बाइबल व्याख्या

2 कुरिन्थियों 12:2

बाइबल

पाठ

पौलुस एक असामान्य अनुभव की बात करता है, पर वह उसे तीसरे व्यक्ति में कहता है: "मैं मसीह में एक मनुष्य को जानता हूँ।" चौदह वर्ष पहले वह मनुष्य तीसरे स्वर्ग तक उठा लिया गया। देह के साथ या देह के बिना, यह वह स्वयं नहीं जानता; केवल परमेश्वर जानता है। यह एक ऐसा अनुभव है जिसे शब्दों में ठीक-ठीक बाँधना असंभव है, और पौलुस इसे बाँधने का प्रयास भी नहीं करता।

मर्म

यह पद प्रकाशन के धर्मशास्त्र के केंद्र में खड़ा है। परमेश्वर स्वयं को दिखाते हैं, पर मनुष्य उस दर्शन का स्वामी नहीं बनता। पौलुस के पास दिखाने को एक ऐसा अनुभव है जिस पर कुरिन्थ के "बड़े प्रेरित" चकित रह जाते, फिर भी वह उसे अपने नाम से नहीं जोड़ता। यह विनम्रता का दिखावा नहीं, धर्मशास्त्रीय समझ है: जो कुछ अनुग्रह से मिला है, उसे घमण्ड की पूँजी नहीं बनाया जा सकता। परमेश्वर का प्रकाशन मनुष्य को ऊपर उठाता है, पर मनुष्य को छोटा भी करता है। जहाँ स्वर्ग खुलता है, वहाँ "मैं" पीछे हट जाता है। यही सच्चे आत्मिक अनुभव की पहचान है, वह अपने पात्र को बड़ा नहीं करता, प्रभु को बड़ा करता है।

सामान्य सूत्र

बाइबल में स्वर्ग तक उठाए जाने की कहानियाँ बिरली हैं, पर वे एक पैटर्न बनाती हैं। हनोक, एलिय्याह, यशायाह के मन्दिर-दर्शन, यहेजकेल का रथ, दानिय्येल के स्वप्न, और यूहन्ना का पतमुस पर उठाया जाना, सब में एक ही बात दोहराई जाती है: परमेश्वर पर्दा उठाते हैं, पर मनुष्य को उस पर्दे के पार का स्वामित्व नहीं देते। पौलुस इस लम्बी परम्परा में खड़ा है, पर एक अंतर के साथ, वह "मसीह में" उठाया गया। पुराने नियम के भविष्यद्वक्ता परमेश्वर की उपस्थिति में लाए जाते थे; पौलुस मसीह के द्वारा लाया जाता है। यही नई वाचा का विशेष चिन्ह है: स्वर्ग तक पहुँच अब किसी विशेष सन्त की उपलब्धि नहीं, मसीह में होने का फल है।

दर्पण

हम अपने आत्मिक अनुभवों के साथ क्या करते हैं? वह प्रार्थना जिसमें परमेश्वर बहुत निकट लगे, वह उपदेश जो हृदय को चीर गया, वह क्षण जब कोई निर्णय स्पष्ट हुआ, हम इन्हें कितनी जल्दी अपनी पहचान का हिस्सा बना लेते हैं। "मुझे परमेश्वर ने यह दिखाया।" "मेरी प्रार्थना में यह हुआ।" पौलुस चौदह वर्ष चुप रहा। चौदह वर्ष। और जब बोला, तब भी तीसरे व्यक्ति में। यह हमारे युग को, जहाँ हर अनुभव तुरन्त सोशल मीडिया पर आ जाता है, बहुत खटकता है। कार्यस्थल पर, परिवार में, कलीसिया के छोटे समूह में, हम अपनी आत्मिकता को दिखाने के कितने अवसर ढूँढते हैं। आज एक काम कीजिए: अपने जीवन का एक ऐसा आत्मिक अनुभव याद कीजिए जिसे आप अक्सर दूसरों को सुनाते हैं, और उसे कागज़ पर लिखकर, अकेले में परमेश्वर को धन्यवाद देकर, आज किसी से न कहें।

विवरण

"न जाने देहसहित, न जाने देहरहित, परमेश्वर जानता है।" यह छोटा वाक्यांश पूरे पद का हृदय है। पौलुस के पास शब्द नहीं हैं, और वह शब्द गढ़ने का प्रयास भी नहीं करता। वह अपनी अज्ञानता को स्वीकार करता है और उसे परमेश्वर के ज्ञान पर छोड़ देता है। यह वह क्षण है जहाँ धर्मशास्त्र मौन में बदल जाता है। बहुत से आधुनिक आत्मिक विवरण ठीक इसी बिन्दु पर लड़खड़ाते हैं, वे बहुत अधिक जानते हैं, बहुत विस्तार से बताते हैं। पौलुस, जिसने वास्तव में कुछ देखा, कम कहता है। जो सचमुच स्वर्ग तक गया है, वह लौटकर नक्शा नहीं बेचता। यह विवरण हमें सिखाता है कि सच्चा अनुभव अक्सर अपनी सीमाओं के प्रति ईमानदार होता है।

अन्तर्पाठ

यशायाह 6 में भविष्यद्वक्ता मन्दिर में प्रभु को देखता है और तुरन्त कहता है, "हाय! मैं नाश हुआ।" दर्शन उसे उठाता नहीं, गिराता है, और फिर शुद्ध करके भेजता है। इसके विपरीत, कुरिन्थ के झूठे प्रेरित अपने दर्शनों से स्वयं को ऊँचा उठाते थे। पौलुस यशायाह की परम्परा में है: दर्शन के बाद वह अपनी दुर्बलताओं की चर्चा करता है (पद 9-10)। दूसरा प्रतिध्वनि: "यदि कोई मसीह में है, तो वह नई सृष्टि है" (2 कुरिन्थियों 5:17)। "मसीह में एक मनुष्य", पौलुस अपने आप को अपने पुराने नाम से नहीं, अपनी नई पहचान से पहचानता है। स्वर्ग तक वही जाता है जो मसीह में है, न कि वह जो अपने बल पर चढ़ता है।

प्रोफ़ाइल

कुरिन्थ की कलीसिया एक ऐसे शहर में थी जहाँ आत्मिक अनुभव बिकते थे। रहस्यमय पंथ, दर्शन, परमानन्द, ये सब बाज़ार में उपलब्ध थे। "बड़े प्रेरित" जो पौलुस के विरुद्ध खड़े थे, संभवतः अपने असाधारण अनुभवों की डींगें मारते थे, और कुरिन्थ के विश्वासी इस पर मुग्ध होते थे। पौलुस के पास वास्तव में इनसे कहीं बड़ा अनुभव था, तीसरा स्वर्ग, पर वह इसे हथियार की तरह नहीं उठाता। वह इसे इतनी विनम्रता से रखता है कि पहले सुनने वाले चौंक गए होंगे: "यह तो पौलुस स्वयं है!" इस संस्कृति में, जहाँ आत्मिक अनुभव प्रतिष्ठा की मुद्रा थी, पौलुस उस मुद्रा को चलने से इनकार करता है। वह क्रूस के प्रेरित हैं, स्वर्ग-पर्यटक नहीं।

चिन्तन

क्या आपके सबसे गहरे आत्मिक अनुभव आपको मसीह की ओर छोटा करते हैं, या आपको दूसरों की दृष्टि में बड़ा करते हैं?

पौलुस चौदह वर्ष चुप रहा। आपके जीवन में कौन-सा अनुभव है जिसे परमेश्वर के साथ अभी और थोड़ी देर मौन में रखना अच्छा होगा?

2 Corinthians में और गहराई से जानें

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The Message of 2 Corinthians

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Power in weakness: Paul's most personal letter carefully unpacked.

Paul For Everyone: 2 Corinthians

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Short readings on ministry, suffering and generous grace.

2 Corinthians: An Introduction and Commentary

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2 Corinthians

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2 Corinthians 12:2 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

2 कुरिन्थियों 12:2 का क्या अर्थ है?
पौलुस एक असामान्य अनुभव की बात करता है, पर वह उसे तीसरे व्यक्ति में कहता है: "मैं मसीह में एक मनुष्य को जानता हूँ।" चौदह वर्ष पहले वह मनुष्य तीसरे स्वर्ग तक उठा लिया गया। देह के साथ या देह के बिना, यह वह स्वयं नहीं जानता; केवल परमेश्वर जानता है। यह एक ऐसा अनुभव है जिसे शब्दों में ठीक-ठीक बाँधना असंभव है, और पौलुस इसे बाँधने का प्रयास भी नहीं करता।
2 कुरिन्थियों 12:2 किस विषय में है?
बाइबल में स्वर्ग तक उठाए जाने की कहानियाँ बिरली हैं, पर वे एक पैटर्न बनाती हैं। हनोक, एलिय्याह, यशायाह के मन्दिर-दर्शन, यहेजकेल का रथ, दानिय्येल के स्वप्न, और यूहन्ना का पतमुस पर उठाया जाना, सब में एक ही बात दोहराई जाती है: परमेश्वर पर्दा उठाते हैं, पर मनुष्य को उस पर्दे के पार का स्वामित्व नहीं देते। पौलुस इस लम्बी परम्परा में खड़ा है, पर एक अंतर के साथ, वह "मसीह में" उठाया गया। पुराने नियम के भविष्यद्वक्ता परमेश्वर की उपस्थिति में लाए जाते थे; पौलुस मसीह के द्वारा लाया जाता है। यही नई वाचा का विशेष चिन्ह है: स्वर्ग तक पहुँच अब किसी विशेष सन्त की उपलब्धि नहीं, मसीह में होने का फल है।
2 कुरिन्थियों 12:2 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
"न जाने देहसहित, न जाने देहरहित, परमेश्वर जानता है।" यह छोटा वाक्यांश पूरे पद का हृदय है। पौलुस के पास शब्द नहीं हैं, और वह शब्द गढ़ने का प्रयास भी नहीं करता। वह अपनी अज्ञानता को स्वीकार करता है और उसे परमेश्वर के ज्ञान पर छोड़ देता है। यह वह क्षण है जहाँ धर्मशास्त्र मौन में बदल जाता है। बहुत से आधुनिक आत्मिक विवरण ठीक इसी बिन्दु पर लड़खड़ाते हैं, वे बहुत अधिक जानते हैं, बहुत विस्तार से बताते हैं। पौलुस, जिसने वास्तव में कुछ देखा, कम कहता है। जो सचमुच स्वर्ग तक गया है, वह लौटकर नक्शा नहीं बेचता। यह विवरण हमें सिखाता है कि सच्चा अनुभव अक्सर अपनी सीमाओं के प्रति ईमानदार होता है।
2 कुरिन्थियों 12:2 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
कुरिन्थ की कलीसिया एक ऐसे शहर में थी जहाँ आत्मिक अनुभव बिकते थे। रहस्यमय पंथ, दर्शन, परमानन्द, ये सब बाज़ार में उपलब्ध थे। "बड़े प्रेरित" जो पौलुस के विरुद्ध खड़े थे, संभवतः अपने असाधारण अनुभवों की डींगें मारते थे, और कुरिन्थ के विश्वासी इस पर मुग्ध होते थे। पौलुस के पास वास्तव में इनसे कहीं बड़ा अनुभव था, तीसरा स्वर्ग, पर वह इसे हथियार की तरह नहीं उठाता। वह इसे इतनी विनम्रता से रखता है कि पहले सुनने वाले च
2 कुरिन्थियों 12:2 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
पौलुस चौदह वर्ष चुप रहा। आपके जीवन में कौन-सा अनुभव है जिसे परमेश्वर के साथ अभी और थोड़ी देर मौन में रखना अच्छा होगा?
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2 Corinthians 12 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 15

पौलुस उन लोगों से यह कह रहा है जिन्होंने उसकी नीयत पर शक किया था: "मैं तुम्हारी आत्माओं के लिये बहुत आनन्द से खर्च करूँगा, वरन् आप भी खर्च हो जाऊँगा।" खर्च करना यानी अपना देना, खर्च हो जाना यानी खुद ही चुक जाना। और वह यह कम प्रेम पाकर भी करता रहा। सोचो, क्या तुम किसी को तब भी प्रेम दे पाओगे जब बदले में कुछ न लौटे?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 12

पौलुस अपनी प्रेरिताई का प्रमाण देते हुए पहले चमत्कारों की सूची नहीं गिनाता। वह कहता है, "प्रेरित के लक्षण भी तुम्हारे बीच में सब प्रकार के धीरज सहित, चिह्नों, और अद्भुत कामों, और सामर्थ्य के कामों के द्वारा दिखाए गए।" सबसे पहले धीरज। जिन लोगों ने उसे ठुकराया, उन्हीं के बीच टिके रहना ही उसका सबसे बड़ा चिह्न था। आज तुम्हारी गवाही शायद किसी अचरज में नहीं, उस जगह पर डटे रहने में छिपी है जहाँ से भागने का मन करता है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 5

पौलुस के पास स्वर्ग तक पहुँचने का अनुभव था, फिर भी वह उसके बारे में ऐसे बोलता है जैसे किसी और की बात हो। अपने लिए वह बस यही रखता है: "केवल अपनी निर्बलताओं के विषय में घमण्ड करूँगा।" सोचो, तुम अपनी पहचान किससे बनाते हो? अपने सबसे ऊँचे आध्यात्मिक पल से, या उस जगह से जहाँ तुम्हें मसीह की ज़रूरत है?

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