व्यवस्थाविवरण 15
मूल पाठ
हर सातवें वर्ष कर्ज़ रद्द हो जाता है: जिसने पड़ोसी को उधार दिया है, वह उसे "बरबस न भरवाए", क्योंकि यह छुटकारा यहोवा के नाम से घोषित हुआ है। इसके बाद अध्याय गरीब भाई की ओर मुड़ता है, जिसके लिये न हृदय कठोर करना है और न मुट्ठी, भले ही छुटकारे का वर्ष निकट हो। फिर छः वर्ष सेवा कर चुके इब्री दास या दासी को सातवें वर्ष स्वतंत्र किया जाना है, और "खाली हाथ न जाने देना" : भेड़-बकरियों, खलिहान और दाखमधु के कुण्ड में से भरपूर देकर विदा करना। अन्त में पहलौठे पशु, जो यहोवा के लिये पवित्र हैं और चुने हुए स्थान पर परिवार समेत खाए जाते हैं, बशर्ते उनमें कोई दोष न हो।
मूल बात
यहाँ परमेश्वर अपने स्वभाव को इस्राएल की बहीखाते में लिख देते हैं। मिस्र से छुड़ाया गया समाज अब स्वयं छुड़ानेवाला समाज बने, यही पूरा तर्क है: "तू भी मिस्र देश में दास था, और तेरे परमेश्वर यहोवा ने तुझे छुड़ा लिया; इस कारण मैं आज तुझे यह आज्ञा सुनाता हूँ।" अनुग्रह पहले आता है, आज्ञा उसका आकार है। ध्यान दीजिए कि व्यवस्था केवल हाथ को नहीं, हृदय को छूती है: लेन-देन की गणना करते हुए मन में जो "अधर्मी चिन्ता" जन्म लेती है, वह भी पाप ठहरती है। और दिया गया देश "भाग" है, जागीर नहीं; जब भूमि परमेश्वर की है, तो कर्ज़ का दावा कभी अन्तिम नहीं हो सकता। पवित्रता यहाँ मन्दिर से निकलकर खलिहान, मजदूरी और उधार की पर्ची तक फैल जाती है।
जोड़नेवाला सूत्र
इस अध्याय में एक ताल है जो पूरी बाइबल में सुनाई देती है: सात का चक्र, और सातवें पर छुटकारा। सृष्टि का विश्राम, भूमि का विश्राम, कर्ज़ का विश्राम, दास की स्वतंत्रता; सब एक ही लय के अलग-अलग स्वर हैं। परमेश्वर समय में ही एक दरवाज़ा काटकर रख देते हैं, ताकि कोई इंसान या परिवार सदा के लिये कर्ज़ और गुलामी में फँसा न रह जाए। जब यीशु मसीह नासरत की सभा में खड़े होकर "प्रभु के प्रसन्न रहने के वर्ष" का प्रचार करते हैं (लूका 4), तब वे कोई नई धारणा नहीं गढ़ रहे; वे इसी आज्ञा को अपने शरीर में उठाकर खड़े हो जाते हैं। और छिदे हुए कान का वह चिह्न, जो प्रेम के कारण स्वेच्छा से दासता चुनता है, मसीह की ओर संकेत करता है: वह जो स्वतंत्र थे और फिर भी दास का रूप लेकर हमारे घर में ठहर गए।
दर्पण
यह पाठ उस जगह उँगली रखता है जहाँ हम सबसे अधिक हिसाबी हो जाते हैं। वह रिश्तेदार जिसने पाँच साल पहले पैसे लिये और कभी लौटाए नहीं; वह कर्मचारी जिसे आपने नौटिस देकर विदा किया और सोचा, कानूनी रूप से जितना बनता था, दे दिया। व्यवस्था कहती है, खाली हाथ मत जाने देना। और इससे भी गहरी चोट यहाँ है: "तेरे मन में ऐसी अधर्मी चिन्ता न समाए।" परमेश्वर उस गणना को पाप कहते हैं जो अभी केवल सिर में चल रही है, जिसे कोई देख नहीं सकता, जिसमें हम तय करते हैं कि मदद करना इस वक्त घाटे का सौदा है। मुट्ठी बन्द होने से पहले हृदय कठोर होता है।
आज ही एक नाम लिखिए: वह व्यक्ति जिससे आपको कुछ मिलना बाकी है, पैसा या माफ़ी। उसे एक संदेश भेजिए और स्पष्ट शब्दों में लिख दीजिए कि यह हिसाब अब छोड़ दिया गया है।
प्रसंग
मूसा मोआब के मैदानों में खड़े हैं, यरदन पार करने से ठीक पहले, एक ऐसी पीढ़ी के सामने जिसने मिस्र की ईंटें नहीं ढोईं पर जिसके माता-पिता ने ढोई थीं। जिस समाज की बात हो रही है वह खेती पर जीता है: एक सूखा, एक बीमारी, एक टिड्डी दल, और परिवार कर्ज़ में डूब जाता है। उधार यहाँ व्यापारिक निवेश नहीं, जीवित रहने का साधन है। कर्ज़ न चुका पाने पर आदमी अपने ही भाई के यहाँ दास होकर बिक जाता था, यही उस समय की दिवालिया व्यवस्था थी। "फाटक के भीतर" का अर्थ है नगर का वह चौक जहाँ न्याय होता था और जहाँ सब देखते थे कि किसने किसे लौटाया। और भूमि? वह "भाग" है, यहोवा की ओर से मिला हिस्सा, इसलिए कोई भी बन्धक स्थायी नहीं हो सकता।
शास्त्र-संगति
यिर्मयाह 34 में यही आज्ञा टूटती हुई दिखाई देती है: यरूशलेम के घेराव के बीच लोग अपने दासों को छोड़ते हैं, और खतरा टलते ही उन्हें वापस पकड़ लेते हैं। परमेश्वर का क्रोध वहाँ किसी मूर्ति पर नहीं, इसी वचनभंग पर भड़कता है, जो दिखाता है कि यह अध्याय इस्राएल के लिये कितना केन्द्रीय था। दूसरी ओर, यीशु जब कहते हैं कि कंगाल तुम्हारे साथ सदा रहेंगे (मत्ती 26:11), तो वे पद 11 को ही उद्धृत कर रहे हैं, और उनके सुननेवाले जानते थे कि उस वाक्य का दूसरा आधा भाग क्या है: "अपना हाथ ढीला करके अवश्य दान देना।" वह कथन उदासीनता का बहाना नहीं, स्थायी ज़िम्मेदारी की याद है।
कठिन प्रश्न
पद 4 कहता है, "तेरे बीच कोई दरिद्र न रहेगा।" पद 11 कहता है, "तेरे देश में दरिद्र तो सदा पाए जाएँगे।" एक ही अध्याय, सात पदों की दूरी। इसे जल्दी से सुलझाने की इच्छा होती है, पर पाठ खुद दोनों को साथ खड़ा रहने देता है। पहला वचन उस समाज का चित्र है जो आज्ञा सुनता है; दूसरा उस समाज का यथार्थ है जो नहीं सुनेगा। परमेश्वर अपने लोगों से ऐसी दुनिया की माँग करते हैं जिसे वे जानते हैं कि वे पूरी नहीं करेंगे, और फिर भी माँग वापस नहीं लेते। यह निराशा नहीं, ईमानदारी है। गरीबी का बने रहना आज्ञा को रद्द नहीं करता, वह उसे रोज़ नया कर देता है, जब तक वह राज्य न आए जहाँ सातवाँ वर्ष कभी समाप्त नहीं होता।
मनन के प्रश्न
किस व्यक्ति या स्थिति के बारे में आपके मन में इस समय वही "अधर्मी चिन्ता" चल रही है, जो देने से पहले ही हिसाब लगा लेती है?
यदि आपका अपना छुटकारा ही आपके देने का कारण है, तो आपकी उदारता का पैमाना आपकी आमदनी है या वह अनुग्रह जो आपको मिला?
Deuteronomy में और गहराई से जानें
चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।
Shows how Moses' farewell sermons beat with love for God and his people.
Reads the covenant renewal with an eye for its ethics and its heart.
Deuteronomy: An Introduction and Commentary
A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.
Deuteronomy: Loving Obedience to a Loving God
Warm, pastoral exposition from a global perspective.
Faith.network earns a small commission on Kobo purchases made through these links, at no extra cost to you. It helps keep the studies free.
Deuteronomy 15 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
व्यवस्थाविवरण 15 का क्या अर्थ है?
व्यवस्थाविवरण 15 किस विषय में है?
व्यवस्थाविवरण 15 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
व्यवस्थाविवरण 15 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
व्यवस्थाविवरण 15 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Deuteronomy 15 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
चार आयत पहले परमेश्वर कहता है कि "तुम में कोई दरिद्र न रहेगा," और यहाँ कहता है कि दरिद्र देश में सदा बने रहेंगे। यह विरोध नहीं, आईना है। जहाँ हाथ खुले रहते हैं, वहाँ कोई खाली नहीं रहता। गरीबी इसलिए टिकी रहती है क्योंकि मुट्ठियाँ बंद रहती हैं। अभी जिसका नाम तेरे मन में आया, उसके लिए तेरा हाथ कितना खुला है?
पिता, आपकी आशीष ही मेरी कमी को भरती है। मुझे ऐसा जीवन दीजिए जिसमें देने के लिए कुछ बचा रहे, माँगने की मजबूरी नहीं। जहाँ कर्ज़ और डर मुझे बाँधते हैं, वहाँ आज़ाद कीजिए, और जो मेरे पास है उसे दूसरों के भले के लिए खुले हाथ से बाँटना सिखाइए।
तेरे बीच कोई दरिद्र न रहेगा," यह आज्ञा उस अध्याय में है जहाँ हर सातवें साल कर्ज़ माफ करने की बात हो रही है। यानी परमेश्वर की आशीष किसी एक की तिजोरी में जमा होने के लिए नहीं, बहने के लिए दी गई थी। तेरे हाथ में जो है, वह शायद किसी और की ज़रूरत का जवाब हो। मुट्ठी खोलने से डर क्यों लगता है?
अपनी गाय-बैलों के पहिलौठे से कुछ काम न लेना, और न अपनी भेड़-बकरियों के पहिलौठे का ऊन कतरना।" जो परमेश्वर का है, उससे थोड़ा सा लाभ भी नहीं लेना था। हम अक्सर पहले अपनी ज़रूरत निकालते हैं, फिर बचा हुआ उसे देते हैं। सोचो, तुम्हारे जीवन में क्या है जो सचमुच अलग रखा गया है, जिस पर तुमने अपना हाथ नहीं रखा?
इस अंश को किसी और स्तर पर देखें
शुरुआती, धर्मशास्त्री, या कोई अलग लंबाई? सेटिंग्स बदलें और अपना संस्करण बनाएँ।
अध्ययन टूल में खोलें
