2 तीमुथियुस 2
पाठ
एक कोठरी, एक जंजीर, और एक बूढ़ा आदमी जो अपने बेटे जैसे शिष्य को लिखवा रहा है: "मेरे पुत्र, तू उस अनुग्रह से जो मसीह यीशु में है, बलवन्त हो जा।" पौलुस तीमुथियुस को तीन चित्र देता है, सिपाही, अखाड़े का पहलवान, और पसीना बहाता किसान, और फिर एक आज्ञा जो सबसे नीचे है: "यीशु मसीह को स्मरण रख।" उसके बाद कलीसिया की गंदी सच्चाई आती है, शब्दों की लड़ाइयाँ, हुमिनयुस और फिलेतुस जैसे नाम, बिखरते विश्वास, और अंत में एक हैरान करने वाली सलाह: विरोधियों से झगड़ो मत, उन्हें नम्रता से समझाओ।
मर्म
ध्यान दीजिए कि पौलुस "मजबूत बन जा" नहीं कहता, बल्कि "उस अनुग्रह से बलवन्त हो जा" कहता है। शक्ति यहाँ चरित्र की उपलब्धि नहीं, किसी और की उदारता से मिली ऊर्जा है। और इसकी नींव पद 13 में खुलती है: "यदि हम विश्वासघाती भी हों तो भी वह विश्वासयोग्य बना रहता है, क्योंकि वह आप अपना इन्कार नहीं कर सकता।" यह वाक्य पाप को हल्का नहीं करता, इसके ठीक पहले इन्कार की गंभीर चेतावनी खड़ी है। पर यह बताता है कि परमेश्वर की विश्वासयोग्यता हमारी हालत पर टिकी नहीं, उनके अपने स्वभाव पर टिकी है। जंजीर में पड़ा आदमी इसी वजह से कह सकता है: मैं कैद हूँ, "परन्तु परमेश्वर का वचन कैद नहीं।"
मुख्य सूत्र
पद 8 में पौलुस पूरी बाइबल को दो कीलों पर टाँग देता है: "दाऊद के वंश से हुआ, और मरे हुओं में से जी उठा।" पहली कील पीछे गड़ी है, उन सदियों की प्रतिज्ञाओं में जो एक राजा की बाट जोहती रहीं। दूसरी कील आगे गड़ी है, उस नई सृष्टि में जो खाली कब्र से शुरू हुई। बीच में वह गीत है जो शायद बपतिस्मा के समय गाया जाता था: उसके साथ मरना, उसके साथ जीना, धीरज से सहना, उसके साथ राज्य करना। यही परमेश्वर की कहानी का ढाँचा है, दुःख पहले, महिमा बाद में, और तीमुथियुस को बताया जा रहा है कि उसका अपना थका हुआ जीवन इसी ढाँचे में फिट बैठता है।
दर्पण
पद 14 और 23 आज भी चुभते हैं। "शब्दों पर तर्क-वितर्क न किया करें, जिनसे कुछ लाभ नहीं होता।" सोचिए उस व्हाट्सएप ग्रुप की बहस के बारे में जिसमें आप कल रात तक उलझे रहे, या कलीसिया की उस समिति की मीटिंग के बारे में जहाँ असली मुद्दा सिद्धांत नहीं, यह था कि किसकी बात ऊपर रहेगी। पौलुस कहता है ऐसी बहसों से "सुननेवाले बिगड़ जाते हैं।" जो लोग किनारे बैठे देख रहे हैं, आपके बच्चे, नए विश्वासी, वे तर्क नहीं, तेवर याद रखते हैं। और उलटा आदेश आता है: "कोमल और शिक्षा में निपुण, और सहनशील।" विरोधी को हराना नहीं, उसे मन फिराव तक पहुँचाना लक्ष्य है। आज एक काम कीजिए: पद 2 के अनुसार एक व्यक्ति का नाम लिखिए जिसे आप वह सौंपना चाहते हैं जो आपने सीखा है, और अभी उसे संदेश भेजिए कि क्या हम हर हफ्ते साथ बाइबल पढ़ सकते हैं।
श्रोता-परिचय
तीमुथियुस इफिसुस में है, जवान है, और उसका गुरु रोम में एक "कुकर्मी के समान" कैद है। उस समाज में किसी कैदी से जुड़े रहना अपनी इज्जत दाँव पर लगाना था; लोग पूछते होंगे, तुम्हारा वह प्रेरित कहाँ है? जेल में। तीन चित्र उसके रोज के जीवन से उठाए गए हैं: रोमी सिपाही जो नागरिक कारोबार में नहीं उलझ सकता था, अखाड़े का खिलाड़ी जिसे नियम तोड़ने पर मुकुट नहीं मिलता था, और किसान जो फसल के पहले हिस्से का हकदार था। और पद 20 का "बड़े घर" उन्हें तुरंत किसी धनी संरक्षक की हवेली की याद दिलाता, जहाँ सोने के बर्तन मेहमानों के सामने आते थे और मिट्टी के बर्तन कूड़े के लिए।
अन्तर्पाठ
पद 19 की मुहर पर दो पंक्तियाँ खुदी हैं, और पहली गिनती 16 से आती है, जहाँ कोरह की बगावत के बीच मूसा कहता है कि प्रभु दिखा देंगे कि उनका कौन है। तीमुथियुस की कलीसिया में भी फूट है, हुमिनयुस और फिलेतुस पुनरुत्थान को बीत चुका बता रहे हैं, और लोग गिन नहीं पा रहे कि असली कौन है। पौलुस कहता है: गिनना तुम्हारा काम नहीं, "प्रभु अपनों को पहचानता है।" पर दूसरी पंक्ति तुरंत जिम्मेदारी लौटा देती है, नाम लेने वाला अधर्म से बचा रहे। और पाद-टिप्पणी में दिया 1 थिस्सलुनीकियों 5:24 वही स्वर दोहराता है: बुलाने वाला विश्वासयोग्य है, वही पूरा भी करेंगे।
एक बारीकी
पद 15 में जिसे "सत्य के वचन को ठीक रीति से काम में लाता हो" कहा गया है, उसके पीछे यूनानी क्रिया है ὀρθοτομέω, जिसका शाब्दिक अर्थ है "सीधा काटना।" यह किसान के हल की सीधी रेखा हो सकती है, या पत्थर तराशने वाले की सीधी कटाई, या सड़क बनाने वाले का सीधा रास्ता। तीनों में एक ही बात है: टेढ़ा काटा तो चीज बेकार। वचन को सही तरह से सँभालना कोई अकादमिक कौशल नहीं, यह मजदूरी है, और इसका उलटा पद 16 की "अशुद्ध बकवाद" है जो सड़े घाव की तरह फैलती है। सीधी रेखा और सड़ता घाव, दोनों के बीच हर शिक्षक हर रविवार खड़ा होता है।
चिंतन
पिछले महीने की कौन सी बहस मैंने "सत्य के लिए" लड़ी, पर जिसका असली नतीजा यह था कि सुननेवाले बिगड़ गए?
अगर परमेश्वर की विश्वासयोग्यता मेरी हालत पर नहीं, उनके अपने स्वभाव पर टिकी है, तो मेरे भीतर का कौन सा डर आज बेबुनियाद हो जाता है?
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2 Timothy 2 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
2 तीमुथियुस 2 का क्या अर्थ है?
2 तीमुथियुस 2 किस विषय में है?
2 तीमुथियुस 2 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
2 तीमुथियुस 2 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
2 तीमुथियुस 2 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
2 Timothy 2 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पौलुस जंजीरों में बैठकर यह लिखता है: "यह बात सच है कि यदि हम उसके साथ मर गए हैं, तो उसके साथ जीएँगे भी।" कैदखाने से निकली यह पंक्ति किसी सुखी दिन का नारा नहीं, मरते हुए विश्वास की गवाही है। जो तू आज अपने भीतर मरता हुआ महसूस कर रहा है, वह अंत नहीं है। मसीह के साथ गड़ा हर दुख उसी के साथ जी उठने का वादा लिए हुए है।
पिता, किसान की तरह मुझे भी धीरज से मेहनत करना सिखा। जब फल दिखाई नहीं देता, तब भी मैं हाथ न छोड़ूँ। मेरे छोटे से परिश्रम को आशीष दे, और सही समय पर आने वाली फसल पर भरोसा रखने का मन दे।
पिता, धन्यवाद कि मेरा धीरज व्यर्थ नहीं जाता। तूने कहा है, "यदि हम धीरज से सहते रहेंगे, तो उसके साथ राज्य भी करेंगे।" जो बोझ आज भारी लगता है, उसमें तू मुझे थामे हुए है। धन्यवाद कि तेरे साथ राज्य करने की आशा मेरे हर आँसू को अर्थ देती है।
कोई भी योद्धा जब लड़ाई पर जाता है तो अपने आपको संसार के कामों में नहीं फँसाता, ताकि वह अपने भर्ती करनेवाले को प्रसन्न करे।" ध्यान दे, पौलुस कामों को बुरा नहीं कहता, वह खुद तम्बू बनाता था। बात फँसने की है। एक सैनिक जिसके पैर रस्सियों में उलझे हों, वह बुलावे पर दौड़ नहीं सकता। आज खुद से पूछ: मुझे कौन सी चीज़ ने उलझा रखा है, और मैं असल में किसे खुश करना चाहता हूँ?
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