बाइबल व्याख्या

2 कुरिन्थियों 13:5

बाइबल
यह वचन Evangelical Church of India द्वारा समर्पित है

पाठ

पौलुस पूरे पत्र में अपनी प्रेरिताई का बचाव करता रहा है, और अब, ठीक अंत में, वह तराजू पलट देता है। कुरिन्थ के लोग उसे जाँच रहे थे, उससे प्रमाण माँग रहे थे कि मसीह सचमुच उसमें बोलता है; पौलुस कहता है: "अपने आपको परखो, कि विश्वास में हो कि नहीं; अपने आपको जाँचो।" जाँच का विषय अब वह नहीं, वे हैं। और फिर वह एक ऐसा प्रश्न रखता है जो लगभग चुभता है: "क्या तुम अपने विषय में यह नहीं जानते, कि यीशु मसीह तुम में है? नहीं तो तुम निकम्मे निकले हो।" दो वाक्य, और सारा मुकदमा उलट गया।

मूल बात

यहाँ जो शब्द "निकम्मे" अनुवाद हुआ है, वह यूनानी में अदोकिमोस है, यानी वह धातु जो परख की भट्ठी में खरी नहीं उतरी, सिक्का जो चलन से बाहर कर दिया गया। पौलुस धर्मशास्त्र की कोई गुत्थी नहीं सुलझा रहा; वह पूछ रहा है कि तुम्हारे जीवन में असल में कौन रहता है। और ध्यान दीजिए, कसौटी न तुम्हारा अनुभव है, न तुम्हारी वाक्पटुता, न वे आत्मिक प्रदर्शन जिन पर कुरिन्थ की कलीसिया मुग्ध थी। कसौटी एक ही है: यीशु मसीह तुम में है या नहीं। यह अनुग्रह की बात है, क्योंकि मसीह का बसना हमारी कमाई नहीं; और यही बात धारदार भी है, क्योंकि जो भीतर रहता है वह बाहर दिखता है, पैसे के हिसाब में, शत्रु के प्रति भाषा में, देह के साथ बरताव में। विश्वास ऐसी चीज़ नहीं जिसे कोई मान ले और भूल जाए; वह ऐसी चीज़ है जिसकी जाँच हो सकती है।

सूत्र

पौलुस की कसौटी अचानक आसमान से नहीं गिरी। ठीक एक पद पहले वह क्रूस की ओर इशारा करता है: "वह निर्बलता के कारण क्रूस पर चढ़ाया तो गया, फिर भी परमेश्वर की सामर्थ्य से जीवित है।" यही वह नमूना है जिससे सब कुछ नापा जाता है। परमेश्वर की पूरी कहानी इसी दिशा में बहती है: वे अपने लोगों के बीच बसना चाहते हैं, पहले तम्बू में, फिर मन्दिर में, और अन्त में मसीह के द्वारा मनुष्यों के भीतर। इसलिए पौलुस का प्रश्न पुराने नियम की उस लम्बी लालसा का उत्तर है, कि परमेश्वर केवल हमारे ऊपर नहीं, हमारे अन्दर हों। पर वह वास कोई गर्म अनुभूति नहीं; वह क्रूस के आकार का है। जहाँ मसीह भीतर रहते हैं, वहाँ जीवन निर्बलता से होकर सामर्थ्य की ओर जाता है, उलटा नहीं।

दर्पण

आत्म-परीक्षा का सबसे बड़ा खतरा यह है कि हम उसे भावनाओं की जाँच बना देते हैं: क्या मुझे प्रार्थना में कुछ महसूस हुआ? पौलुस वहाँ नहीं देख रहा। वह जीवन के ठोस कोनों में देख रहा है। आपके दफ्तर में वह सहकर्मी जिसका श्रेय आपने चुपचाप ले लिया, वह हिसाब जिसमें आपने थोड़ी-सी सच्चाई घटाई, वह रिश्तेदार जिसका नाम सुनते ही आपके भीतर कुछ कड़ा हो जाता है, वह देह जिसे आप या तो पूजते हैं या लापरवाही से चलाते हैं। इन जगहों पर पूछिए कि यहाँ कौन रहता है। और साथ ही यह भी सुनिए: पौलुस डराने के लिए नहीं, बनाने के लिए लिखता है, "बिगाड़ने के लिये नहीं पर बनाने के लिये।" जाँच सज़ा नहीं, मरम्मत है।

आज दस मिनट निकालिए, अपने फोन पर पिछले हफ़्ते के अपने आखिरी बीस संदेश खोलिए, और उन्हें पढ़ते हुए ज़ोर से एक ही प्रश्न पूछिए: "इनमें से किस संदेश से दिखता है कि मसीह मुझ में हैं?"

प्रश्न

पर क्या यह प्रश्न विश्वासी को अनन्त संदेह में नहीं डाल देता? अगर मैं अपने आप को परखूँ और परिणाम धुंधला निकले, तो? यहाँ ईमानदार रहना ज़रूरी है: पौलुस कोई आश्वासन की गोली नहीं देता। वह मानता है कि कुछ लोग परख में खरे नहीं उतरेंगे। फिर भी ध्यान दीजिए कि वह किस लहज़े में बोलता है, "पर मेरी आशा है, कि तुम जान लोगे।" वह अपेक्षा रखता है कि उत्तर हाँ होगा। जो व्यक्ति इस प्रश्न से सचमुच काँपता है, वह प्रायः वही होता है जिसमें मसीह रहते हैं; निकम्मा वह होता है जिसे प्रश्न ही बेमानी लगता है। पर इसे नियम बनाकर हर बेचैनी को शान्त कर देना भी बेईमानी होगी। कुछ बेचैनी परमेश्वर की ओर से आती है, और उसका काम हमें लौटाना है।

अन्तर्पाठ

पहले पत्र में पौलुस प्रभु-भोज से पहले यही क्रिया माँगता है: मनुष्य अपने आप को जाँच ले, तब रोटी खाए। वहाँ जाँच का सन्दर्भ मेज़ है, यहाँ पूरी कलीसिया का जीवन; दोनों जगह जाँच का उद्देश्य बहिष्कार नहीं, बल्कि सही ढंग से भाग लेना है। और गलातियों में पौलुस अपने विषय में जो कहता है, कि अब वह नहीं, मसीह उसमें जीते हैं, वही यहाँ वह कुरिन्थियों से पूछता है। यानी यह कोई असाधारण संतों का स्तर नहीं, यह हर विश्वासी की सामान्य स्थिति है। इसी से पौलुस का अजीब सा वाक्य समझ आता है कि वह अपने निकम्मे ठहरने तक की कीमत चुकाने को तैयार है, बशर्ते कुरिन्थ के लोग भलाई करें।

पृष्ठभूमि

कुरिन्थ की कलीसिया प्रभावशाली वक्ताओं की दीवानी थी। जो प्रेरित मार खाया हुआ, बीमार, सादा बोलने वाला हो, वह उन्हें कमज़ोर लगता था; उन्होंने पौलुस को कठघरे में खड़ा किया था और "प्रमाण" माँगा था। उस संस्कृति में सार्वजनिक बहस में साख ही सब कुछ थी, और हारना सामाजिक मृत्यु थी। इसी माहौल में पौलुस अपनी सफाई देने के बजाय अदालत की कुर्सी उनकी ओर घुमा देता है। उन्होंने यह सुना होगा जैसे किसी मुकदमे में अभियुक्त अचानक न्यायाधीश से पूछ बैठे कि आपके अपने कागज़ कहाँ हैं। और यह कोई चालाकी नहीं थी: पौलुस के लिए असली प्रश्न कभी उसकी प्रतिष्ठा नहीं था, बल्कि यह कि मसीह इस समुदाय में जीवित हैं या नहीं।

चिंतन

आपके जीवन का कौन सा एक क्षेत्र है जिसे आप जाँच से सबसे ज़्यादा बचाकर रखते हैं, और क्यों?

अगर कोई आपको एक हफ़्ते तक चुपचाप देखे, तो वह किस बात से अनुमान लगाएगा कि मसीह आप में रहते हैं?

2 Corinthians में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

The Message of 2 Corinthians

Paul Barnett

Power in weakness: Paul's most personal letter carefully unpacked.

Paul For Everyone: 2 Corinthians

N.T. Wright

Short readings on ministry, suffering and generous grace.

2 Corinthians: An Introduction and Commentary

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2 Corinthians

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2 Corinthians 13:5 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

2 कुरिन्थियों 13:5 का क्या अर्थ है?
पौलुस पूरे पत्र में अपनी प्रेरिताई का बचाव करता रहा है, और अब, ठीक अंत में, वह तराजू पलट देता है। कुरिन्थ के लोग उसे जाँच रहे थे, उससे प्रमाण माँग रहे थे कि मसीह सचमुच उसमें बोलता है; पौलुस कहता है: "अपने आपको परखो, कि विश्वास में हो कि नहीं; अपने आपको जाँचो।" जाँच का विषय अब वह नहीं, वे हैं। और फिर वह एक ऐसा प्रश्न रखता है जो लगभग चुभता है: "क्या तुम अपने विषय में यह नहीं जानते, कि यीशु मसीह तुम में ह
2 कुरिन्थियों 13:5 किस विषय में है?
पौलुस की कसौटी अचानक आसमान से नहीं गिरी। ठीक एक पद पहले वह क्रूस की ओर इशारा करता है: "वह निर्बलता के कारण क्रूस पर चढ़ाया तो गया, फिर भी परमेश्वर की सामर्थ्य से जीवित है।" यही वह नमूना है जिससे सब कुछ नापा जाता है। परमेश्वर की पूरी कहानी इसी दिशा में बहती है: वे अपने लोगों के बीच बसना चाहते हैं, पहले तम्बू में, फिर मन्दिर में, और अन्त में मसीह के द्वारा मनुष्यों के भीतर। इसलिए पौलुस का प्रश्न पुराने नियम की उस लम्बी लालसा का उत्तर है, कि परमेश्वर केवल हमारे ऊपर नहीं, हमारे अन्दर हों। पर वह वास कोई गर्म अनुभूति नहीं; वह क्रूस के आकार का है। जहाँ मसीह भीतर रहते हैं, वहाँ जीवन निर्बलता से होकर सामर्थ्य की ओर जाता है, उलटा नहीं।
2 कुरिन्थियों 13:5 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
आज दस मिनट निकालिए, अपने फोन पर पिछले हफ़्ते के अपने आखिरी बीस संदेश खोलिए, और उन्हें पढ़ते हुए ज़ोर से एक ही प्रश्न पूछिए: "इनमें से किस संदेश से दिखता है कि मसीह मुझ में हैं?"
2 कुरिन्थियों 13:5 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
पहले पत्र में पौलुस प्रभु-भोज से पहले यही क्रिया माँगता है: मनुष्य अपने आप को जाँच ले, तब रोटी खाए। वहाँ जाँच का सन्दर्भ मेज़ है, यहाँ पूरी कलीसिया का जीवन; दोनों जगह जाँच का उद्देश्य बहिष्कार नहीं, बल्कि सही ढंग से भाग लेना है। और गलातियों में पौलुस अपने विषय में जो कहता है, कि अब वह नहीं, मसीह उसमें जीते हैं, वही यहाँ वह कुरिन्थियों से पूछता है। यानी यह कोई असाधारण संतों का स्तर नहीं, यह हर विश्वासी की सामान्य स्थिति है। इसी से पौलुस का अजीब सा वाक्य समझ आता है कि वह अपने निकम्मे ठहरने तक की कीमत चुकाने को तैयार है, बशर्ते कुरिन्थ के लोग भलाई करें।
2 कुरिन्थियों 13:5 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
आपके जीवन का कौन सा एक क्षेत्र है जिसे आप जाँच से सबसे ज़्यादा बचाकर रखते हैं, और क्यों?
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2 Corinthians 13 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 9

पिता, मेरी कमज़ोरी मुझे शर्मिंदा करती है, पर आप उसी में काम करते हैं। मुझे ऐसा दिल दीजिए जो दूसरों के मज़बूत होने पर सच में खुश हो, भले मैं पीछे रह जाऊँ। मेरे अपनों को थामे रखिए और उन्हें पूरा कीजिए, और मुझे भी धीरे धीरे बनाते जाइए।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 2

पौलुस धमकी देने से पहले चेतावनी देता है, और चेतावनी भी पहले से, दूर से, पत्र में: "यदि मैं फिर आऊँगा, तो नहीं छोड़ूँगा।" यह कठोरता नहीं, यह प्यार का समय देना है। वह चाहता है कि जब वह पहुँचे, तब कुछ कहने को बचे ही नहीं। परमेश्वर भी तुझे यूँ ही अचानक नहीं पकड़ता। जो बात तेरे मन में अभी खटक रही है, वही उसकी आवाज़ है। अभी वक़्त है।

धन्यवाद संपादकीय पर पद 5

धन्यवाद पिता, कि आपने हमें अपने आप को जाँचने का साहस और अवसर दिया है। और इससे भी बड़ी बात यह कि जाँच के बाद हम यह पाते हैं कि यीशु मसीह हम में है। आपकी उपस्थिति हमारे भीतर कोई कल्पना नहीं, बल्कि हमारे विश्वास की सच्ची नींव है। इसके लिए हमारा हृदय आभारी है।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 1

पिता, तू सच्चाई को हल्के में नहीं लेता। जहाँ मैं बहाने बनाता हूँ, वहाँ मुझे ठहरने और सुनने की हिम्मत दे। मेरे आसपास ऐसे लोग रख जो प्यार से मुझे सच कहें, और मुझे उनकी बात मानने का नम्र मन दे। मेरी बातें और मेरा जीवन एक जैसे हों।

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