1 शमूएल 16:6
पाठ
शमूएल बैतलहम पहुँच चुका है, यज्ञ की तैयारी हो गई है, यिशै और उसके बेटे पवित्र किए जाकर सामने आ खड़े होते हैं। पहला बेटा एलीआब आगे आता है, और उसी पल भविष्यद्वक्ता के भीतर एक निर्णय बन जाता है: "निश्चय यह जो यहोवा के सामने है वही उसका अभिषिक्त होगा।" ध्यान दीजिए, यह वाक्य शमूएल ने बोला नहीं, सोचा है। यह उसकी प्रार्थना नहीं, उसका अनुमान है। परमेश्वर ने अभी कुछ कहा ही नहीं, फिर भी शमूएल के मन ने फैसला सुना दिया, और वह फैसला "निश्चय" शब्द के साथ आता है, जैसे इसमें संदेह की कोई गुंजाइश ही न हो। पूरे अध्याय का मोड़ इसी एक अनकहे विचार पर टिका है।
मूल बात
यह पद हमें बताता है कि परमेश्वर के सबसे अनुभवी सेवक की आँख भी परमेश्वर की आँख नहीं है। शमूएल ने शाऊल का अभिषेक किया था, शाऊल का पतन देखा था, और इस्राएल पर वर्षों न्याय किया था; फिर भी वह उसी जाल में पैर रखता है जिसमें पूरा इस्राएल फँसा था, यानी कद, क्रम और रूप। एलीआब जेठा है, और प्राचीन पूर्व में जेठा ही स्वाभाविक उत्तराधिकारी है। शमूएल की गलती अनैतिक नहीं, बिल्कुल तर्कसंगत है, और यही उसे खतरनाक बनाता है। परमेश्वर का चुनाव योग्यता की सीढ़ी से नहीं उतरता, वह अनुग्रह से आता है, और अनुग्रह हमारी व्यवस्थाओं को तोड़कर आता है। इसलिए अगले ही पद में परमेश्वर को शमूएल की दृष्टि सुधारनी पड़ती है: "यहोवा का देखना मनुष्य का सा नहीं है।" राजा परमेश्वर देता है, प्रजा या भविष्यद्वक्ता उसे पहचानती भी तभी है जब परमेश्वर बताते हैं।
मुख्य सूत्र
एलीआब पर टिकी यह नज़र बाइबल की एक पुरानी आदत को दोहराती है, और परमेश्वर की एक पुरानी आदत को भी। पहलौठा आगे खड़ा होता है, और परमेश्वर उसके पीछे वाले को चुन लेते हैं। इश्माएल के बाद इसहाक, एसाव के बाद याकूब, और अब सात भाइयों के बाद वह लड़का जिसे यज्ञ के न्योते में गिनना भी ज़रूरी नहीं समझा गया। यह क्रम बेतरतीब नहीं है; यह परमेश्वर के राज्य की व्याकरण है। और यह व्याकरण अपने अंतिम रूप में उसी बैतलहम में पूरी होती है, जहाँ एक और अनदेखा वंशज जन्म लेगा, जिसके बारे में यशायाह 53 कहता है कि उसमें न रूप था न शोभा कि हम उसे देखकर मोहित हों। शमूएल की आँख एलीआब पर अटकी थी; सदियों बाद इस्राएल की आँख नासरत के बढ़ई पर अटककर आगे बढ़ गई। मसीह को पहचानने में जो चूक हुई, उसका पहला अभ्यास इसी पद में है।
दर्पण
यह पद आपकी नैतिकता पर नहीं, आपके आत्मविश्वास पर हाथ रखता है। शमूएल बुरा आदमी नहीं था, बस निश्चिंत था। और हम भी वहीं फिसलते हैं: किसी नए व्यक्ति को कलीसिया में देखकर दो मिनट में तय कर लेना कि यह "आगे बढ़ने वाला" है; अपने बच्चों में से एक पर चुपचाप ज़्यादा उम्मीद रख देना क्योंकि वह ज़्यादा तेज़ बोलता है; दफ़्तर में उस सहकर्मी को गिनती से बाहर कर देना जो अच्छे कपड़े नहीं पहनता। और इसका उल्टा पहलू भी उतना ही चुभता है: शायद आप ही वह हैं जिसे खेत में छोड़ दिया गया, जिसका नाम मेज़ पर नहीं लिया गया। इस पद की खबर यह है कि परमेश्वर की सूची और मनुष्य की सूची एक नहीं होती। आज ही, दस मिनट के भीतर: उस एक व्यक्ति का नाम कागज़ पर लिखिए जिसे आपने पिछले महीने "काम का नहीं" मानकर मन में किनारे कर दिया था, और उस नाम को ज़ोर से पढ़कर परमेश्वर से उसके लिए आशीष माँगिए।
अन्य वचनों की गूँज
इसी पुस्तक के अगले अध्याय में एलीआब फिर सामने आता है, और इस बार वह अपने छोटे भाई पर गुस्से से बरसता है, उसके अभिमान और मन की बुराई का इल्ज़ाम लगाता है, ठीक उसी दिन जब दाऊद गोलियत के सामने खड़ा होने वाला है। जिसे शमूएल ने "निश्चय" कहा था, उसका हृदय कथा खुद खोलकर दिखा देती है। पौलुस इसी सिद्धांत को कलीसिया की नींव बनाता है जब वह कुरिन्थ की मंडली से कहता है कि परमेश्वर ने जगत के निर्बलों और तुच्छों को चुन लिया ताकि बलवानों को लज्जित करे, और कोई प्राणी उसके सामने घमंड न करे। यह वही तर्क है जो अभिषेक के तेल से शुरू होकर क्रूस तक जाता है: चुनाव योग्यता का पुरस्कार नहीं, अनुग्रह का निर्णय है।
कठिन प्रश्न
अगर परमेश्वर बाहरी रूप नहीं देखते, तो पद 12 में दाऊद का वर्णन इतना शारीरिक क्यों है, लाली झलकती थी, आँखें सुन्दर, रूप सुडौल? यह विरोधाभास मिटाना आसान नहीं। पाठ यह नहीं कहता कि शरीर बेमानी है; वह कहता है कि शरीर निर्णायक नहीं है। दाऊद सुंदर था, पर वह इसलिए नहीं चुना गया कि वह सुंदर था, वरना शमूएल उसे भाइयों के बीच से पहचान लेता। और यहाँ एक बेचैनी बची रहती है: दाऊद का हृदय आगे चलकर टूटेगा, बतशेबा और ऊरिय्याह का किस्सा आएगा। तो क्या परमेश्वर का "मन पर दृष्टि" रखना भी उन्हें एक निर्दोष राजा नहीं दे सका? नहीं दे सका, और शायद इसीलिए यह अभिषेक अंतिम नहीं है, केवल एक इशारा है उस अभिषिक्त की ओर जिसका हृदय जाँच में पूरा उतरेगा।
संदर्भ
समय ऐसा है कि इस्राएल का पहला राजा अब भी सिंहासन पर बैठा है, सेना उसके पास है, और परमेश्वर उसे छोड़ चुके हैं। शमूएल का बैतलहम जाना इसीलिए एक जोखिम भरा काम है; वह खुद कहता है कि शाऊल सुन लेगा तो मुझे घात करेगा। बैतलहम कोई राजधानी नहीं, यहूदा की पहाड़ियों में एक छोटा कस्बा है, और वहाँ के पुरनिये भविष्यद्वक्ता को आते देखकर "थरथराते हुए" मिलने आते हैं, क्योंकि भविष्यद्वक्ता का आना आम तौर पर न्याय का संकेत होता था। यज्ञ एक सार्वजनिक, पारिवारिक भोज था, जहाँ बैठने का क्रम भी उम्र और प्रतिष्ठा से तय होता। यिशै अपने बेटों को उसी क्रम में पेश करता है। पद 6 उस पूरी सामाजिक व्यवस्था का शिखर है, और अगला पद उसे गिरा देता है।
चिंतन
आपके भीतर किस व्यक्ति या स्थिति के बारे में इस समय "निश्चय" शब्द बैठा है, बिना परमेश्वर से पूछे?
अगर परमेश्वर आपका मन देख रहे हैं और आपका बाहरी रूप नहीं, तो यह बात आपको डराती है या राहत देती है, और क्यों?
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1 Samuel 16:6 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
1 शमूएल 16:6 का क्या अर्थ है?
1 शमूएल 16:6 किस विषय में है?
1 शमूएल 16:6 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
1 शमूएल 16:6 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
1 शमूएल 16:6 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
1 Samuel 16 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, धन्यवाद कि शाऊल के कर्मचारियों की तरह आपने मेरे पास भी ऐसे लोग रखे हैं जो मेरी बेचैनी भाँप लेते हैं और चुप नहीं रहते, बल्कि उपाय खोजते हैं। धन्यवाद कि जो आत्मा शाऊल को घबराती थी, वह भी आपके अधिकार से बाहर नहीं थी, और मेरा मन भी आपके हाथ में सुरक्षित है।
दाऊद को भोज में बुलाया तक नहीं गया था। सात भाई पंक्ति में खड़े थे, और सबसे छोटा भेड़ों के पीछे खेत में था। पर परमेश्वर की नज़र वहीं टिकी थी। "उठकर इसका अभिषेक कर, क्योंकि यही है।" जहाँ तुझे कोई गिनती में नहीं लेता, वहाँ भी परमेश्वर तुझे जानता है। क्या तू उसकी बुलाहट सुनने को तैयार है?
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