बाइबल व्याख्या

प्रेरितों के काम 24

बाइबल
यह अध्याय JL Group के सहयोग से संभव हुआ है

पाठ

तिरतुल्लुस नामक वकील के माध्यम से महायाजक हनन्याह पौलुस पर तीन आरोप लगाता है: वह उपद्रवी है, नासरी पंथ का मुखिया है, और मन्दिर को अशुद्ध करने वाला है। पौलुस शान्ति से अपना बचाव करता है, अपने विश्वास को खुले तौर पर स्वीकार करता है, और पुनरुत्थान की आशा को अपने मुकद्दमे का असली केन्द्र बताता है। राज्यपाल फेलिक्स फैसला टाल देता है, पौलुस से बार-बार बातें करता है, पर दो साल तक उसे बन्दी रखता है।

मर्म

इस अध्याय के केन्द्र में एक अजीब बात है: सच्चाई बोली जा रही है, पर उस पर कोई निर्णय नहीं लिया जाता। फेलिक्स "धार्मिकता और संयम और आनेवाले न्याय" की बात सुनकर भयभीत होता है, फिर भी कहता है, "अभी तो जा।" यहाँ परमेश्वर के वचन की एक कड़वी सच्चाई सामने आती है: सत्य का सुनना और सत्य के आगे झुकना दो अलग बातें हैं। फेलिक्स कायल है, पर परिवर्तित नहीं। वह पौलुस को बार-बार बुलाता है, पर धन की आशा से, आत्मा की भूख से नहीं। यह पाठ हमसे पूछता है कि क्या हमारे भीतर भी कुछ ऐसा है जो सच्चाई सुनता है और फिर उसे "अवसर पाकर" के इन्तज़ार में टाल देता है।

सामान्य सूत्र

पौलुस अपने बचाव को एक ही धुरी पर टिका देता है: "मरे हुओं के जी उठने के विषय में आज मेरा तुम्हारे सामने मुकद्दमा हो रहा है।" वह कहता है कि वह व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं की सब बातों पर विश्वास करता है, और दानिय्येल 12 की उस आशा को थामे है कि "धर्मी और अधर्मी दोनों का जी उठना होगा।" यह केवल सैद्धान्तिक बात नहीं है। पुनरुत्थान की आशा वही धागा है जो पूरे शास्त्र में बुनी है, और यीशु मसीह के जी उठने में वह ठोस हो जाती है। पौलुस असल में कह रहा है: जिस आशा पर इस्राएल सदियों से जीता आया, मैं उसी पर खड़ा हूँ, और वह आशा मसीह में सच हुई है।

दर्पण

फेलिक्स के भीतर झाँकिए, क्योंकि वह हमारे बहुत करीब है। वह जानता है, वह सुनता है, वह काँपता भी है, पर वह टालता है। कितनी बार हमने भी कोई उपदेश सुनकर, कोई वचन पढ़कर सोचा है, "हाँ, यह सच है, पर अभी नहीं"? पैसे के मामले में, किसी रिश्ते में क्षमा माँगने में, किसी आदत को छोड़ने में, किसी बुलाहट का उत्तर देने में। "अवसर पाकर मैं तुझे फिर बुलाऊँगा" यह हमारी सबसे धार्मिक-सी लगने वाली अवज्ञा है। और साथ ही पौलुस को देखिए: दो साल बन्दी, बिना दोष के, और फिर भी अपने विवेक को "परमेश्वर की और मनुष्यों की ओर निर्दोष" रखने के लिए यत्न करता हुआ। कौन-सा जीवन आपके भीतर बड़ा हो रहा है, फेलिक्स का टालना या पौलुस का यत्न?

प्रोफ़ाइल

पहले पाठकों के लिए यह दृश्य परिचित था। रोमी अदालत, चापलूसी से भरा वकील, यहूदी अगुवे जो अपने ही धर्मी होने का दावा करते हुए एक रोमी राज्यपाल के आगे झुके हुए हैं, यह सब उनके संसार का हिस्सा था। वे जानते थे कि रोमी न्याय अक्सर रिश्वत और राजनीति से चलता था। लूका जब लिखता है कि फेलिक्स को "पौलुस से कुछ धन मिलने की भी आशा थी," तो पाठक सिर हिलाते हैं, हाँ, ऐसा ही होता है। पर वे यह भी सुनते हैं कि सुसमाचार इन्हीं भ्रष्ट गलियारों में बोला जा रहा है। मसीह का साक्षी राज्यपाल के महल में पहुँच चुका है, और चाहे फैसला टलता रहे, वचन बोला जा चुका है।

संदर्भ

यह घटना कैसरिया में हो रही है, यहूदिया का रोमी प्रशासनिक केन्द्र। साल लगभग 57 से 59 ईस्वी के बीच। फेलिक्स एक स्वतन्त्र किया गया दास था जो सम्राट की कृपा से राज्यपाल बना। इतिहासकार टैसिटस उसके बारे में लिखता है कि उसने "राजा की शक्ति दास की आत्मा से" चलाई। उसकी पत्नी द्रुसिल्ला हेरोदेस अग्रिप्पा प्रथम की बेटी थी, यहूदी, पर फेलिक्स की तीसरी पत्नी बनी थी, अपने पहले पति को छोड़कर। इसीलिए जब पौलुस "धार्मिकता और संयम" की बात करता है, तो यह हवा में तीर नहीं है, यह सीधा उनके जीवन पर लगता है। महायाजक का स्वयं आना दिखाता है कि यहूदी अगुवे पौलुस को कितना बड़ा खतरा मानते थे, इतना कि यरूशलेम से कैसरिया तक चलकर आए।

मुख्य पात्र

पौलुस का चित्र यहाँ शान्त और तेज़ है। वह चापलूसी नहीं करता जैसे तिरतुल्लुस ने की; वह केवल तथ्य रखता है, "मुझे बारह दिन से ऊपर नहीं हुए।" वह अपने विश्वास को छिपाता नहीं, बल्कि खुले तौर पर कहता है कि हाँ, इसी "पंथ" की रीति पर वह पूर्वजों के परमेश्वर की सेवा करता है। उसकी आन्तरिक दुनिया में एक बात केन्द्र में है: निर्दोष विवेक। बाहरी परिस्थिति चाहे कैद हो, चाहे झूठे आरोप हों, चाहे राज्यपाल की टालमटोल हो, वह अन्दर से स्थिर है। और शायद सबसे गहरी बात यह है कि दो साल की कैद में भी हम उसे कड़वा होते नहीं देखते। जब फेलिक्स उसे बुलाता है, वह मसीह यीशु पर विश्वास की बात करता है, धार्मिकता की बात करता है, न्याय की बात करता है। बन्दी होकर भी वह प्रचारक है।

चिन्तन

*फेलिक्स ने सत्य को सुना, उसस

Acts में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

The Message of Acts

John Stott

Stott's classic on how the gospel crossed every boundary on earth.

Acts For Everyone, Part 1

N.T. Wright

The church's explosive beginnings, explained with energy and care.

Acts: An Introduction and Commentary

I. Howard Marshall

A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.

Acts

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Acts 24 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

प्रेरितों के काम 24 का क्या अर्थ है?
तिरतुल्लुस नामक वकील के माध्यम से महायाजक हनन्याह पौलुस पर तीन आरोप लगाता है: वह उपद्रवी है, नासरी पंथ का मुखिया है, और मन्दिर को अशुद्ध करने वाला है। पौलुस शान्ति से अपना बचाव करता है, अपने विश्वास को खुले तौर पर स्वीकार करता है, और पुनरुत्थान की आशा को अपने मुकद्दमे का असली केन्द्र बताता है। राज्यपाल फेलिक्स फैसला टाल देता है, पौलुस से बार-बार बातें करता है, पर दो साल तक उसे बन्दी रखता है।
प्रेरितों के काम 24 किस विषय में है?
इस अध्याय के केन्द्र में एक अजीब बात है: सच्चाई बोली जा रही है, पर उस पर कोई निर्णय नहीं लिया जाता। फेलिक्स "धार्मिकता और संयम और आनेवाले न्याय" की बात सुनकर भयभीत होता है, फिर भी कहता है, "अभी तो जा।" यहाँ परमेश्वर के वचन की एक कड़वी सच्चाई सामने आती है: सत्य का सुनना और सत्य के आगे झुकना दो अलग बातें हैं। फेलिक्स कायल है, पर परिवर्तित नहीं। वह पौलुस को बार-बार बुलाता है, पर धन की आशा से, आत्मा की भूख से नहीं। यह पाठ हमसे पूछता है कि क्या हमारे भीतर भी कुछ ऐसा है जो सच्चाई सुनता है और फिर उसे "अवसर पाकर" के इन्तज़ार में टाल देता है।
प्रेरितों के काम 24 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
पौलुस अपने बचाव को एक ही धुरी पर टिका देता है: "मरे हुओं के जी उठने के विषय में आज मेरा तुम्हारे सामने मुकद्दमा हो रहा है।" वह कहता है कि वह व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं की सब बातों पर विश्वास करता है, और दानिय्येल 12 की उस आशा को थामे है कि "धर्मी और अधर्मी दोनों का जी उठना होगा।" यह केवल सैद्धान्तिक बात नहीं है। पुनरुत्थान की आशा वही धागा है जो पूरे शास्त्र में बुनी है, और यीशु मसीह के जी उठने में वह ठोस हो जाती है। पौलुस असल में कह रहा है: जिस आशा पर इस्राएल सदियों से जीता आया, मैं उसी पर खड़ा हूँ, और वह आशा मसीह में सच हुई है।
प्रेरितों के काम 24 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
फेलिक्स के भीतर झाँकिए, क्योंकि वह हमारे बहुत करीब है। वह जानता है, वह सुनता है, वह काँपता भी है, पर वह टालता है। कितनी बार हमने भी कोई उपदेश सुनकर, कोई वचन पढ़कर सोचा है, "हाँ, यह सच है, पर अभी नहीं"?
प्रेरितों के काम 24 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
पहले पाठकों के लिए यह दृश्य परिचित था। रोमी अदालत, चापलूसी से भरा वकील, यहूदी अगुवे जो अपने ही धर्मी होने का दावा करते हुए एक रोमी राज्यपाल के आगे झुके हुए हैं, यह सब उनके संसार का हिस्सा था। वे जानते थे कि रोमी न्याय अक्सर रिश्वत और राजनीति से चलता था। लूका जब लिखता है कि फेलिक्स को "पौलुस से कुछ धन मिलने की भी आशा थी," तो पाठक सिर हिलाते हैं, हाँ, ऐसा ही होता है। पर वे यह भी सुनते हैं कि सुसमाचार इन्हीं भ्रष्ट गलियारों में बोला जा रहा है। मसीह का साक्षी राज्यपाल के महल में पहुँच चुका है, और चाहे फैसला टलता रहे, वचन बोला जा चुका है।
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

Acts 24 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 18

पौलुस पर दंगा भड़काने का आरोप था, पर उसका जवाब सादा था: "उन्होंने मुझे मन्दिर में शुद्ध दशा में पाया, न भीड़ के साथ, न बलवे के साथ।" उसका बचाव उसका जीवन था, चतुर शब्द नहीं। सोचो, जब लोग तुम्हारे बारे में गलत बोलते हैं, तब क्या तुम्हारा शांत, सच्चा चलना ही उनका उत्तर बन पाता है?

धन्यवाद संपादकीय पर पद 24

प्रभु, धन्यवाद कि फेलिक्स और द्रुसिल्ला जैसे राजा और रानी के सामने भी पौलुस को मसीह यीशु पर विश्वास की बातें सुनाने का अवसर मिला। धन्यवाद कि आपका सुसमाचार ऊँचे पदों तक पहुँचता है, और कोई भी दिल आपकी पहुँच से बाहर नहीं।

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