बाइबल व्याख्या

1 कुरिन्थियों 15:33

बाइबल

पाठ

पौलुस पुनरुत्थान पर अपनी लम्बी दलील के बीच अचानक रुककर एक चेतावनी देते हैं: अपने आपको बहकने मत दो। और फिर वे एक कहावत उद्धृत करते हैं जो उनके पाठकों को शायद थिएटर से या बाज़ार की बातचीत से परिचित थी: "बुरी संगति अच्छे चरित्र को बिगाड़ देती है।" यह वाक्य पिछली आयत से जुड़ा है, जहाँ मरे हुओं के न जी उठने का तर्क इस नारे पर पहुँचता है, "तो आओ, खाएँ-पीएँ, क्योंकि कल तो मर ही जाएँगे।" यानी यहाँ "बुरी संगति" केवल गलत दोस्त नहीं, बल्कि वे लोग और वे विचार हैं जो कलीसिया के भीतर पुनरुत्थान को नकार रहे थे।

मूल बात

यह छोटी-सी आयत एक बड़ी बात कहती है: धर्मसिद्धान्त कभी निर्दोष नहीं रहता। जिसे आप सच मानते हैं, वह धीरे-धीरे आपके शरीर तक उतर आता है, आपके पैसे खर्च करने के तरीके तक, आपकी भूख तक। यदि मृत्यु अन्तिम शब्द है, तो संयम मूर्खता है और भोग ही बुद्धिमानी। पौलुस इस तर्क को गलत नहीं कहते, वे इसे खतरनाक कहते हैं, क्योंकि यह तर्क लोगों के ज़रिए फैलता है, किताबों के ज़रिए नहीं। "धोखा न खाना" में एक कड़ी बात छिपी है: बिगड़ाव अक्सर विद्रोह जैसा नहीं दिखता, वह रिश्तों की गर्माहट में, हँसी-मज़ाक में, सहमति के दबाव में चुपचाप होता है। अनुग्रह से जीनेवाला व्यक्ति भी अपनी संगति के प्रति लापरवाह नहीं हो सकता; चरित्र कोई किला नहीं, वह एक बगीचा है जिसमें हवा जो लाती है, वही उगता है।

सूत्र

पुनरुत्थान की आशा शास्त्र में हमेशा नैतिक वज़न लिए आती है। परमेश्वर ने अपने लोगों को मिस्र से निकालकर पहला काम यही किया कि उन्हें बताया किस तरह जीना है, क्योंकि छुटकारा और चालचलन एक ही धागे के दो सिरे हैं। पौलुस यहाँ वही करते हैं। उनकी पूरी दलील इस ओर बढ़ रही है कि मसीह "जो सो गए हैं, उनमें पहला फल" है, यानी वह पहली मुट्ठी जो पूरी फसल की गवाही देती है। यदि कब्र का अन्त निश्चित है, तो इस शरीर से किया गया हर काम मायने रखता है। इसलिए अध्याय का अन्त संयोग नहीं: "तुम्हारा परिश्रम प्रभु में व्यर्थ नहीं है।" बुरी संगति ठीक इसी विश्वास को खोखला करती है, और उसके साथ परिश्रम का अर्थ भी।

दर्पण

हममें से ज़्यादातर लोग किसी सिद्धान्त पर बहस करके नहीं बदलते; हम उस मेज़ पर बदलते हैं जहाँ हम हफ़्ते में तीन बार बैठते हैं। दफ़्तर का वह समूह जिसमें ईमानदारी को भोलापन कहकर हँसा जाता है। वह दोस्त जो हर बार आपके खर्च की सीमा को थोड़ा और खिसका देता है। वे व्हाट्सएप बातचीतें जिनमें विवाह, शरीर और पैसे के बारे में एक ऐसी दुनिया मान ली जाती है जहाँ मरे हुए नहीं जी उठते। आपने कोई सिद्धान्त नहीं छोड़ा, बस आपकी भूख बदल गई। पौलुस इसे शर्मिंदगी की भाषा में कहते हैं, और यह कड़वा लगता है: "मैं तुम्हें लज्जित करने के लिये यह कहता हूँ।" आज एक काम कीजिए: कागज़ पर वह एक वाक्य लिखिए जो पिछले महीने आपने किसी से सुना और जिसने चुपचाप आपकी भूख बदली, और उसके नीचे ज़ोर से बोलकर लिखिए, "मसीह मुर्दों में से जी उठा है।"

मुख्य पात्र

इस आयत के पीछे एक थका हुआ, झुलसा हुआ आदमी खड़ा है। पौलुस अभी-अभी कह चुके हैं, "मैं प्रतिदिन मरता हूँ," और इफिसुस के वन-पशुओं का ज़िक्र किया है। उन्हें पता है कि उनकी पूरी ज़िन्दगी एक ही दाँव पर लगी है, और अगर वह दाँव झूठा हुआ तो वे "सब मनुष्यों से अधिक अभागे" हैं। यही वह आदमी है जो खुद को "अधूरे दिनों का जन्मा" कहता है और कलीसिया को सतानेवाला मानकर सबसे छोटा प्रेरित कहलाता है। उसकी कठोरता घमंड से नहीं, घावों से निकलती है। जो व्यक्ति स्वयं अनुग्रह से बदला गया है, वह जानता है कि मनुष्य कितनी आसानी से बहक जाता है, इसलिए वह चेतावनी देने में नरमी नहीं बरतता।

संदर्भ

कुरिन्थुस बन्दरगाह का शहर था, पैसा नया और चमकदार, सम्मान की भूख तेज़। वहाँ भोज केवल खाना नहीं थे, वे सामाजिक मंच थे जहाँ रिश्ते बनते और टूटते थे, और जहाँ शराब के साथ दर्शन भी परोसा जाता था। यूनानी माहौल में आत्मा की अमरता समझ में आती थी, पर शरीर का जी उठना मूर्खता लगता था; शरीर तो वह पिंजरा था जिससे छुटकारा पाना था। इसीलिए कलीसिया के कुछ लोग कहते थे "मरे हुओं का पुनरुत्थान है ही नहीं।" जो कहावत पौलुस उद्धृत करते हैं, वह उस समय के नाटकों से निकली एक आम कहावत थी, जैसे आज कोई फिल्मी संवाद। पौलुस सड़क की भाषा उठाकर उसे सुसमाचार की सेवा में लगा देते हैं।

अन्तर्पाठ

सबसे तेज़ गूँज ठीक पिछली आयत में है: "तो आओ, खाएँ-पीएँ, क्योंकि कल तो मर ही जाएँगे।" यह यशायाह 22 से लिया गया है, जहाँ यरूशलेम घेरे में है और परमेश्वर लोगों को रोने और मन फिराने के लिए बुलाते हैं, पर वे बैल काटकर दावत करते हैं। वहाँ यह वाक्य विद्रोह का नारा था, धर्मसिद्धान्त नहीं; पौलुस उसी को कुरिन्थुस के सामने रख देते हैं ताकि वे देखें कि उनका "आधुनिक" तर्क असल में कितना पुराना है। दूसरी ओर भजन 1 की तस्वीर खड़ी होती है, जहाँ धन्य मनुष्य की पहचान ही इस बात से होती है कि वह दुष्टों की सम्मति पर नहीं चलता, बल्कि बहते पानी के किनारे लगे पेड़ की तरह फल लाता है। संगति और फल हमेशा साथ चलते हैं। और इसी पत्री में पौलुस पहले कह चुके थे कि थोड़ा-सा खमीर पूरे गूँधे हुए आटे को बदल देता है; वहाँ बात नैतिक ढील की थी, यहाँ विश्वास की, पर खमीर का स्वभाव वही है।

चिंतन

पिछले छह महीनों में किस बातचीत या रिश्ते ने आपकी इच्छाओं को उस दिशा में खिसकाया है जिसे आपने कभी जानबूझकर नहीं चुना?

यदि आप सचमुच मानते हैं कि आपका शरीर एक दिन अविनाशी होकर उठेगा, तो इस सप्ताह आपके शरीर के साथ किया गया कौन-सा एक व्यवहार बदलना चाहिए?

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1 Corinthians: An Introduction and Commentary

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1 Corinthians 15:33 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

1 कुरिन्थियों 15:33 का क्या अर्थ है?
पौलुस पुनरुत्थान पर अपनी लम्बी दलील के बीच अचानक रुककर एक चेतावनी देते हैं: अपने आपको बहकने मत दो। और फिर वे एक कहावत उद्धृत करते हैं जो उनके पाठकों को शायद थिएटर से या बाज़ार की बातचीत से परिचित थी: "बुरी संगति अच्छे चरित्र को बिगाड़ देती है।" यह वाक्य पिछली आयत से जुड़ा है, जहाँ मरे हुओं के न जी उठने का तर्क इस नारे पर पहुँचता है, "तो आओ, खाएँ-पीएँ, क्योंकि कल तो मर ही जाएँगे।" यानी यहाँ "बुरी संगति" केवल गलत दोस्त नहीं, बल्कि वे लोग और वे विचार हैं जो कलीसिया के भीतर पुनरुत्थान को नकार रहे थे।
1 कुरिन्थियों 15:33 किस विषय में है?
पुनरुत्थान की आशा शास्त्र में हमेशा नैतिक वज़न लिए आती है। परमेश्वर ने अपने लोगों को मिस्र से निकालकर पहला काम यही किया कि उन्हें बताया किस तरह जीना है, क्योंकि छुटकारा और चालचलन एक ही धागे के दो सिरे हैं। पौलुस यहाँ वही करते हैं। उनकी पूरी दलील इस ओर बढ़ रही है कि मसीह "जो सो गए हैं, उनमें पहला फल" है, यानी वह पहली मुट्ठी जो पूरी फसल की गवाही देती है। यदि कब्र का अन्त निश्चित है, तो इस शरीर से किया गया हर काम मायने रखता है। इसलिए अध्याय का अन्त संयोग नहीं: "तुम्हारा परिश्रम प्रभु में व्यर्थ नहीं है।" बुरी संगति ठीक इसी विश्वास को खोखला करती है, और उसके साथ परिश्रम का अर्थ भी।
1 कुरिन्थियों 15:33 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
इस आयत के पीछे एक थका हुआ, झुलसा हुआ आदमी खड़ा है। पौलुस अभी-अभी कह चुके हैं, "मैं प्रतिदिन मरता हूँ," और इफिसुस के वन-पशुओं का ज़िक्र किया है। उन्हें पता है कि उनकी पूरी ज़िन्दगी एक ही दाँव पर लगी है, और अगर वह दाँव झूठा हुआ तो वे "सब मनुष्यों से अधिक अभागे" हैं। यही वह आदमी है जो खुद को "अधूरे दिनों का जन्मा" कहता है और कलीसिया को सतानेवाला मानकर सबसे छोटा प्रेरित कहलाता है। उसकी कठोरता घमंड से नहीं, घावों से निकलती है। जो व्यक्ति स्वयं अनुग्रह से बदला गया है, वह जानता है कि मनुष्य कितनी आसानी से बहक जाता है, इसलिए वह चेतावनी देने में नरमी नहीं बरतता।
1 कुरिन्थियों 15:33 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
सबसे तेज़ गूँज ठीक पिछली आयत में है: "तो आओ, खाएँ-पीएँ, क्योंकि कल तो मर ही जाएँगे।" यह यशायाह 22 से लिया गया है, जहाँ यरूशलेम घेरे में है और परमेश्वर लोगों को रोने और मन फिराने के लिए बुलाते हैं, पर वे बैल काटकर दावत करते हैं। वहाँ यह वाक्य विद्रोह का नारा था, धर्मसिद्धान्त नहीं; पौलुस उसी को कुरिन्थुस के सामने रख देते हैं ताकि वे देखें कि उनका "आधुनिक" तर्क असल में कितना पुराना है। दूसरी ओर भजन 1 की तस्वीर खड़ी होती है, जहाँ धन्य मनुष्य की पहचान ही इस बात से होती है कि वह दुष्टों की सम्मति पर नहीं चलता, बल्कि बहते पानी के किनारे लगे पेड़ की तरह फल लाता है। संगति और फल हमेशा साथ चलते हैं। और इसी पत्री में पौलुस पहले कह चुके थे कि थोड़ा-सा खमीर पूरे गूँधे हुए आटे को बदल देता है; वहाँ बात नैतिक ढील की थी, यहाँ विश्वास की, पर खमीर का स्वभाव वही है।
1 कुरिन्थियों 15:33 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
यदि आप सचमुच मानते हैं कि आपका शरीर एक दिन अविनाशी होकर उठेगा, तो इस सप्ताह आपके शरीर के साथ किया गया कौन-सा एक व्यवहार बदलना चाहिए?
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1 Corinthians 15 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

धन्यवाद संपादकीय पर पद 58

पिता, धन्यवाद कि आपके वचन के अनुसार प्रभु में हमारा परिश्रम व्यर्थ नहीं है। जो सेवा किसी की नज़र में नहीं आती, वह भी आपकी नज़र में सुरक्षित है। धन्यवाद कि आप हमें दृढ़ और अटल बनाए रखते हैं, और थकी हुई घड़ियों में भी काम करते रहने की शक्ति देते हैं।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 2

पौलुस कहता है, "उसी के द्वारा तुम्हारा उद्धार भी होता है, यदि उस सुसमाचार को जो मैंने तुम्हें सुनाया था, स्मरण रखते हो।" ध्यान दे, बात नए अनुभव की नहीं, थामे रहने की है। जो सच तूने पहले दिन सुना था, वही आज भी तुझे संभालता है। सवाल यह है कि क्या तू उसे अब भी पकड़े हुए है, या धीरे धीरे हाथ ढीला हो गया?

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