बाइबल व्याख्या

2 थिस्सलुनीकियों 2

बाइबल
यह अध्याय JL Group के सहयोग से संभव हुआ है

पाठ

पौलुस थिस्सलुनीके की कलीसिया को लिखता है क्योंकि किसी ने उनसे कहा है, चाहे भविष्यद्वाणी के रूप में, चाहे किसी नकली पत्र के सहारे, कि "प्रभु का दिन आ पहुँचा है।" वे हिल गए हैं, घबरा गए हैं। पौलुस कहता है: नहीं, पहले विद्रोह होगा, पहले वह "अधर्मी पुरुष" प्रगट होगा जो परमेश्वर के मन्दिर में बैठकर अपने आपको परमेश्वर ठहराएगा; और उसे प्रभु यीशु "अपने मुँह की फूँक से" मार डालेंगे। फिर वह अचानक स्वर बदलता है: तुम्हारे लिए तो परमेश्वर ने आदि से चुन लिया है, इसलिए स्थिर रहो, थामे रहो, और परमेश्वर स्वयं तुम्हारे मनों में शान्ति दे।

मूल बात

इस अध्याय की धुरी वह वाक्य है जो आसानी से छूट जाता है: "उन्होंने सत्य के प्रेम को ग्रहण नहीं किया।" ध्यान दें, सत्य को जानने की बात नहीं, सत्य से प्रेम करने की बात है। अधर्मी पुरुष चिन्ह और अद्भुत काम लेकर आता है, यानी धोखा उबाऊ नहीं, चमकदार होता है। जो लोग बहक जाते हैं, वे बुद्धिहीन नहीं, बल्कि वे हैं जिन्होंने सच्चाई से प्रेम करने की जगह "अधर्म से प्रसन्न" होना चुना। और तब आता है वह डरावना वाक्य: परमेश्वर स्वयं उनमें "एक भटका देनेवाली सामर्थ्य" भेजते हैं। परमेश्वर का न्याय कभी-कभी यही होता है कि वे मनुष्य को उसके ही चुनाव में सौंप देते हैं। यह पद हमें बताता है कि सत्य के प्रति उदासीनता निर्दोष नहीं होती।

जुड़ा हुआ सूत्र

"परमेश्वर के मन्दिर में बैठकर अपने आपको परमेश्वर प्रगट करता है" यह चित्र नया नहीं है। यह सर्प के उस पहले प्रस्ताव की गूँज है, "तुम परमेश्वर के समान हो जाओगे," और दानिय्येल 11 के उस राजा की जो हर देवता से अपने को बड़ा ठहराता है। पौलुस इसीलिए वहाँ से उधार लेता है: मनुष्य के इतिहास में परमेश्वर की जगह हड़पने की चेष्टा बार-बार सिर उठाती है, और अन्त में वह अपने चरम रूप में प्रगट होगी। परन्तु उसका अन्त कितना छोटा है। कोई युद्ध नहीं, कोई लम्बा संघर्ष नहीं, केवल "अपने मुँह की फूँक"। जो अपने आपको परमेश्वर बनाता है, उसे मिटाने के लिए मसीह को हाथ उठाने की भी आवश्यकता नहीं।

आईना

आप घबराते किस बात से हैं? थिस्सलुनीके के विश्वासी एक अफवाह से हिल गए थे, और आप और मैं भी उससे कुछ अलग नहीं। एक मेडिकल रिपोर्ट, नौकरी में छँटनी की खबर, समाचारों में कोई युद्ध, किसी यूट्यूब वीडियो में अन्तिम दिनों की गिनती, और मन "अचानक अस्थिर" हो जाता है। पौलुस आपकी घबराहट को गोद में नहीं लेता; वह उसे सुधारता है। वह कहता है, तुम्हें याद नहीं, मैं तुमसे कहा करता था? यानी तुम्हारे पास ज्ञान है, तुम केवल उसे थामे नहीं रह रहे। और दूसरा आईना अधिक चुभता है: क्या मैं सत्य से प्रेम करता हूँ, या केवल उस सत्य से जो मेरे लिए सुविधाजनक है? जब कोई बात मेरे पैसे, मेरे गुस्से, मेरी शादी के बारे में सच बोलती है और मैं उससे मुँह फेर लेता हूँ, वहीं धोखे की जड़ बोई जाती है।

पृष्ठभूमि

थिस्सलुनीके रोमी साम्राज्य के एक प्रान्त की राजधानी थी, एक व्यापारिक बन्दरगाह, जहाँ सम्राट की पूजा राजनीतिक वफ़ादारी का हिस्सा थी। "प्रभु" कहना वहाँ खाली शब्द नहीं था; कैसर को प्रभु कहा जाता था। इसीलिए यीशु को प्रभु मानने वाली यह छोटी कलीसिया शुरू से ही दबाव में थी। पौलुस बहुत कम समय उनके बीच रह पाया था, इसलिए उन्हें बहुत कुछ अधूरी शिक्षा और सुनी-सुनाई बातों पर जीना पड़ा। इसी खाली जगह में अफवाहें फैलीं, और कोई पत्र भी घूम रहा था जो पौलुस के नाम से लिखा गया था। एक ऐसा समाज जिसमें एक मनुष्य अपने को दैवीय घोषित कर सकता था, उसके लिए "अधर्मी पुरुष" का चित्र कल्पना नहीं, रोज़ का अनुभव था।

कठिन प्रश्न

पद 11 को नरम करने का कोई ईमानदार तरीका नहीं है: "परमेश्वर उनमें एक भटका देनेवाली सामर्थ्य को भेजेगा ताकि वे झूठ पर विश्वास करें।" परमेश्वर धोखा भेजते हैं? यह हमारी उस छवि से टकराता है जिसमें परमेश्वर केवल मनाते रहते हैं और कभी हार नहीं मानते। पौलुस क्रम स्पष्ट रखता है: पहले मनुष्य सत्य के प्रेम को ठुकराता है, तब परमेश्वर उसे उसके ठुकराने में पक्का कर देते हैं। यह मनमानी नहीं, न्याय है; परन्तु यह भयानक न्याय है, क्योंकि इसमें सज़ा और

2 Thessalonians में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

The Message of Thessalonians

John Stott

Hope, holiness and the return of Christ for a young church.

1 and 2 Thessalonians

Michael Holmes

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2 Thessalonians 2 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

2 थिस्सलुनीकियों 2 का क्या अर्थ है?
पौलुस थिस्सलुनीके की कलीसिया को लिखता है क्योंकि किसी ने उनसे कहा है, चाहे भविष्यद्वाणी के रूप में, चाहे किसी नकली पत्र के सहारे, कि "प्रभु का दिन आ पहुँचा है।" वे हिल गए हैं, घबरा गए हैं। पौलुस कहता है: नहीं, पहले विद्रोह होगा, पहले वह "अधर्मी पुरुष" प्रगट होगा जो परमेश्वर के मन्दिर में बैठकर अपने आपको परमेश्वर ठहराएगा; और उसे प्रभु यीशु "अपने मुँह की फूँक से" मार डालेंगे। फिर वह अचानक स्वर बदलता है: तुम्हारे लिए तो परमेश्वर ने आदि से चुन लिया है, इसलिए स्थिर रहो, थामे रहो, और परमेश्वर स्वयं तुम्हारे मनों में शान्ति दे।
2 थिस्सलुनीकियों 2 किस विषय में है?
इस अध्याय की धुरी वह वाक्य है जो आसानी से छूट जाता है: "उन्होंने सत्य के प्रेम को ग्रहण नहीं किया।" ध्यान दें, सत्य को जानने की बात नहीं, सत्य से प्रेम करने की बात है। अधर्मी पुरुष चिन्ह और अद्भुत काम लेकर आता है, यानी धोखा उबाऊ नहीं, चमकदार होता है। जो लोग बहक जाते हैं, वे बुद्धिहीन नहीं, बल्कि वे हैं जिन्होंने सच्चाई से प्रेम करने की जगह "अधर्म से प्रसन्न" होना चुना। और तब आता है वह डरावना वाक्य: परमेश्वर स्वयं उनमें "एक भटका देनेवाली सामर्थ्य" भेजते हैं। परमेश्वर का न्याय कभी-कभी यही होता है कि वे मनुष्य को उसके ही चुनाव में सौंप देते हैं। यह पद हमें बताता है कि सत्य के प्रति उदासीनता निर्दोष नहीं होती।
2 थिस्सलुनीकियों 2 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
"परमेश्वर के मन्दिर में बैठकर अपने आपको परमेश्वर प्रगट करता है" यह चित्र नया नहीं है। यह सर्प के उस पहले प्रस्ताव की गूँज है, "तुम परमेश्वर के समान हो जाओगे," और दानिय्येल 11 के उस राजा की जो हर देवता से अपने को बड़ा ठहराता है। पौलुस इसीलिए वहाँ से उधार लेता है: मनुष्य के इतिहास में परमेश्वर की जगह हड़पने की चेष्टा बार-बार सिर उठाती है, और अन्त में वह अपने चरम रूप में प्रगट होगी। परन्तु उसका अन्त कितना छोटा है। कोई युद्ध नहीं, कोई लम्बा संघर्ष नहीं, केवल "अपने मुँह की फूँक"। जो अपने आपको परमेश्वर बनाता है, उसे मिटाने के लिए मसीह को हाथ उठाने की भी आवश्यकता नहीं।
2 थिस्सलुनीकियों 2 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
आप घबराते किस बात से हैं? थिस्सलुनीके के विश्वासी एक अफवाह से हिल गए थे, और आप और मैं भी उससे कुछ अलग नहीं। एक मेडिकल रिपोर्ट, नौकरी में छँटनी की खबर, समाचारों में कोई युद्ध, किसी यूट्यूब वीडियो में अन्तिम दिनों की गिनती, और मन "अचानक अस्थिर" हो जाता है। पौलुस आपकी घबराहट को गोद में नहीं लेता; वह उसे सुधारता है। वह कहता है, तुम्हें याद नहीं, मैं तुमसे कहा करता था?
2 थिस्सलुनीकियों 2 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
थिस्सलुनीके रोमी साम्राज्य के एक प्रान्त की राजधानी थी, एक व्यापारिक बन्दरगाह, जहाँ सम्राट की पूजा राजनीतिक वफ़ादारी का हिस्सा थी। "प्रभु" कहना वहाँ खाली शब्द नहीं था; कैसर को प्रभु कहा जाता था। इसीलिए यीशु को प्रभु मानने वाली यह छोटी कलीसिया शुरू से ही दबाव में थी। पौलुस बहुत कम समय उनके बीच रह पाया था, इसलिए उन्हें बहुत कुछ अधूरी शिक्षा और सुनी-सुनाई बातों पर जीना पड़ा। इसी खाली जगह में अफवाहें फैलीं, और कोई पत्र भी घूम रहा था जो पौलुस के नाम से लिखा गया था। एक ऐसा समाज जिसमें एक मनुष्य अपने को दैवीय घोषित कर सकता था, उसके लिए "अधर्मी पुरुष" का चित्र कल्पना नहीं, रोज़ का अनुभव था।
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

2 Thessalonians 2 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

धन्यवाद संपादकीय पर पद 11

पिता, धन्यवाद कि आपने हमें सत्य से प्रेम करने का मन दिया, ताकि हम झूठ पर विश्वास न करें। धन्यवाद कि आपके वचन की ज्योति में हम भटका देनेवाली बातों को पहचान पाते हैं और आपकी सच्चाई में थमे रहते हैं।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 1

पौलुस डाँटता नहीं, विनती करता है: "अब हे भाइयों, हमारे प्रभु यीशु मसीह के आगमन, और उसके पास हमारे इकट्ठे होने के विषय में, हम तुम से विनती करते हैं।" थिस्सलुनीके के लोग अफवाहों से घबरा गए थे। और पौलुस उनके डर को नरमी से थामता है। ध्यान दे, आशा सिर्फ यह नहीं कि मसीह आएगा, बल्कि यह कि हम उसके पास इकट्ठे होंगे। तेरा इंतज़ार किसी घटना का नहीं, एक व्यक्ति का है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 14

जिस पत्र में अधर्मी के आने और लोगों के भटकने की बात है, उसी में पौलुस लिखता है: "इसी लिये उसने तुम्हें हमारे सुसमाचार के द्वारा बुलाया, कि तुम हमारे प्रभु यीशु मसीह की महिमा को प्राप्त करो।" यानी तेरा नाम भ्रम की सूची में नहीं, महिमा की बुलाहट में लिखा गया है। जब चारों ओर सब हिलता दिखे, तब यही याद रख कि तुझे किसने बुलाया और किस लिये बुलाया।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 13

जिन्होंने सत्य से प्रेम करने से इन्कार किया, उनके बारे में लिखने के बाद पौलुस मुड़ता है: "परन्तु हे प्रभु के प्रिय भाइयों..." यही "परन्तु" तुम्हारा ठिकाना है। चारों ओर धोखा फैला हो, फिर भी तुम आदि से चुने गए हो, प्रेम किए गए हो। तुम्हारा विश्वास तुम्हारी पकड़ नहीं, उसकी पकड़ है।

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