दानिय्येल 11
पाठ
दानिय्येल 11 इतिहास की एक लंबी, थकाऊ, खून से सनी सूची है: फारस के राजा, यूनान का पराक्रमी राजा जिसका राज्य उसके वंश को नहीं मिलता, फिर "दक्षिण देश" और "उत्तर देश" के राजाओं की पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलने वाली लड़ाई, विवाह-संधियाँ जो टूट जाती हैं, मेज़ पर बैठकर बोले गए झूठ। बीच में एक "तुच्छ मनुष्य" उठता है जो चिकनी-चुपड़ी बातों से राज्य पाता है, पवित्रस्थान को अपवित्र करता है, नित्य होमबलि बंद कराता है, और अपने आप को सब देवताओं से ऊँचा ठहराता है। और फिर, बिना किसी नाटकीय युद्ध के, एक वाक्य: "उसका अन्त आ जाएगा, और कोई उसका सहायक न रहेगा।"
मर्म
इस अध्याय का धर्मशास्त्रीय केंद्र दो वाक्यांशों की टक्कर में है। एक तरफ बार-बार लौटता है "अपनी इच्छा के अनुसार ही काम किया करेगा" (पद 3, 16, 36)। दूसरी तरफ खड़ा है "जो कुछ निश्चय करके ठना हुआ है वह अवश्य ही पूरा होनेवाला है" (पद 36)। पूरा अध्याय इन दो इच्छाओं के बीच का मुकदमा है। राजा सचमुच अपनी इच्छा चलाते हैं; परमेश्वर उन्हें कठपुतली नहीं बनाते। और फिर भी उनकी इच्छा की एक समय-सीमा है जो उन्होंने तय नहीं की। यह पाठ न तो कहता है कि इतिहास अर्थहीन हिंसा है, न यह कि परमेश्वर हर अत्याचार को तुरंत रोक देते हैं। यह कहता है: अत्याचार का भी एक "नियत समय" होता है, और वह समय परमेश्वर के हाथ में है।
सूत्र
ध्यान दीजिए कि पद 22 में "वाचा का प्रधान" इस बाढ़ में बहकर नाश होता है, और पद 31 में पवित्रस्थान अपवित्र किया जाता है और बलिदान रुक जाता है। मंदिर बचता नहीं; उपासना टूटती है। यही वह घाव है जिसे मसीह अपने शरीर में उठाते हैं। यीशु ने स्वयं इस अध्याय के "उजाड़ करा देनेवाली घृणित वस्तु" का हवाला दिया (मरकुस 13:14), और फिर अपने मंदिर-शरीर को तोड़े जाने की बात कही। दानिय्येल 11 का तर्क मसीह में पूरा होता है: अहंकारी राजा अपना तम्बू पवित्र पर्वत के पास खड़ा करता है और बिना सहायक के मरता है; मसीह उसी पर्वत के बाहर, परित्यक्त होकर, मरते हैं, और वहीं से राज्य शुरू होता है।
दर्पण
"चिकनी-चुपड़ी बातें" इस अध्याय का सबसे असहज शब्द है। राजा तलवार से नहीं, चापलूसी से जीतता है (पद 21), और पद 32 में वह उन्हीं बातों से वाचा तोड़नेवालों को "भक्तिहीन" कर देता है। यानी विश्वास का सबसे बड़ा खतरा दमन नहीं, प्रलोभन है। आपसे कोई यीशु का इनकार नहीं करवाएगा; कोई बस कहेगा कि इस बार चुप रह जाइए, यह सौदा सबके लिए अच्छा है, यह आँकड़ा थोड़ा घुमा दीजिए, यह रिश्ता वैसे भी किसी को दिखेगा नहीं। और आप ना नहीं कहेंगे, क्योंकि आपको हारी हुई तरफ खड़ा दिखना बर्दाश्त नहीं। पद 32 इसका उत्तर देता है: "जो लोग अपने परमेश्वर का ज्ञान रखेंगे, वे हियाव बाँधकर बड़े काम करेंगे।" हियाव ज्ञान से निकलता है, आत्मबल से नहीं।
आज, दस मिनट में: एक कागज़ पर वह एक वाक्य लिखिए जो पिछले महीने किसी ने आपसे मीठे ढंग से कहा और जिसने आपके भीतर समझौते की इच्छा जगाई। उसके नीचे लिखिए: "इतना करने पर भी उसका अन्त आ जाएगा।" फिर कागज़ को वहाँ रखिए जहाँ आप काम करते हैं।
बारीकी
पद 27 पर रुकिए: "वे एक ही मेज पर बैठे हुए आपस में झूठ बोलेंगे, परन्तु इससे कुछ बन न पड़ेगा।" यह पूरे अध्याय का सबसे मानवीय चित्र है। दो सबसे शक्तिशाली आदमी, एक भोजन, और हर वाक्य के पीछे एक छुरी। शांति-वार्ता असल में युद्ध का दूसरा रूप है। और फिर वह ठंडा फैसला: इससे कुछ बन न पड़ेगा। कूटनीति, विवाह-संधियाँ (पद 6, 17), गठबंधन, सब बेकार हो जाते हैं, क्योंकि इनका आधार छल है। यह पाठ हमारी अपनी मेज़ों पर उतरता है: परिवार का वह भोजन जिसमें सब मुस्कुरा रहे हैं और कोई सच नहीं बोल रहा। ऐसी शांति टिकती नहीं, चाहे कितनी सभ्य दिखे।
अन्तर्पाठ
दो जगहें इस अध्याय की गूँज हैं। पहली, मरकुस 13:14, जहाँ यीशु "उजाड़ करा देनेवाली घृणित वस्तु" की बात करते हैं; इसका अर्थ यह कि दानिय्येल की भविष्यवाणी एक बार पूरी होकर खत्म नहीं हुई, बल्कि इतिहास में बार-बार लौटनेवाला एक ढाँचा है। दूसरी, 2 थिस्सलुनीकियों 2, जहाँ पौलुस उस आदमी का वर्णन करते हैं जो अपने आप को परमेश्वर से ऊँचा ठहराता है और "भरमानेवाले" प्रभाव से लोगों को झूठ पर विश्वास दिलाता है, ठीक वही चिकनी-चुपड़ी रणनीति। दोनों मिलकर दिखाते हैं कि दानिय्येल 11 केवल सीरिया के एक पुराने राजा का जीवनचरित नहीं है, बल्कि हर उस सत्ता का नक्शा है जो खुद को अंतिम समझती है।
श्रोता
पहले पाठक निर्वासन के बाद की वह पीढ़ी थी जिसके लिए यह अध्याय समाचार नहीं, स्मृति था। उन्होंने देखा था कि मंदिर में बलिदान रुक गया, कि अपने ही लोगों में से कुछ ने सत्ता के साथ समझौता कर लिया, कि "बुद्धिमान जन" तलवार से छिदे और आग में जले (पद 33)। उनके लिए सबसे चौंकानेवाला यह नहीं था कि दुष्ट राजा आएगा, बल्कि पद 35: कि विश्वासी गिरेंगे "इसलिए गिरने पाएँगे कि जाँचे जाएँ, और निर्मल और उजले किए जाएँ।" उनकी पीड़ा परमेश्वर की अनुपस्थिति का प्रमाण नहीं थी, बल्कि उनकी शुद्धि का साधन। यह सांत्वना नहीं जो दर्द मिटाती है; यह वह सांत्वना है जो दर्द को अर्थ देती है।
चिंतन
किस व्यक्ति या व्यवस्था की "चिकनी-चुपड़ी बातें" आपके भीतर सबसे आसानी से काम करती हैं, और आप उन्हें मीठी क्यों पाते हैं?
यदि आपकी वर्तमान परीक्षा आपको "निर्मल और उजले" करने के लिए है, तो उसमें आपसे क्या हटाया जा रहा है?
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Daniel 11 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
दानिय्येल 11 का क्या अर्थ है?
दानिय्येल 11 किस विषय में है?
दानिय्येल 11 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
दानिय्येल 11 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
दानिय्येल 11 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Daniel 11 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
दक्षिण का राजा हार गया, पर हथियारों की कमी से नहीं। उसके पास "अत्यन्त बड़ी और सामर्थी सेना" थी। वह गिरा इसलिए कि "लोग उसके विरुद्ध कल्पना करेंगे।" अपनों की फुसफुसाहट ने वह कर दिया जो दुश्मन की तलवार न कर सकी। आज भी सबसे गहरा घाव बाहर से नहीं, अपनी मेज़ पर बैठे किसी से आता है। तू किसके भरोसे खड़ा है, अपनी सेना के या परमेश्वर के?
पिता, इस दुनिया में चिकनी चुपड़ी बातों और छल से बहुत कुछ हासिल किया जाता है। मुझे समझ दे कि मैं सच और दिखावे में फर्क पहचान सकूँ। मेरा भरोसा सत्ता के खेल पर नहीं, तुझ पर रहे, क्योंकि हर राज तेरे हाथ में है। मुझे ईमानदार बने रहने का साहस दे।
दुश्मन की योजना में सबसे बड़ी चोट यह थी कि वे "नित्य होमबलि को बन्द करेंगे।" मन्दिर की दीवारें नहीं गिरीं, बस रोज़ की भेंट रुक गई। शैतान आज भी यही करता है। वह तेरा विश्वास एक झटके में नहीं तोड़ता, वह तेरी रोज़ की प्रार्थना को धीरे धीरे छुड़वा देता है। सोच, तेरी वह छोटी सी दैनिक भेंट कब से बन्द पड़ी है?
हे परमेश्वर, जो तेरी बुद्धि से जीते हैं वे दूसरों को राह दिखाते हैं, फिर भी उन्हें दुख उठाना पड़ता है। मुझे भी ऐसा साहस दे कि कीमत चुकानी पड़े तो भी सच्चाई कहने से पीछे न हटूँ। जब डर घेरे, तू मुझे थाम ले।
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