मरकुस 13
पाठ
मन्दिर से निकलते हुए एक चेला पत्थरों की भव्यता पर मुग्ध है, और यीशु एक वाक्य में उस भव्यता को मिट्टी कर देते हैं: "यहाँ पत्थर पर पत्थर भी बचा न रहेगा जो ढाया न जाएगा।" फिर जैतून के पहाड़ पर, मन्दिर के ठीक सामने बैठकर, वे चार चेलों को एक लम्बा उत्तर देते हैं जो उनके प्रश्न का सीधा उत्तर नहीं है: युद्ध, भूकम्प, धोखा, अदालतें, भागना, सूरज का अंधेरा होना, मनुष्य के पुत्र का आना। और अन्त में एक ही आज्ञा, चार बार दोहराई गई: जागते रहो।
मूल बात
ध्यान दीजिए कि चेले पूछते हैं "कब" और "क्या चिन्ह", और यीशु उत्तर देते हैं "सावधान रहो।" यह टालमटोल नहीं है, यह दिशा बदलना है। वे समय का नक्शा नहीं देते, वे शिष्य का हृदय गढ़ते हैं। पूरे अध्याय में परमेश्वर इतिहास के ऊपर खड़े हैं, उसके नीचे दबे नहीं: वे दिनों को घटाते हैं (पद 20), वे चुने हुओं को इकट्ठा करते हैं (पद 27), वे अकेले उस दिन को जानते हैं (पद 32)। पर यही परमेश्वर उथल-पुथल को रोकते नहीं। यह अध्याय हमें यह नहीं सिखाता कि दुनिया सुरक्षित है; यह सिखाता है कि दुनिया के असुरक्षित होने के बावजूद परमेश्वर का वचन टलता नहीं। विश्वास यहाँ जानकारी नहीं, धीरज है।
मुख्य सूत्र
यीशु दानिय्येल की भाषा उधार लेते हैं: "मनुष्य के पुत्र को बड़ी सामर्थ्य और महिमा के साथ बादलों में आते देखेंगे।" दानिय्येल 7 में वह आकृति बादलों पर चढ़कर प्राचीन परमेश्वर के पास राज्य पाने जाती है। यीशु यह चित्र अपने ऊपर लगाते हैं, और यह मन्दिर के सामने बैठकर कहते हैं। पुराने नियम में परमेश्वर की उपस्थिति पत्थरों के उस भवन में बसती थी; अब वह उपस्थिति एक व्यक्ति में बैठी है, और वह व्यक्ति कुछ ही दिनों में स्वयं "ढाया" जाएगा और तीसरे दिन उठाया जाएगा। छुटकारे की पूरी कहानी इसी दिशा में बहती है: परमेश्वर अपने लोगों को किसी इमारत में नहीं, अपने पुत्र में इकट्ठा करते हैं, "पृथ्वी के इस छोर से आकाश के उस छोर तक"।
दर्पण
हममें से अधिकांश उस चेले जैसे हैं जो पत्थरों की ओर उँगली उठाता है। हमारे पत्थर अलग हैं: नौकरी जो पहचान बन गई, बचत खाता जिसे देखकर नींद आती है, वह मकान जिसे बनाने में बीस साल लगे, वह कलीसिया जिसकी भीड़ पर हमें गर्व है। यीशु उन सबके बारे में एक ही बात कहते हैं, और वह बात कठोर लगती है क्योंकि वह सच है। पर गौर कीजिए, वे यह कहकर हमें डराते नहीं, वे हमें हल्का करते हैं: जो गिरने वाला है, उस पर अपना वज़न मत रखिए। और जो नहीं टलेगा, वह उनका वचन है।
आज, दस मिनट के भीतर: उस एक चीज़ का नाम काग़ज़ पर लिखिए जिसके बिना आपको अपना जीवन अधूरा लगता है, और उसके नीचे लिखिए "आकाश और पृथ्वी टल जाएँगे, परन्तु मेरी बातें कभी न टलेंगी", फिर उसे ज़ोर से पढ़िए।
प्रश्न
पद 30 काँटा है: "जब तक ये सब बातें न हो लेंगी, तब तक यह लोग जाते न रहेंगे।" उस पीढ़ी ने मन्दिर का विनाश देखा, सन् 70 में, ठीक वैसे ही जैसे कहा गया था। पर सूरज अंधेरा नहीं हुआ, तारे नहीं गिरे, मनुष्य का पुत्र बादलों में दिखाई नहीं दिया। क्या यीशु से चूक हुई? मैं इसे चिकना करके नहीं रखूँगा। पर मैं पद 32 पर रुकता हूँ: "न पुत्र" जानता है। यह वाक्य इतना असुविधाजनक है कि कोई कलीसिया इसे गढ़ नहीं सकती थी। देहधारी पुत्र ने स्वेच्छा से न जानना स्वीकारा। शायद भविष्यवाणी का यह मिश्रण, जिसमें 70 ईस्वी और अन्त एक ही कैनवास पर चित्रित हैं, जानबूझकर ऐसा है, ताकि कोई पीढ़ी कहकर न बैठ जाए: "हमारा समय नहीं आया।" रहस्य यहाँ दोष नहीं, अनुशासन है।
मुख्य पात्र
यीशु यहाँ भविष्यवक्ता की मुद्रा में हैं, पर उनकी आवाज़ में कड़वाहट नहीं है। वे उस शहर के सामने बैठे हैं जो उन्हें मार डालेगा, और वे चेलों को तैयार कर रहे हैं, अपने लिए सहानुभूति नहीं माँग रहे। वे गर्भवती और दूध पिलाती स्त्रियों के लिए "हाय! हाय!" कहते हैं, यह किसी निर्मम न्यायाधीश की भाषा नहीं, एक चरवाहे की है जो अपने झुंड की सबसे कमज़ोर भेड़ों को गिनता है। वे यह भी कहते हैं, "प्रार्थना किया करो कि यह जाड़े में न हो", मानो उस कठोर भविष्य में भी दया की माँग करने की जगह बची हो। यह वही यीशु हैं जो थोड़ी देर बाद गतसमनी में शिष्यों को सोते पाएँगे।
एक बारीकी
"मुर्गे के बाँग देने के समय" (पद 35)। यीशु रात के चार पहर गिनाते हैं, और तीसरे का नाम लेते हैं। कुछ ही घण्टों बाद, इसी सुसमाचार में, मुर्गा बाँग देगा और पतरस टूटकर रोएगा। जिस पतरस ने यह चेतावनी सुनी थी, वही पहरेदार नींद में पकड़ा जाएगा। मरकुस यह जोड़ संयोग से नहीं रखता। "जागते रहो" कोई दूर भविष्य का आदेश नहीं है; उसकी परीक्षा उसी सप्ताह हो जाती है, एक बग़ीचे में, एक आँगन में, एक अलाव के पास। और फिर भी पतरस खोया नहीं गया। यही इस अध्याय की छिपी हुई कृपा है: जागने की आज्ञा देने वाला उन्हें भी बटोरता है जो सो गए थे।
चिंतन
आपके जीवन के कौन से "बड़े-बड़े भवन" हैं, जिन्हें गिरते देखकर आपका विश्वास हिल जाएगा, और क्या आप उन्हें आज नाम देने को तैयार हैं?
यदि "जागते रहना" किसी तिथि की गणना नहीं बल्कि एक रोज़ाना की मुद्रा है, तो आपके कल के दिन में वह व्यावहारिक रूप से कैसा दिखेगा?
Mark में और गहराई से जानें
चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।
Keller walks through Mark to show the life of Jesus as one great story.
Wright's punchy guide through the fastest moving Gospel.
Mark: An Introduction and Commentary
A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.
Faith.network earns a small commission on Kobo purchases made through these links, at no extra cost to you. It helps keep the studies free.
Mark 13 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
मरकुस 13 का क्या अर्थ है?
मरकुस 13 किस विषय में है?
मरकुस 13 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
मरकुस 13 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
मरकुस 13 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Mark 13 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
हे प्रभु, मुझे जागते रहना सिखा। मेरा मन अक्सर सो जाता है, दुनिया की चिंताओं में खो जाता है। तू किसी भी घड़ी आ सकता है, इसलिए मेरे हृदय को तैयार रख। हर सुबह, हर शाम मुझे तेरी प्रतीक्षा में सजग बनाए रख।
पिता, उन दिनों की बात सुनकर मन भारी हो जाता है, जब सबसे कोमल लोग सबसे ज़्यादा सहते हैं। उन माँओं को थामे रख जो डर और तंगी के बीच अपने बच्चों को पाल रही हैं। जहाँ हम मदद कर सकते हैं, वहाँ हमें आँखें खोलकर आगे बढ़ने की हिम्मत दे।
ऐसा न हो कि वह अचानक आकर तुम्हें सोता हुआ पाए।" यीशु ने यह नहीं कहा कि तुम्हें डरते हुए पाए, या थका हुआ पाए। सिर्फ सोता हुआ न पाए। जागना कोई बड़ा काम नहीं, बस दिल का वह हिस्सा खुला रखना जो उसकी आहट सुनता है। सोच, आज तेरे भीतर क्या है जो सुन्न हो चला है? वहीं से जागना शुरू कर।
इस अंश को किसी और स्तर पर देखें
शुरुआती, धर्मशास्त्री, या कोई अलग लंबाई? सेटिंग्स बदलें और अपना संस्करण बनाएँ।
अध्ययन टूल में खोलें
