प्रेरितों के काम 25
पाठ
फेस्तुस ने प्रान्त की कुर्सी सँभाली और तीन दिन बाद ही यरूशलेम पहुँच गया, जहाँ प्रधान याजकों ने पौलुस के विरुद्ध अपनी पुरानी फाइल फिर खोल दी और चालाकी से माँगा कि कैदी को यरूशलेम बुलाया जाए, क्योंकि रास्ते में हत्या की घात लगी थी। कैसरिया में सुनवाई हुई, आरोप लगे जिनका "प्रमाण वे नहीं दे सकते थे," और जब फेस्तुस ने यहूदियों को खुश करने के लिए मुकद्दमा यरूशलेम ले जाने का प्रस्ताव रखा, तो पौलुस ने वह एक वाक्य कहा जिसने बाकी सब तय कर दिया: "मैं कैसर की दुहाई देता हूँ।" कुछ दिन बाद अग्रिप्पा और बिरनीके आए, और फेस्तुस ने अपनी उलझन उनके सामने रख दी।
मर्म
ध्यान दीजिए, इस पूरे अध्याय में परमेश्वर एक बार भी नहीं बोलते। कोई स्वर्गदूत नहीं, कोई दर्शन नहीं, कोई भूकंप नहीं जो जेल के दरवाज़े खोल दे। सिर्फ़ कागज़, कुर्सी, राजनीति और एक कैदी जो प्रक्रिया का इस्तेमाल करना जानता है। और ठीक यही इस अध्याय का धर्मशास्त्र है: परमेश्वर का शासन तब भी चल रहा होता है जब वह पूरी तरह मानवीय, नौकरशाही, थकाऊ दिखता है। फेस्तुस सोचता है कि वह जाँच कर रहा है; असल में वह पौलुस को रोम पहुँचाने वाली गाड़ी का पहिया घुमा रहा है। परमेश्वर चमत्कार से भी काम करते हैं, पर उससे कम नहीं वे रोमी कानून की धारा से भी काम करते हैं। यह हमें आराम नहीं, संयम सिखाता है: उद्धार का इतिहास हमेशा नाटकीय नहीं होता, कभी वह केवल धैर्यपूर्वक सही जगह खड़े रहना होता है।
सूत्र
फेस्तुस अग्रिप्पा को पूरा मामला दो पंक्तियों में समझाता है, और अनजाने में सुसमाचार का सार बोल देता है: विवाद "यीशु नामक किसी मनुष्य के विषय में जो मर गया था, और पौलुस उसको जीवित बताता था।" एक रोमी अधिकारी के लिए यह धार्मिक झगड़ा था; असल में यही वह दरार है जिससे नई सृष्टि भीतर आई। और दृश्य भी परिचित है: एक निर्दोष व्यक्ति, राज्यपाल जो उसे निर्दोष मानता है, याजक जो उसका खून चाहते हैं, और एक हेरोदेस जो कौतुक से कहता है कि वह भी सुनना चाहता है। यीशु के मुकद्दमे की परछाईं उनके गवाह पर पड़ रही है। शिष्य गुरु के रास्ते पर चलता है, वही आरोप, वही अदालतें, वही अजीब मौन।
आईना
हम सब उस पल का इंतज़ार करते हैं जब सच्चाई अपने आप चमक उठेगी और सब मान लेंगे कि हम सही थे। पौलुस को वह पल नहीं मिला। उसे मिली दो साल की हिरासत, एक नया राज्यपाल, वही झूठे आरोप, और एक ईमानदार अधिकारी जो फिर भी "यहूदियों को खुश करने की इच्छा से" समझौता करने को तैयार था। आपके दफ़्तर में, आपके परिवार में, कलीसिया की उस समिति में जहाँ आपके बारे में गलत बात कही गई, यही होता है: लोग सच से नहीं, सुविधा से चलते हैं। पौलुस न गिड़गिड़ाया, न कड़वा हुआ। उसने शांत स्वर में अपना अधिकार इस्तेमाल किया और मामले को उस अदालत तक ले गया जहाँ परमेश्वर उसे चाहते थे। सफ़ाई देना कमज़ोरी नहीं है; कड़वाहट है।
आज एक कागज़ पर यह एक वाक्य लिखिए, "मेरा सारा मुकद्दमा इस पर टिका है कि यीशु मसीह जीवित हैं," और उसे ज़ोर से, अपने कानों से सुनते हुए पढ़िए।
श्रोता
लूका यह वृत्तांत उन कलीसियाओं के लिए लिख रहा है जो साम्राज्य के भीतर संदेह की नज़र से देखी जा रही थीं। उनका सवाल व्यावहारिक था: क्या मसीही होना रोम के विरुद्ध बग़ावत है? क्या हमें अदालत में जाने से डरना चाहिए? उन्हें इस अध्याय में तीन बार एक ही बात सुनाई देती है, और वह भी विरोधियों के मुँह से: "मैंने जान लिया कि उसने ऐसा कुछ नहीं किया कि मार डाला जाए।" राजकीय गवाही, सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज। दूसरी बात जो वे सुनते: पौलुस ने अपनी रोमी नागरिकता का उपयोग करने में कोई पाप नहीं समझा। विश्वासी को न्यायालय, कानून और अधिकार का सम्मानपूर्वक उपयोग करने की स्वतंत्रता है, बिना उस पर भरोसा किए।
संदर्भ
समय लगभग ईस्वी 59, जगह कैसरिया, भूमध्य सागर के किनारे बना हेरोदेस का बंदरगाह-नगर, रोमी सत्ता का असली केंद्र। फेलिक्स को हटा दिया गया है, पोर्कियुस फेस्तुस नया आया है, और नए राज्यपाल के पहले हफ़्ते सबसे नाज़ुक होते हैं; यरूशलेम का नेतृत्व यही जानकर तुरंत पहुँचता है। अग्रिप्पा दूसरा उस हेरोदेस वंश का अंतिम चिराग़ है जिसने यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाले का सिर कटवाया और यीशु का उपहास किया; बिरनीके उसकी बहन है, और उनके रिश्ते पर रोम में खुलेआम फुसफुसाहटें थीं। तेईसवीं आयत का "बड़ी धूमधाम" यूनानी में फ़ैंतासिया है, दिखावा, तमाशा। सेनापति, नगर के प्रमुख, ज़ंजीरों में एक तंबू बनाने वाला। तमाशा एक तरफ़, सत्य दूसरी तरफ़।
अंतर्पाठ
पौलुस के कैसरिया पहुँचने से बहुत पहले प्रभु ने उससे कहा था कि उसे रोम में भी गवाही देनी है (प्रेरितों 23:11), और अध्याय 25 दिखाता है कि वह वचन कैसे पूरा हुआ: स्वर्गदूत के हाथों नहीं, बल्कि याजकों की साज़िश, राज्यपाल की कायरता और एक कानूनी अपील के ज़रिए। परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने के लिए हमारे विरोधियों को भी काम में लगा देते हैं। और लूका के अपने सुसमाचार में यीशु ने कहा था कि उनके गवाह "राजाओं और हाकिमों के सामने" पहुँचाए जाएँगे (लूका 21:12), और यह अवसर बचाव के लिए नहीं, गवाही के लिए होगा। इसीलिए अध्याय 25 अध्याय 26 के भाषण के बिना अधूरा है: अदालत मंच बन जाती है।
मनन
जब सच्चाई आपके पक्ष में हो पर लोग सुविधा चुन लें, तो आपके भीतर पहले क्या जागता है, धैर्य या कड़वाहट?
फेस्तुस के लिए यीशु "एक मनुष्य जो मर गया था" थे; क्या मेरी बातचीत में उनका जीवित होना सचमुच सुनाई देता है, या केवल एक मत के रूप में?
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Acts 25 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, धन्यवाद कि अग्रिप्पा और बिरनीके का फेस्तुस से भेंट करने आना कोई संयोग न था, बल्कि आपकी योजना थी, ताकि पौलुस की गवाही राजाओं तक पहुँचे। धन्यवाद कि आज भी हमारी मुलाकातें और साधारण दिन आपके हाथ में हैं, और आप उन्हीं से अपना काम पूरा करते हैं।
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