प्रेरितों के काम 22
पाठ
सीढ़ियों पर खड़ा एक ज़ंजीरों में जकड़ा आदमी, नीचे उसे मार डालने पर तुली भीड़, और वह इब्रानी भाषा में बोलना शुरू करता है: "हे भाइयों और पिताओं, मेरा प्रत्युत्तर सुनो।" पौलुस अपनी कहानी सुनाता है: गमलीएल का शिष्य, कलीसिया का सतानेवाला, दमिश्क की सड़क पर ज्योति, हनन्याह का "हे भाई शाऊल", और मन्दिर में मिला वह आदेश जो सब बदल देता है। जब वह "अन्यजातियों" शब्द तक पहुँचता है, भीड़ फट पड़ती है, और रोमी सूबेदार उसे कोड़े मारने ले जाता है, जब तक पौलुस अपना रोमी नागरिक होना बताकर सब रोक नहीं देता।
मर्म
यह अध्याय सिर्फ़ आत्मकथा नहीं, यह इस दावे की गवाही है कि इस्राएल का परमेश्वर और यीशु नासरी एक ही हैं। ध्यान दें, हनन्याह "हमारे पूर्वजों के परमेश्वर" की बात करता है, न कि किसी नए देवता की। पौलुस के लिए मसीह में विश्वास व्यवस्था से पलायन नहीं, बल्कि उसी वादे की पूर्ति है जिसके लिए वह धुन लगाए बैठा था। और यहीं सबसे कड़ी बात है: परमेश्वर की धुन में डूबा एक मनुष्य परमेश्वर के विरुद्ध खड़ा हो सकता है। "तू मुझे क्यों सताता है?" यह प्रश्न किसी नास्तिक से नहीं, एक शास्त्र-प्रेमी से पूछा गया है। अनुग्रह यहाँ अच्छाई का पुरस्कार नहीं, एक हत्यारे की गिरफ़्तारी है।
मुख्य सूत्र
छुटकारे की कहानी में एक बार-बार दोहराया जानेवाला ढाँचा है: परमेश्वर किसी को बुलाते हैं, उसे भेजते हैं, और भेजा हुआ व्यक्ति अस्वीकार सहता है। मूसा फिरौन के पास, यिर्मयाह जातियों के पास, यीशु अपने ही नगर में। पौलुस उसी धारा में खड़ा है, पर एक फ़र्क के साथ: वह उस मसीह का गवाह है जिसे उसने खुद सताया। वचन 14 का शब्द "उस धर्मी को देखे" यह जोड़ता है कि इस्राएल की सारी प्रतीक्षा एक व्यक्ति में सिमट आई है। और वचन 21 का "दूर-दूर" अब्राहम से मिले उस वादे को खोलता है कि पृथ्वी के सब कुल आशीष पाएँगे। भीड़ को यही असहनीय लगा।
दर्पण
हम सब कहीं न कहीं शाऊल हैं: अपनी सही होने की पक्की भावना में, अपने सिद्धांत की सफ़ाई में, अपने परिवार में उस रिश्तेदार के बारे में हमारे फ़ैसले में जिसे हमने "भटका हुआ" ठहरा दिया है। पौलुस बताता है कि उसकी सबसे बड़ी हिंसा उसकी सबसे ईमानदार भक्ति से निकली थी। यह असहज है, क्योंकि इसका मतलब है कि हमारे धार्मिक जोश की भी जाँच होनी चाहिए, न सिर्फ़ हमारे पापों की। और गौर करें, बदलाव किसी तर्क से नहीं, एक नाम से आया, और एक भाई की आवाज़ से जिसने उसे शत्रु नहीं, "हे भाई शाऊल" कहा।
आज ही उस एक व्यक्ति का नाम काग़ज़ पर लिखिए जिसे आपने मन ही मन विश्वास से बाहर घोषित कर दिया है, और उस नाम के साथ दो मिनट प्रार्थना कीजिए, बदलने की माँग के बिना।
श्रोताओं का चेहरा
लूका का पहला पाठक वह विश्वासी समुदाय था जिसमें यहूदी और अन्यजाति साथ बैठ रहे थे, और जिसके भीतर यही सवाल सुलग रहा था: क्या अन्यजातियों को बराबरी से भीतर लेना इस्राएल के साथ विश्वासघात है? मन्दिर के प्रांगण की उस भीड़ के लिए उत्तर साफ़ था, "ऐसे मनुष्य का अन्त करो।" पौलुस का इब्रानी में बोलना, गमलीएल का नाम, हनन्याह का "व्यवस्था के अनुसार भक्त" होना, ये सब रणनीतिक नहीं, आवश्यक थे: वह दिखा रहा है कि उसका सुसमाचार इस्राएल की जड़ से उखड़ा हुआ नहीं है। पहले पाठकों ने यहाँ अपनी ही कलीसिया की लड़ाई का उत्तर सुना, और यह कीमत भी देखी जो इस उत्तर पर चुकानी पड़ती है।
अंतर्पाठ
वचन 20 हमें प्रेरितों 7 में लौटा देता है, जहाँ स्तिफनुस के हत्यारों ने अपने कपड़े शाऊल के पाँवों पर रखे थे। पौलुस उस दृश्य को खुद उठाता है, यह जानते हुए कि जिस भीड़ के सामने वह खड़ा है, वह वैसी ही है। दूसरा गूँज मन्दिर के दर्शन में है: यशायाह 6 में भी परमेश्वर मन्दिर में एक जन को भेजते हैं और साथ ही बता देते हैं कि लोग नहीं सुनेंगे। बुलाहट और अस्वीकार एक ही साँस में आते हैं। और हनन्याह के मुँह में योएल 2:32 है, "उसका नाम लेकर अपने पापों को धो डाल", वही पद जो पिन्तेकुस्त के उपदेश की धुरी था, अब एक सतानेवाले पर लागू। एक ईमानदार बात: प्रेरितों 9 में साथी आवाज़ सुनते हैं पर किसी को नहीं देखते, यहाँ ज्योति देखते हैं पर आवाज़ नहीं समझते। लूका को यह विरोधाभास मिटाने की चिंता नहीं थी; उसके लिए मुख्य बात यह थी कि वह आवाज़ केवल शाऊल के लिए थी।
एक बारीकी
कपड़ों पर ध्यान दें। वचन 20 में शाऊल हत्यारों के कपड़ों की रखवाली कर रहा है, ठंडे मन से, व्यवस्था के पहरेदार की तरह। तीन वचन बाद, वचन 23 में, यही भीड़ "कपड़े फेंकते और आकाश में धूल उड़ाते" है, क्रोध में अपने वस्त्र फाड़ती और मिट्टी बिखेरती। जो कपड़े उसने एक बार सँभालकर रखे थे, वे अब उसी के विरुद्ध हवा में उड़ रहे हैं। लूका उपदेश नहीं देता, वह केवल कैमरा घुमा देता है। और तीसरा वस्त्र भी है, अदृश्य: "मैं तो जन्म से रोमी हूँ", वह पहचान जिसे सरदार ने बहुत रुपये देकर खरीदा था। पौलुस के पास तीन पहचानें हैं, और तीनों उस चौथी के अधीन हैं जो उसे दमिश्क की सड़क पर मिली।
चिंतन
मेरे विश्वास का कौन-सा हिस्सा ऐसा है जिसे मैं भक्ति समझता हूँ, पर जिसमें किसी दूसरे के लिए कठोरता छिपी है?
पौलुस ने अपनी सबसे शर्मनाक स्मृति को अपनी गवाही का केंद्र बनाया। मैं अपनी किस स्मृति को अब तक छिपाकर रखे हुए हूँ?
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Acts 22 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
प्रेरितों के काम 22 का क्या अर्थ है?
प्रेरितों के काम 22 किस विषय में है?
प्रेरितों के काम 22 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
प्रेरितों के काम 22 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
प्रेरितों के काम 22 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Acts 22 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
कोड़े उठ चुके थे, चमड़े की रस्सियाँ कस चुकी थीं, और एक वाक्य ने सब रोक दिया। "सरदार भी यह जानकर कि वह रोमी है, डर गया, क्योंकि उसने उसे बाँधा था।" डर बंधे हुए आदमी से हटकर बाँधने वाले पर आ गया।
पौलुस की पहचान उसकी ढाल बनी। तेरी पहचान भी तेरे कामों में नहीं, उसमें है जिसका तू है। यह याद रख, जब लोग तुझे तोलने लगें।
रोमी सरदार सिर्फ सच जानना चाहता था, और उसी खोज में उसने पौलुस के बंधन खोल दिए और उसे महासभा के सामने खड़ा कर दिया। सोचिए, एक अधिकारी की जिज्ञासा से परमेश्वर ने सुसमाचार को देश की सबसे ऊँची सभा तक पहुँचा दिया। आपकी बेड़ियाँ भी शायद इसलिए खुलेंगी कि आप किसी ऐसी जगह गवाही दे सकें, जहाँ आप अपने आप कभी न पहुँच पाते।
जब मैं यात्रा करते हुए दमिश्क के निकट पहुँचा, तो दोपहर के लगभग अचानक आकाश से बड़ी ज्योति मेरे चारों ओर चमकी।"
दोपहर का समय, जब सूरज सबसे तेज़ चमकता है। फिर भी वह ज्योति सूरज से भी बड़ी थी। पौलुस अंधकार में नहीं, उजाले में चल रहा था, और तब भी अंधा था।
कभी सोचा है कि तुम्हारे जीवन का कौन सा हिस्सा तुम्हें बिलकुल साफ़ दिखता है, पर मसीह की नज़र में अभी अंधेरा है?
पिता, जब मेरे साथ अन्याय हो और आवाज़ उठाना डरावना लगे, तो मुझे शांत साहस दे। मुझे यह समझ दे कि कब चुप रहना है और कब सच बोलना है। हर इंसान की गरिमा तेरी बनाई हुई है, मुझे उसका आदर करना सिखा। मेरा भरोसा तुझ पर बना रहे।
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