बाइबल व्याख्या

2 कुरिन्थियों 13

बाइबल
यह अध्याय JL Group के सहयोग से संभव हुआ है

पाठ

पौलुस तीसरी बार कुरिन्थ आने की तैयारी में है, और वह पहले से चेतावनी दे देता है: इस बार वह किसी को छोड़ेगा नहीं। जो लोग उससे प्रमाण मांगते थे कि मसीह उसमें बोलता है, उन्हें वह उलटा आईना थमा देता है, "अपने आपको परखो, कि विश्वास में हो कि नहीं।" फिर तीखापन अचानक नरम हो जाता है: आनन्दित रहो, सिद्ध बनते जाओ, मेल से रहो, और अन्त में वह तीन गुना आशीष जिसे कलीसिया आज तक दोहराती है।

मर्म

यह अध्याय एक अजीब उलटाव पर टिका है। कुरिन्थ के लोग सामर्थ्य का प्रमाण चाहते थे, और पौलुस उन्हें क्रूस दिखाता है: "वह निर्बलता के कारण क्रूस पर चढ़ाया तो गया, फिर भी परमेश्वर की सामर्थ्य से जीवित है।" परमेश्वर की सामर्थ्य निर्बलता को हटाती नहीं, उसके भीतर से काम करती है। इसलिए पौलुस का अधिकार भी उसकी दृढ़ता में नहीं, उसके टूटेपन में बसा है।

और यहीं से पद 7 का चौंकाने वाला वाक्य निकलता है: वह प्रार्थना करता है कि वे भलाई करें, "चाहे हम निकम्मे ही ठहरें।" वह अपनी प्रतिष्ठा को दाँव पर लगाने को तैयार है, बस कलीसिया खरी निकले। क्या हम ऐसी प्रार्थना कर पाते हैं, जिसमें हमारा सही साबित होना ज़रूरी न हो?

सूत्र

जब पौलुस व्यवस्थाविवरण 19:15 के "दो या तीन गवाहों" को उठाता है, तो वह पुराने नियम की अदालत को कलीसिया के बीच खींच लाता है। परमेश्वर कभी मनमाने ढंग से न्याय नहीं करते; वे प्रक्रिया, गवाही, धैर्य के साथ चलते हैं। पर अब वह अदालत क्रूस के प्रकाश में खड़ी है।

यही वह सूत्र है जो सारी बाइबल में दौड़ता है: परमेश्वर की शक्ति वहाँ प्रकट होती है जहाँ मनुष्य की शक्ति चुक जाती है। मिस्र में दास, वीराने में भटकते लोग, चरवाहा लड़का, और अन्त में एक कीलों से जड़ा शरीर। अध्याय का अन्तिम आशीर्वाद, अनुग्रह, प्रेम, सहभागिता, इस पूरी कहानी का निचोड़ है: परमेश्वर स्वयं को देते हैं, बाँटकर नहीं, पूरा।

आईना

"अपने आपको परखो" वाक्य को हम अक्सर आत्म-निंदा में बदल देते हैं। पर ध्यान दें, पौलुस जो प्रश्न रखता है वह है, "क्या तुम अपने विषय में यह नहीं जानते, कि यीशु मसीह तुम में है?" यह जाँच किसी नैतिक खाते की गिनती नहीं, उपस्थिति की खोज है। कौन मेरे भीतर बसा है?

यहाँ कई परतें उघड़ती हैं। दफ्तर में, घर में, कलीसिया की बैठक में हम सबसे ज़्यादा ऊर्जा इस पर खर्च करते हैं कि दूसरों को परखें, नेतृत्व को नापें, पति या पत्नी की कमी गिनें। पौलुस कहता है, कैमरा घुमाओ। और यह घुमाना डरावना है, क्योंकि वहाँ कोई तालियाँ नहीं बजतीं।

आज ही दस मिनट निकालकर बैठिए और कागज़ पर एक ही प्रश्न लिखिए, "यीशु मसीह मुझमें कहाँ दिखता है?" जो सच्चाई में सामने आए, उसे लिखकर परमेश्वर के सामने ज़ोर से पढ़ दीजिए।

अन्तर्पाठ

पौलुस के "निर्बलता" वाले तर्क को समझने के लिए दो अध्याय पीछे जाइए: "मेरा अनुग्रह तेरे लिये बहुत है" (2 कुरिन्थियों 12:9)। वहाँ जो व्यक्तिगत काँटा था, यहाँ वह मसीह के क्रूस तक फैल जाता है। पौलुस अपनी निर्बलता को बहाना नहीं, प्रमाण बनाता है।

दूसरी गूँज भजन 139 की है, जहाँ भजनकार परमेश्वर से कहता है कि मुझे जाँचिए, मुझे परखिए। रोचक बात: वहाँ जाँच का अनुरोध परमेश्वर से किया जाता है, यहाँ पौलुस उसे कलीसिया के हाथ में देता है। पर दोनों जगह मंशा एक ही है, सज़ा नहीं, बनना। "जिसे प्रभु ने बिगाड़ने के लिये नहीं पर बनाने के लिये मुझे दिया है।"

मुख्य पात्र

पौलुस इस अध्याय में एक ऐसा व्यक्ति दिखता है जो दो दिशाओं में खिंचा हुआ है। एक ओर वह धमकी देता है, "नहीं छोड़ूँगा।" दूसरी ओर वह तुरन्त जोड़ देता है कि वह चाहता ही नहीं कि आकर कड़ाई करनी पड़े। यह अनिश्चय नहीं, प्रेम की पीड़ा है। जो पिता अपने बच्चे को चेतावनी देता है, वह भी चाहता है कि चेतावनी काफी हो जाए।

और उसका सबसे गहरा वाक्य वही है जो सबसे शान्त है: "जब हम निर्बल हैं, और तुम बलवन्त हो, तो हम आनन्दित होते हैं।" यह उस आदमी की आवाज़ है जिसने अपनी पहचान को अपने प्रभाव से अलग कर लिया है। ऐसा हल्कापन सालों की टूटन के बाद ही आता है।

प्रोफ़ाइल

कुरिन्थ एक बन्दरगाह शहर था, प्रतिस्पर्धा और वक्तृत्व का बाज़ार। वहाँ शिक्षक की परख इससे होती थी कि वह कितना प्रभावशाली बोलता है, कितना आत्मविश्वास दिखाता है। पौलुस इस पैमाने पर हारा हुआ लगता था: बीमार शरीर, साधारण भाषण, हाथ से कमाई।

इसलिए जब उसके विरोधी कहते थे कि उसमें सामर्थ्य का प्रमाण नहीं, तो यह सुनने वालों को तर्कसंगत लगता था। और तब यह पत्र आता है, जो उनके पूरे मूल्यांकन-तन्त्र को उलट देता है। "पवित्र चुम्बन से नमस्कार करो" जैसे साधारण आदेश में भी चोट छिपी है: जिस गुट ने एक दूसरे को नकार दिया था, उन्हें अब आलिंगन करना है। मेल-मिलाप शब्दों में नहीं, शरीर से होना है।

चिन्तन

जब आपने आखिरी बार अपनी निर्बलता को छिपाने के बजाय परमेश्वर के हाथ में सौंपा, तब क्या हुआ था?

यदि आपकी प्रार्थना का उत्तर इस तरह आए कि दूसरा खरा निकले और आप "निकम्मे" ठहरें, तो क्या आप फिर भी वह प्रार्थना करेंगे?

2 Corinthians में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

The Message of 2 Corinthians

Paul Barnett

Power in weakness: Paul's most personal letter carefully unpacked.

Paul For Everyone: 2 Corinthians

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Short readings on ministry, suffering and generous grace.

2 Corinthians: An Introduction and Commentary

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2 Corinthians

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2 Corinthians 13 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

2 कुरिन्थियों 13 का क्या अर्थ है?
पौलुस तीसरी बार कुरिन्थ आने की तैयारी में है, और वह पहले से चेतावनी दे देता है: इस बार वह किसी को छोड़ेगा नहीं। जो लोग उससे प्रमाण मांगते थे कि मसीह उसमें बोलता है, उन्हें वह उलटा आईना थमा देता है, "अपने आपको परखो, कि विश्वास में हो कि नहीं।" फिर तीखापन अचानक नरम हो जाता है: आनन्दित रहो, सिद्ध बनते जाओ, मेल से रहो, और अन्त में वह तीन गुना आशीष जिसे कलीसिया आज तक दोहराती है।
2 कुरिन्थियों 13 किस विषय में है?
जब पौलुस व्यवस्थाविवरण 19:15 के "दो या तीन गवाहों" को उठाता है, तो वह पुराने नियम की अदालत को कलीसिया के बीच खींच लाता है। परमेश्वर कभी मनमाने ढंग से न्याय नहीं करते; वे प्रक्रिया, गवाही, धैर्य के साथ चलते हैं। पर अब वह अदालत क्रूस के प्रकाश में खड़ी है।
2 कुरिन्थियों 13 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
यहाँ कई परतें उघड़ती हैं। दफ्तर में, घर में, कलीसिया की बैठक में हम सबसे ज़्यादा ऊर्जा इस पर खर्च करते हैं कि दूसरों को परखें, नेतृत्व को नापें, पति या पत्नी की कमी गिनें। पौलुस कहता है, कैमरा घुमाओ। और यह घुमाना डरावना है, क्योंकि वहाँ कोई तालियाँ नहीं बजतीं।
2 कुरिन्थियों 13 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
दूसरी गूँज भजन 139 की है, जहाँ भजनकार परमेश्वर से कहता है कि मुझे जाँचिए, मुझे परखिए। रोचक बात: वहाँ जाँच का अनुरोध परमेश्वर से किया जाता है, यहाँ पौलुस उसे कलीसिया के हाथ में देता है। पर दोनों जगह मंशा एक ही है, सज़ा नहीं, बनना। "जिसे प्रभु ने बिगाड़ने के लिये नहीं पर बनाने के लिये मुझे दिया है।"
2 कुरिन्थियों 13 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
कुरिन्थ एक बन्दरगाह शहर था, प्रतिस्पर्धा और वक्तृत्व का बाज़ार। वहाँ शिक्षक की परख इससे होती थी कि वह कितना प्रभावशाली बोलता है, कितना आत्मविश्वास दिखाता है। पौलुस इस पैमाने पर हारा हुआ लगता था: बीमार शरीर, साधारण भाषण, हाथ से कमाई।
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

2 Corinthians 13 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 9

पिता, मेरी कमज़ोरी मुझे शर्मिंदा करती है, पर आप उसी में काम करते हैं। मुझे ऐसा दिल दीजिए जो दूसरों के मज़बूत होने पर सच में खुश हो, भले मैं पीछे रह जाऊँ। मेरे अपनों को थामे रखिए और उन्हें पूरा कीजिए, और मुझे भी धीरे धीरे बनाते जाइए।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 2

पौलुस धमकी देने से पहले चेतावनी देता है, और चेतावनी भी पहले से, दूर से, पत्र में: "यदि मैं फिर आऊँगा, तो नहीं छोड़ूँगा।" यह कठोरता नहीं, यह प्यार का समय देना है। वह चाहता है कि जब वह पहुँचे, तब कुछ कहने को बचे ही नहीं। परमेश्वर भी तुझे यूँ ही अचानक नहीं पकड़ता। जो बात तेरे मन में अभी खटक रही है, वही उसकी आवाज़ है। अभी वक़्त है।

धन्यवाद संपादकीय पर पद 5

धन्यवाद पिता, कि आपने हमें अपने आप को जाँचने का साहस और अवसर दिया है। और इससे भी बड़ी बात यह कि जाँच के बाद हम यह पाते हैं कि यीशु मसीह हम में है। आपकी उपस्थिति हमारे भीतर कोई कल्पना नहीं, बल्कि हमारे विश्वास की सच्ची नींव है। इसके लिए हमारा हृदय आभारी है।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 1

पिता, तू सच्चाई को हल्के में नहीं लेता। जहाँ मैं बहाने बनाता हूँ, वहाँ मुझे ठहरने और सुनने की हिम्मत दे। मेरे आसपास ऐसे लोग रख जो प्यार से मुझे सच कहें, और मुझे उनकी बात मानने का नम्र मन दे। मेरी बातें और मेरा जीवन एक जैसे हों।

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