुलना में कुछ भी नहीं, तब परमेश्वर हाग्गै के द्वारा कहते हैं, "हियाव बाँधो, मैं तुम्हारे संग हूँ।" फिर दो महीने बाद, याजकों के साथ पवित्रता और अशुद्धता का एक अजीब सा प्रश्नोत्तर होता है, और अंत में जरुब्बाबेल को "मुहर वाली अंगूठी" कहकर चुना जाता है। तीन वचन, तीन तिथियाँ, एक ही आवाज़।
मूल बात
यह पाठ उस दुखती रग पर हाथ रखता है जो हर विश्वासी कभी न कभी महसूस करता है, कि जो हम बना रहे हैं वह "पहले" जैसा नहीं है। बुज़ुर्गों की आँखों में सुलैमान के मन्दिर की चमक थी, और सामने खड़ा था एक साधारण, छोटा सा ढाँचा। परमेश्वर इस तुलना को झुठलाते नहीं। वे स्वीकार करते हैं कि "यह तुम्हारी दृष्टि में उस पहले की अपेक्षा कुछ भी अच्छा नहीं है।" पर फिर वे एक असंभव बात कहते हैं, "इस भवन की पिछली महिमा इसकी पहली महिमा से बड़ी होगी।" महिमा वास्तुकला में नहीं है, उपस्थिति में है। यह पाठ हमें सिखाता है कि परमेश्वर की महिमा को नापने का हमारा पैमाना अक्सर गलत होता है।
साझा सूत्र
"थोड़ी ही देर बाकी है कि मैं आकाश और पृथ्वी और समुद्र और स्थल सब को कँपित करूँगा।" यह वचन इब्रानियों 12 में उठाया गया है, वहाँ इसे मसीह के आगमन और अंतिम राज्य से जोड़ा जाता है। हाग्गै का यह छोटा मन्दिर वही स्थान बना जहाँ एक दिन "सारी जातियों की मनभावनी वस्तु" प्रवेश करेगी, और मसीह स्वयं वहाँ चलेंगे। दूसरी महिमा पत्थरों में नहीं, बल्कि उस देह में प्रकट हुई जो इस मन्दिर के आँगन में शिक्षा देती थी। और जरुब्बाबेल, दाऊद का वंशज, "मुहर वाली अंगूठी" के रूप में चुना गया, उस वंशावली में एक कड़ी है जो अंततः यीशु तक जाती है। परमेश्वर छोटे शुरुआतों में बड़े वादे गाड़ते हैं।
दर्पण
यह पाठ उस व्यक्ति के लिए है जो थक चुका है क्योंकि उसका काम "पहले जैसा" नहीं रहा। शायद आपकी कलीसिया छोटी हो गई है, शायद आपका विवाह पुराने दिनों की गर्माहट खो चुका है, शायद आपकी सेवा में वह फल नहीं दिखता जो कभी दिखता था। और आप चुपचाप तुलना करते रहते हैं, जैसे बुज़ुर्ग यहूदी करते थे। परमेश्वर तुलना को झुठलाते नहीं, वे बस उसमें से बाहर निकलने का रास्ता देते हैं, "मैं तुम्हारे संग हूँ।" पवित्रता वाला भाग भी चुभता है, केवल पवित्र वस्त्र छूने से भोजन पवित्र नहीं होता, पर अशुद्धता फैलती है। धार्मिक गतिविधि अपने आप में हमें शुद्ध नहीं करती। हमारा मन्दिर बनाना बेकार है यदि हमारा हृदय अभी भी अशुद्ध है।
मुख्य पात्र
इस अध्याय में परमेश्वर स्वयं मुख्य पात्र हैं, और उनका स्वभाव यहाँ बहुत कोमल है। ध्यान दीजिए, वे डाँटते नहीं। वे उन बुज़ुर्गों को नहीं झिड़कते जो रो रहे हैं। वे जरुब्बाबेल और यहोशू का नाम लेकर पुकारते हैं, तीन बार "हियाव बाँध" कहते हैं। यह वही परमेश्वर हैं जिन्होंने पद 17 में स्वीकार किया कि "मैंने तुम्हारी सारी खेती को लू और गेरूई और ओलों से मारा।" वे न्यायी हैं, पर अभी वे उत्साह देने वाले हैं। वे जरुब्बाबेल को "मेरे दास" और "मुहर वाली अंगूठी" कहते हैं, एक ऐसी उपाधि जो कभी यहोयाकीन से छीनी गई थी (यिर्मयाह 22)। परमेश्वर टूटे हुए वंशों को फिर से जोड़ते हैं। यह उनकी शैली है।
संदर्भ
यह ई.पू. 520 के आसपास की बात है। बेबीलोन के बंधुआई से लौटे यहूदी अब लगभग अठारह वर्षों से यरूशलेम में हैं। पहले उन्होंने वेदी बनाई, फिर मन्दिर की नींव डाली, फिर काम रुक गया, आर्थिक तंगी, पड़ोसियों का विरोध, और अपनी ही उदासीनता के कारण। हाग्गै और जकर्याह उन्हें फिर से काम पर लगाते हैं। सातवें महीने का इक्कीसवाँ दिन झोंपड़ियों के पर्व का सातवाँ दिन था, वही पर्व जब सुलैमान ने अपना मन्दिर समर्पित किया था (1 राजा 8)। कल्पना कीजिए उस दिन की भावना, पर्व की स्मृति, और सामने खड़ा एक अधूरा, छोटा ढाँचा। यही वह पल है जब परमेश्वर बोलते हैं।
प्रश्न
पद 7 का वादा, कि "सारी जातियों की मनभावनी वस्तुएँ आएँगी" और मन्दिर महिमा से भर जाएगा, इतिहास में स्पष्ट रूप से कब पूरा हुआ? हेरोदेस का मन्दिर सुंदर तो था, पर वह ई.स. 70 में नष्ट हो गया। यदि यीशु उस दूसरी महिमा हैं जिन्होंने मन्दिर में प्रवेश किया, तो फिर मन्दिर का विनाश कैसे समझें? शायद यह वादा हमें बताता है कि परमेश्वर की महिमा किसी इमारत से बँधी नहीं रहती। वह उपस्थिति जो एक बार पत्थरों में बसी, अब देह में बसी, और अब उन लोगों में बसती है जो मसीह में हैं। पर यह उत्तर पूरी तरह से हमारी बेचैनी को शान्त नहीं करता। कुछ मौन इस पाठ के चारों ओर बना रहता है, और शायद वही ठीक है
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इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
मन्दिर की नई दीवारें देखकर लोगों की आँखें भर आई थीं, क्योंकि यह पुराने की छाया भी नहीं लगती थी। उसी निराशा के बीच परमेश्वर उन्हें मिस्र की याद दिलाता है: "मेरा आत्मा तुम्हारे बीच में बना है; तुम मत डरो।" वह उनकी इमारत की तारीफ नहीं करता, वह अपनी उपस्थिति का वादा दोहराता है। आज तेरा काम भी छोटा दिखे, तो याद रख, जो तेरे साथ है वह छोटा नहीं।
पिता, जब मेरे चारों ओर सब कुछ हिलता है, तब याद दिला कि हिलाने वाला तू ही है और तेरा हाथ थामे रहने में ही मेरी सुरक्षा है। जो टिक नहीं सकता, वह गिर जाए, पर तुझ पर मेरा भरोसा बना रहे। डर के बीच भी मुझे स्थिर रख।
जब कोई बीस नपुए के ढेर पर आता, तब दस ही निकलते थे।" गिनती तो की थी बीस की, हाथ में आया दस। तुमने भी कभी ऐसा महसूस किया है? मेहनत पूरी, पर थैली में छेद। परमेश्वर यहाँ डाँट नहीं रहा, वह ध्यान खींच रहा है। उसका भवन उजाड़ पड़ा था और लोग अपने घर सजा रहे थे। आज अपनी कमी को गिनने से पहले पूछो, मैंने किसे पहला स्थान दिया है?
उसी महीने के चौबीसवें दिन को यहोवा का वचन दूसरी बार हाग्गै के पास पहुँचा।" उसी दिन, दूसरी बार। सुबह जो कहा गया था, वह काफी नहीं था। परमेश्वर के पास कहने को और बाकी था। कभी सोचा है कि उसने तुझसे बात करना बंद कर दिया? शायद वह आज ही फिर बोलने वाला है। सुनने को तैयार रह।
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