बाइबल व्याख्या

व्यवस्थाविवरण 14

बाइबल
यह अध्याय JL Group के सहयोग से संभव हुआ है

पाठ

अध्याय की शुरुआत शोक के नियम से होती है: मरे हुओं के कारण न शरीर चीरना, न भौहों के बाल मुण्डाना, क्योंकि "तुम अपने परमेश्वर यहोवा के पुत्र हो।" इसके बाद खाने की लम्बी सूची आती है, कौन से पशु, मछलियाँ और पक्षी शुद्ध हैं और कौन से अशुद्ध, और यह आदेश कि अपने आप मरे हुए जानवर का माँस इस्राएली न खाए। अन्त में दशमांश का नियम: हर वर्ष उपज का दसवाँ भाग चुने हुए स्थान पर परिवार समेत आनन्द के साथ खाया जाए, और हर तीसरे वर्ष वह दशमांश नगर के फाटकों के भीतर लेवीय, परदेशी, अनाथ और विधवा के पेट भरने के लिए रखा जाए।

मर्म

पहली पंक्ति पूरे अध्याय की कुंजी है। जो नियम आगे आते हैं, वे इसलिए नहीं कि परमेश्वर खाने के मामले में नकचढ़े हैं, बल्कि इसलिए कि इस्राएल "पुत्र" है और "पवित्र प्रजा" है। इब्रानी शब्द कदोश, जिसे हम पवित्र कहते हैं, का मूल अर्थ है अलग किया हुआ, किसी एक उद्देश्य के लिए सुरक्षित। पहचान पहले आती है, आचरण बाद में। यह महत्वपूर्ण है, क्योंकि धर्म का स्वाभाविक ढलान उल्टा होता है: पहले नियम पालो, फिर बेटे कहलाओ। यहाँ परमेश्वर कहते हैं, तुम मेरे हो, इसलिए तुम्हारा शोक, तुम्हारी थाली और तुम्हारा बटुआ भी किसी और के हो गए हैं। चुनाव का उद्देश्य विशेषाधिकार नहीं, विशिष्ट जीवनशैली है।

कथा का सूत्र

यह अलगाव अन्तिम बात नहीं थी, वह एक चिह्न था। जब तक इस्राएल जातियों के बीच परमेश्वर का नमूना था, तब तक भोजन की दीवार उस नमूने को सुरक्षित रखती थी। मसीह में वह दीवार अपना काम पूरा कर चुकी है; पतरस की छत पर की चादर और प्रेरितों के निर्णय के बाद कलीसिया सूअर के बारे में नहीं, हृदय के बारे में प्रश्न पूछती है। पर ध्यान दीजिए कि क्या नहीं बदला: पवित्रता की माँग, और यह सच्चाई कि पुत्रत्व जीवन को आकार देता है। आज जो हमें अलग करता है वह थाली नहीं, मेज़ है, वह मेज़ जिस पर हम लेवीय, परदेशी, अनाथ और विधवा को बिठाते हैं। चिह्न बदला, पुकार वही रही।

दर्पण

ध्यान दीजिए कि अध्याय कहाँ-कहाँ छूता है: आपका दुःख, आपका खाना, आपका पैसा। तीनों वे क्षेत्र हैं जहाँ हम सोचते हैं कि यह मेरा निजी मामला है। मरे हुओं के कारण शरीर चीरना उस दुःख का रूप था जिसमें कोई आशा नहीं थी; आज हम ख़ुद को कुरेदते नहीं, पर हम अपने शोक को शराब, स्क्रीन या अति-व्यस्तता से सुन्न करते हैं, और यह भी एक तरह का चीरना है। खाने के नियम कहते हैं कि भूख पर अंकुश परमेश्वर की चिन्ता का विषय है, आपकी देह भक्ति का स्थान है, कचरा-ग्रह नहीं। और दशमांश? वचन 26 चौंकाता है: जो तेरा जी चाहे, वह ख़रीदकर घराने समेत खाकर आनन्द करना। परमेश्वर आपके आनन्द के विरुद्ध नहीं हैं। पर वचन 27 तुरन्त जोड़ता है: "अपने फाटकों के भीतर के लेवीय को न छोड़ना।" आनन्द तब तक पवित्र नहीं जब तक उसमें वह भी न बैठे जिसका कोई "भाग या अंश" नहीं। आज ही, दस मिनट में: उस एक व्यक्ति का नाम लिखिए जिसके पास कोई भाग या अंश नहीं है, कोई विधवा, अकेला पड़ोसी, छूटा हुआ विद्यार्थी, और अभी उसे फ़ोन करके अपने घर के खाने पर बुला लीजिए, तारीख़ तय करके।

कठिन प्रश्न

पर वचन 21 खटकता है: जो जानवर अपनी मृत्यु से मर जाए, उसे इस्राएली न खाए, मगर परदेशी को दे दे या पराए को बेच दे। यह असहज है। क्या परदेशी का पेट कम मूल्यवान है? टालना बेईमानी होगी। यहाँ भेद नैतिक नहीं, अनुष्ठानिक है: जो वस्तु इस्राएल की विशिष्ट पहचान के विरुद्ध थी, वह दूसरों के लिए हानिकारक नहीं थी, क्योंकि वे उस अनुबंध में बँधे नहीं थे। फिर भी उसी अध्याय का अन्त परदेशी को मेज़ पर बिठाता है, और वही व्यवस्था बार-बार कहती है कि परदेशी से प्रेम करो। तनाव बना रहता है, और मुझे लगता है हमें उसे बना रहने देना चाहिए: यह ऐसे समाज की व्यवस्था है जो अभी बन ही रहा था, और जिसकी पूर्णता मसीह तक रुकी रही।

पहले सुननेवाले

जो लोग यह सुन रहे थे, वे खानाबदोश थे जो बसने जा रहे थे। उनके लिए शोक पर अपने शरीर को काटना कोई अजीब बात नहीं थी, पड़ोसी कनानी यही करते थे, और मरे हुओं के साथ सम्बन्ध रखना धर्म का हिस्सा था। उनके कानों में वचन 1 का अर्थ था: तुम्हारा दुःख अब किसी और परमेश्वर के तर्क से नहीं चलेगा। और दशमांश की यात्रा उनके लिए ठोस थी, बैल-बकरी को हाँककर कोसों चलना, या बेचकर रुपया बाँधकर ले जाना। वचन 26 उनके लिए राहत की साँस था: सब कुछ वेदी पर नहीं जलेगा, तुम बैठकर खाओगे, हँसोगे, परिवार के साथ।

पृष्ठभूमि

यह मूसा का उपदेश है, मोआब के मैदान में, यरदन पार करने से ठीक पहले। चालीस वर्ष की भटकन ख़त्म, पर प्रवेश अभी बाक़ी। सामने वह देश है जहाँ उपजाऊ ज़मीन, मन्दिर, पुजारी और रीति-रिवाज पहले से मौजूद हैं, और वहाँ बसना अपने आप में सबसे बड़ा धार्मिक ख़तरा है। इसलिए ये नियम सीमा-रेखाएँ हैं, घेराबंदी नहीं। लेवियों के पास ज़मीन नहीं थी, यह जान-बूझकर था, ताकि पूजा-सेवा किसी एक गोत्र की सम्पत्ति न बने और बाक़ी सब उनके प्रति उत्तरदायी रहें। परदेशी, अनाथ, विधवा वे तीन थे जिनके पीछे कोई पुरुष संरक्षक नहीं था, यानी प्राचीन समाज में कोई सुरक्षा नहीं।

मनन के प्रश्न

आपके दुःख पर किसका तर्क चलता है: "तुम परमेश्वर के पुत्र हो" का, या किसी और आवाज़ का जो आपको सुन्न करना सिखाती है?

आपके घर के सबसे आनन्दमय भोजन में पिछली बार कौन बैठा था जिसका आपके साथ कोई "भाग या अंश" नहीं है?

Deuteronomy में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

The Message of Deuteronomy

Raymond Brown

Shows how Moses' farewell sermons beat with love for God and his people.

Deuteronomy

Christopher Wright

Reads the covenant renewal with an eye for its ethics and its heart.

Deuteronomy: An Introduction and Commentary

Edward Woods

A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.

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Deuteronomy 14 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

व्यवस्थाविवरण 14 का क्या अर्थ है?
अध्याय की शुरुआत शोक के नियम से होती है: मरे हुओं के कारण न शरीर चीरना, न भौहों के बाल मुण्डाना, क्योंकि "तुम अपने परमेश्वर यहोवा के पुत्र हो।" इसके बाद खाने की लम्बी सूची आती है, कौन से पशु, मछलियाँ और पक्षी शुद्ध हैं और कौन से अशुद्ध, और यह आदेश कि अपने आप मरे हुए जानवर का माँस इस्राएली न खाए। अन्त में दशमांश का नियम: हर वर्ष उपज का दसवाँ भाग चुने हुए स्थान पर परिवार समेत आनन्द के साथ खाया जाए, और हर तीसरे वर्ष वह दशमांश नगर के फाटकों के भीतर लेवीय, परदेशी, अनाथ और विधवा के पेट भरने के लिए रखा जाए।
व्यवस्थाविवरण 14 किस विषय में है?
यह अलगाव अन्तिम बात नहीं थी, वह एक चिह्न था। जब तक इस्राएल जातियों के बीच परमेश्वर का नमूना था, तब तक भोजन की दीवार उस नमूने को सुरक्षित रखती थी। मसीह में वह दीवार अपना काम पूरा कर चुकी है; पतरस की छत पर की चादर और प्रेरितों के निर्णय के बाद कलीसिया सूअर के बारे में नहीं, हृदय के बारे में प्रश्न पूछती है। पर ध्यान दीजिए कि क्या नहीं बदला: पवित्रता की माँग, और यह सच्चाई कि पुत्रत्व जीवन को आकार देता है। आज जो हमें अलग करता है वह थाली नहीं, मेज़ है, वह मेज़ जिस पर हम लेवीय, परदेशी, अनाथ और विधवा को बिठाते हैं। चिह्न बदला, पुकार वही रही।
व्यवस्थाविवरण 14 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
पर वचन 21 खटकता है: जो जानवर अपनी मृत्यु से मर जाए, उसे इस्राएली न खाए, मगर परदेशी को दे दे या पराए को बेच दे। यह असहज है। क्या परदेशी का पेट कम मूल्यवान है? टालना बेईमानी होगी। यहाँ भेद नैतिक नहीं, अनुष्ठानिक है: जो वस्तु इस्राएल की विशिष्ट पहचान के विरुद्ध थी, वह दूसरों के लिए हानिकारक नहीं थी, क्योंकि वे उस अनुबंध में बँधे नहीं थे। फिर भी उसी अध्याय का अन्त परदेशी को मेज़ पर बिठाता है, और वही व्यवस्था बार-बार कहती है कि परदेशी से प्रेम करो। तनाव बना रहता है, और मुझे लगता है हमें उसे बना रहने देना चाहिए: यह ऐसे समाज की व्यवस्था है जो अभी बन ही रहा था, और जिसकी पूर्णता मसीह तक रुकी रही।
व्यवस्थाविवरण 14 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
यह मूसा का उपदेश है, मोआब के मैदान में, यरदन पार करने से ठीक पहले। चालीस वर्ष की भटकन ख़त्म, पर प्रवेश अभी बाक़ी। सामने वह देश है जहाँ उपजाऊ ज़मीन, मन्दिर, पुजारी और रीति-रिवाज पहले से मौजूद हैं, और वहाँ बसना अपने आप में सबसे बड़ा धार्मिक ख़तरा है। इसलिए ये नियम सीमा-रेखाएँ हैं, घेराबंदी नहीं। लेवियों के पास ज़मीन नहीं थी, यह जान-बूझकर था, ताकि पूजा-सेवा किसी एक गोत्र की सम्पत्ति न बने और बाक़ी सब उनके प्रति उत्तरदायी रहें। परदेशी, अनाथ, विधवा वे तीन थे जिनके पीछे कोई पुरुष संरक्षक नहीं था, यानी प्राचीन समाज में कोई सुरक्षा नहीं।
व्यवस्थाविवरण 14 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
आपके घर के सबसे आनन्दमय भोजन में पिछली बार कौन बैठा था जिसका आपके साथ कोई "भाग या अंश" नहीं है?
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

Deuteronomy 14 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 26

परमेश्वर ने दसवाँ अंश माँगा, और फिर कहा, "जो कुछ तू चाहे, उसे मोल लेकर अपने परमेश्वर यहोवा के सामने खाकर अपने घराने समेत आनन्द करना।" सोचो, वह तुझे तेरी पसंद की चीज़ें खरीदने को कहता है, ताकि तू उसके सामने खुश हो। क्या तूने कभी परमेश्वर को ऐसा जाना है? या तेरे मन में वह सिर्फ़ माँगने वाला है, देने वाला नहीं?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 7

ऊँट और खरगोश पागुर तो करते थे, पर उनके खुर चिरे हुए नहीं थे, "इसलिए वे तुम्हारे लिये अशुद्ध हैं।" आधी बात काफी नहीं थी। भीतर वचन को चबाना और बाहर अलग चाल चलना, दोनों साथ चाहिए। सोच लो: तुम वचन पढ़ते हो, मनन भी करते हो, पर तुम्हारे कदम किस ओर पड़ते हैं? परमेश्वर भीतर और बाहर, दोनों को देखता है।

धन्यवाद संपादकीय पर पद 13

पिता, धन्यवाद कि आपने अपने लोगों को अंधेरे में नहीं छोड़ा, बल्कि यह तक बताया कि कौन से पक्षी उनके लिए खाने योग्य नहीं। आपकी चिंता हमारे जीवन के सबसे छोटे विवरणों तक पहुँचती है। धन्यवाद कि आप आज भी हमें अलग किया हुआ और पवित्र देखना चाहते हैं, और इसके लिए साफ मार्गदर्शन देते हैं।

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