बाइबल व्याख्या

1 इतिहास 4:10

बाइबल

पाठ

नामों की एक लम्बी, सूखी सूची के बीच अचानक एक आदमी साँस लेता है। याबेस, जिसकी माता ने उसका नाम ही दर्द पर रखा था, "मैंने इसे पीड़ित होकर उत्पन्न किया", वह इस्राएल के परमेश्वर को पुकारता है। उसकी प्रार्थना में चार माँगें हैं: कि परमेश्वर उसे सचमुच आशीष दें, उसका देश बढ़ाएँ, उनका हाथ उसके साथ रहे, और वे उसे बुराई से ऐसा बचाए रखें कि वह पीड़ित न हो। फिर एक छोटा-सा वाक्य, जिसके आगे वंशावली फिर से चलने लगती है: "और जो कुछ उसने माँगा, वह परमेश्वर ने उसे दिया।" कोई मंदिर नहीं, कोई याजक नहीं, कोई चमत्कार का वर्णन नहीं। बस एक पुकार और एक उत्तर।

मर्म

ध्यान दीजिए कि याबेस किसे पुकारता है: किसी अनजान शक्ति को नहीं, बल्कि "इस्राएल के परमेश्वर" को, उस परमेश्वर को जिसने वाचा बाँधी है, जिसने इस देश को देने का वचन दिया है। इसलिए "मेरा देश बढ़ाता" कोई लालची विस्तारवाद नहीं है; यह एक ऐसे व्यक्ति की प्रार्थना है जो परमेश्वर की दी हुई प्रतिज्ञा में अपना हिस्सा माँगने की हिम्मत करता है। यहीं इस पद का धर्मशास्त्रीय मर्म है: अनुग्रह नाम से बड़ा है। जिस बच्चे को जन्म से ही "दर्द" कहकर पुकारा गया, उसका भविष्य उसकी माता की पीड़ा से तय नहीं होता, बल्कि परमेश्वर के हाथ से। और वह हाथ माँगा जाता है, मान नहीं लिया जाता। प्रार्थना यहाँ भाग्य को तोड़ने का साधन नहीं, बल्कि वाचा के परमेश्वर पर भरोसे का सबसे नंगा रूप है।

सूत्र

याबेस की प्रार्थना एक ऐसे परिवार-वृक्ष के बीच खड़ी है जो निर्वासन से लौटे लोगों के लिए लिखा गया था। जो लोग बाबेल से टूटे-फूटे लौटे थे, जिनकी ज़मीन छिन चुकी थी और जिनका नाम राष्ट्रों के बीच मिट्टी में मिल गया था, उनके लिए इतिहास लेखक इस एक आदमी को सूची के बीच खड़ा कर देता है: देखो, एक ने माँगा और परमेश्वर ने दिया। यही सूत्र आगे बढ़ता है। मसीह भी एक वंशावली के अंत में आते हैं, और वे भी दुख में जन्मे और दुख के आदमी कहलाए। गतसमनी में उन्होंने भी यही माँगा कि बुराई टल जाए, पर उनका उत्तर "हाँ" नहीं, "मेरे साथ रहूँगा" था। प्रभु ने जो प्रार्थना सिखाई, उसमें भी अंतिम माँग यही है कि हमें बुराई से बचाया जाए। याबेस की पुकार अधूरी नहीं, बस पहले पन्ने पर लिखी हुई है।

दर्पण

आपको भी कोई नाम मिला है। शायद माता-पिता ने नहीं दिया, पर किसी ने दे दिया: "यह हमेशा ऐसा ही रहेगा", "वह जिससे शादी नहीं चली", "जिसका बेटा बिगड़ गया", "जो कभी आगे नहीं बढ़ पाया"। और सबसे ख़तरनाक बात यह है कि हम उस नाम को मान लेते हैं। हम प्रार्थना में छोटी-छोटी माँगें रखते हैं, क्योंकि भीतर कहीं हमें लगता है कि हमारा हिस्सा उतना ही है जितना दर्द ने हमें दे रखा है। याबेस यह मानने से इनकार करता है। वह अपने नाम को परमेश्वर के सामने रखता है और सीमा बढ़ाने की हिम्मत करता है। यह घमंड नहीं, भरोसा है, क्योंकि वह जानता है कि देने वाला कौन है। पर ध्यान रखिए, वह सम्मान, धन या बदला नहीं माँगता; वह माँगता है कि परमेश्वर का हाथ उसके साथ रहे। आज: एक कागज़ पर वह नाम लिखिए जो आपने चुपचाप अपने ऊपर चिपका रखा है, फिर उसके नीचे एक वाक्य में वह सीमा लिखिए जिसे आप परमेश्वर से बढ़ाने को कहना चाहते हैं, और उसे ज़ोर से बोलकर माँग लीजिए।

प्रश्न

और अगर परमेश्वर न दें? यह पद बहुत सीधा है: "जो कुछ उसने माँगा, वह परमेश्वर ने उसे दिया।" पर हम सब ऐसे लोगों को जानते हैं जिन्होंने उतनी ही ईमानदारी से माँगा और खाली हाथ रहे। इस पद को एक फार्मूला बना देना क्रूरता है, मानो सही शब्द बोलने पर ताला खुल जाता हो। पाठ हमें यह नहीं बताता कि याबेस को कब, कैसे, कितना मिला; न यह कि उसका जीवन आगे आसान रहा। इतिहास लेखक बस एक गवाही दर्ज करता है, गारंटी नहीं। शायद यही ईमानदार उत्तर है: प्रार्थना परमेश्वर को बाध्य नहीं करती, पर वह उन्हें बदल भी नहीं सकती, यह मान लेना उससे भी बड़ी गलती है। रहस्य बना रहता है, और उसके भीतर हमें फिर भी पुकारने को कहा जाता है।

बारीकी

"तेरा हाथ मेरे साथ रहता" वाली माँग सबसे कम ध्यान पाती है और सबसे ज़्यादा वज़न रखती है। बाकी तीन माँगें नतीजों की हैं: आशीष, ज़मीन, सुरक्षा। यह एक माँग उपस्थिति की है। हाथ इब्रानी सोच में शक्ति और अधिकार का चिन्ह है, वही हाथ जिसने इस्राएल को मिस्र से निकाला। याबेस यह नहीं कहता कि मुझे अकेले काम करने की ताकत दीजिए; वह कहता है कि आप मेरे साथ चलिए। और यहीं उसकी प्रार्थना लालच से अलग हो जाती है। बढ़ी हुई ज़मीन बिना परमेश्वर के हाथ के बस ज़्यादा ज़िम्मेदारी है, और सुरक्षा बिना उनकी उपस्थिति के बस खालीपन। जो आप माँग रहे हैं, उसमें यह बीच वाली माँग है या नहीं, यही जाँचने लायक है।

शास्त्र की गूँज

उत्पत्ति में राहेल मरते-मरते अपने बेटे का नाम "मेरे दुख का पुत्र" रखती है, और याकूब तुरंत उसे बदलकर बिन्यामीन कर देता है। वहाँ पिता नाम बदलता है; यहाँ याबेस का नाम नहीं बदलता, पर उसका भविष्य बदल जाता है, और वह "अपने भाइयों से अधिक प्रतिष्ठित हुआ"। दूसरी गूँज नए नियम से आती है, जहाँ यीशु बार-बार माँगते रहने का आग्रह करते हैं और कहते हैं कि माँगने वाले को दिया जाता है। याबेस उस शिक्षा का पुराना नियम में खड़ा जीवित उदाहरण है: एक अनजान आदमी, बिना पद के, बिना मंदिर के, जिसने बस पुकारा।

मनन

आपकी प्रार्थनाओं में सबसे बड़ी माँग कौन-सी है, और क्या वह आपके नाम से बड़ी है या उसी के बराबर?

अगर परमेश्वर आज आपकी "सीमा" बढ़ा दें, तो क्या आप सच में चाहेंगे कि उनका हाथ भी साथ चले, या आप बस ज़मीन चाहते हैं?

1 Chronicles में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

The Message of Chronicles

Michael Wilcock

Shows why the retold history of Chronicles is a book of hope.

1 Chronicles: An Introduction and Commentary

Martin Selman

A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.

1 and 2 Chronicles

Andrew Hill

Explains what it meant then, and bridges it honestly to life now.

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1 Chronicles 4:10 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

1 इतिहास 4:10 का क्या अर्थ है?
नामों की एक लम्बी, सूखी सूची के बीच अचानक एक आदमी साँस लेता है। याबेस, जिसकी माता ने उसका नाम ही दर्द पर रखा था, "मैंने इसे पीड़ित होकर उत्पन्न किया", वह इस्राएल के परमेश्वर को पुकारता है। उसकी प्रार्थना में चार माँगें हैं: कि परमेश्वर उसे सचमुच आशीष दें, उसका देश बढ़ाएँ, उनका हाथ उसके साथ रहे, और वे उसे बुराई से ऐसा बचाए रखें कि वह पीड़ित न हो। फिर एक छोटा-सा वाक्य, जिसके आगे वंशावली फिर से चलने लगती है: "और जो कुछ उसने माँगा, वह परमेश्वर ने उसे दिया।" कोई मंदिर नहीं, कोई याजक नहीं, कोई चमत्कार का वर्णन नहीं। बस एक पुकार और एक उत्तर।
1 इतिहास 4:10 किस विषय में है?
याबेस की प्रार्थना एक ऐसे परिवार-वृक्ष के बीच खड़ी है जो निर्वासन से लौटे लोगों के लिए लिखा गया था। जो लोग बाबेल से टूटे-फूटे लौटे थे, जिनकी ज़मीन छिन चुकी थी और जिनका नाम राष्ट्रों के बीच मिट्टी में मिल गया था, उनके लिए इतिहास लेखक इस एक आदमी को सूची के बीच खड़ा कर देता है: देखो, एक ने माँगा और परमेश्वर ने दिया। यही सूत्र आगे बढ़ता है। मसीह भी एक वंशावली के अंत में आते हैं, और वे भी दुख में जन्मे और दुख के आदमी कहलाए। गतसमनी में उन्होंने भी यही माँगा कि बुराई टल जाए, पर उनका उत्तर "हाँ" नहीं, "मेरे साथ रहूँगा" था। प्रभु ने जो प्रार्थना सिखाई, उसमें भी अंतिम माँग यही है कि हमें बुराई से बचाया जाए। याबेस की पुकार अधूरी नहीं, बस पहले पन्ने पर लिखी हुई है।
1 इतिहास 4:10 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
और अगर परमेश्वर न दें? यह पद बहुत सीधा है: "जो कुछ उसने माँगा, वह परमेश्वर ने उसे दिया।" पर हम सब ऐसे लोगों को जानते हैं जिन्होंने उतनी ही ईमानदारी से माँगा और खाली हाथ रहे। इस पद को एक फार्मूला बना देना क्रूरता है, मानो सही शब्द बोलने पर ताला खुल जाता हो। पाठ हमें यह नहीं बताता कि याबेस को कब, कैसे, कितना मिला; न यह कि उसका जीवन आगे आसान रहा। इतिहास लेखक बस एक गवाही दर्ज करता है, गारंटी नहीं। शायद यही ईमानदार उत्तर है: प्रार्थना परमेश्वर को बाध्य नहीं करती, पर वह उन्हें बदल भी नहीं सकती, यह मान लेना उससे भी बड़ी गलती है। रहस्य बना रहता है, और उसके भीतर हमें फिर भी पुकारने को कहा जाता है।
1 इतिहास 4:10 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
उत्पत्ति में राहेल मरते-मरते अपने बेटे का नाम "मेरे दुख का पुत्र" रखती है, और याकूब तुरंत उसे बदलकर बिन्यामीन कर देता है। वहाँ पिता नाम बदलता है; यहाँ याबेस का नाम नहीं बदलता, पर उसका भविष्य बदल जाता है, और वह "अपने भाइयों से अधिक प्रतिष्ठित हुआ"। दूसरी गूँज नए नियम से आती है, जहाँ यीशु बार-बार माँगते रहने का आग्रह करते हैं और कहते हैं कि माँगने वाले को दिया जाता है। याबेस उस शिक्षा का पुराना नियम में खड़ा जीवित उदाहरण है: एक अनजान आदमी, बिना पद के, बिना मंदिर के, जिसने बस पुकारा।
1 इतिहास 4:10 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
अगर परमेश्वर आज आपकी "सीमा" बढ़ा दें, तो क्या आप सच में चाहेंगे कि उनका हाथ भी साथ चले, या आप बस ज़मीन चाहते हैं?
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1 Chronicles 4 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 12

एशतोन से बेतरापा, पासेह और ईर्नाहाश का पिता तहिन्ना उत्पन्न हुआ।" इन नामों की कोई कहानी नहीं बची, न कोई चमत्कार, न कोई गीत। फिर भी परमेश्वर ने इन्हें अपनी पुस्तक में लिखवा दिया। तुम सोचते हो तुम्हारा जीवन किसी को याद नहीं रहेगा। पर जो नाम लिखता है, वह भूलता नहीं।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 40

शिमोन के वंश ने अपनी भेड़ों के लिए चराई ढूँढ़ते हुए कदम बढ़ाया, और लिखा है: "उनको उत्तम से उत्तम चराई मिली, और देश लम्बा चौड़ा, चैन और शान्ति का था।" वह जगह पहले से वहीं थी, पर उन्हें निकलना पड़ा। परमेश्वर की तैयार की हुई चीज़ें अक्सर हमारी तंग जगह के बाहर मिलती हैं। तू किस डर के कारण ठहरा हुआ है?

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