व्यवस्थाविवरण 7
पाठ
मोआब के मैदानों में, यरदन पार करने से ठीक पहले, मूसा इस्राएल को एक ऐसा आदेश देते हैं जिसे पढ़ते हुए आज भी साँस अटकती है: कनान की सात जातियों को "पूरी रीति से नष्ट कर डालना; उनसे न वाचा बाँधना, और न उन पर दया करना।" कोई संधि नहीं, कोई विवाह-सम्बन्ध नहीं, और उनकी वेदियाँ, लाठें और मूर्तियाँ चूर-चूर कर देनी हैं। इसके तुरन्त बाद स्वर बदल जाता है और कोमल हो जाता है: इस्राएल इसलिए नहीं चुना गया कि वह बड़ा था, बल्कि इसलिए कि परमेश्वर ने उससे प्रेम किया और पूर्वजों से खाई शपथ को निभाया। अध्याय का अन्तिम भाग डर पर काम करता है, क्योंकि ये जातियाँ इस्राएल से अधिक हैं, और उत्तर मिस्र की स्मृति है: जो फ़िरौन के साथ हुआ, वही इनके साथ होगा, धीरे धीरे, पर निश्चित रूप से।
मूल बात
इस अध्याय का धड़कता हुआ केन्द्र वचन 7 और 8 हैं, और वे पूरे बाइबल-कथानक की नस पकड़ते हैं: चुनाव का कारण चुने गए व्यक्ति में नहीं है। "तुम तो सब देशों के लोगों से गिनती में थोड़े थे।" प्रेम का कारण प्रेम ही है, और वाचा का कारण पहले खाई गई शपथ। यही तर्क पौलुस कुरिन्थियों से कहते हैं, कि परमेश्वर ने जगत के निर्बलों को चुना ताकि कोई घमंड न कर सके; कनान की दहलीज़ पर रखा गया यह वाक्य सुसमाचार के कृपा-सिद्धान्त का पुराना रूप है। पर उसी साँस में यह पाठ कहता है कि कृपा निष्पक्ष सहिष्णुता नहीं है। जो परमेश्वर "हजार पीढ़ी तक" करुणा करते हैं, वे अपने बैरियों से "विलम्ब न" करेंगे। चुनाव एक सुरक्षित पद नहीं, एक माँग है: पवित्र प्रजा को वही घृणित वस्तु घर में नहीं लानी जो उसकी निष्ठा को खा जाएगी।
मुख्य सूत्र
ध्यान दीजिए कि आईआरवी ने वचन 1 के हाशिये पर प्रेरितों 13:19 रख दिया है, और यह संकेत सोने जैसा है। पिसिदिया के अन्ताकिया में पौलुस यहूदियों और अन्यजातियों से भरे आराधनालय में इस्राएल का इतिहास सुनाते हैं, और कहते हैं कि परमेश्वर ने कनान देश की सात जातियों का नाश करके वह देश उन्हें मीरास में दिया। उसी भाषण का अन्त इस घोषणा पर होता है कि इसी यीशु के द्वारा पापों की क्षमा का सन्देश अब अन्यजातियों तक पहुँच रहा है। वही हाथ जो कनानियों को निकालता था, अब कनानियों जैसे लोगों को भीतर बुला रहा है। व्यवस्थाविवरण 7 की दीवार नष्ट नहीं हुई, वह मसीह में स्थानान्तरित हो गई: अब सीमा जाति की नहीं, निष्ठा की है।
दर्पण
वचन 25 पर रुकिए, क्योंकि वहीं यह अध्याय आपके घर में घुसता है। मूर्ति जलाना आसान है; उस पर मढ़े सोने-चाँदी को छोड़ देना कठिन है। "उसका लालच करके न ले लेना।" इस्राएल ठीक यहीं गिरा, जब आकान ने यरीहो की लूट में से चाँदी और सोना अपने तम्बू के नीचे गाड़ लिया। हम भी मूर्ति का धर्म नहीं अपनाते, हम उसकी परत अपनाते हैं: उस दुनिया की चमक जिसकी नैतिकता हमें अस्वीकार्य है, पर जिसकी हैसियत, सुरक्षा और चाल-ढाल हमें चाहिए। आपके फ़ोन में, आपके बैंक-लक्ष्यों में, आपकी तुलना की आदत में वह मढ़ी हुई चाँदी कहाँ है? आज, अगले दस मिनट में, घर की या फ़ोन की एक ऐसी चीज़ उठाकर हटा दीजिए जिसके बारे में आप जानते हैं कि वह आपकी निष्ठा चाट रही है। बाहर निकालिए, अभी।
मुख्य पात्र
इस अध्याय का पात्र इस्राएल नहीं, यहोवा हैं, और उनका चित्र असुविधाजनक रूप से भावनात्मक है। वे गिनती नहीं देखते, वे "स्नेह" करते हैं (वचन 7)। वे शपथ याद रखते हैं, सदियों पुरानी, और उसे निभाने के लिए एक साम्राज्य को तोड़ देते हैं। वही परमेश्वर वचन 10 में बदला लेने वाले हैं, और वचन 21 में "महान और भययोग्य"। हमारे भीतर इन दोनों को अलग करने की इच्छा जागती है, कोमल परमेश्वर और कठोर परमेश्वर। पर पाठ उन्हें अलग नहीं करता: प्रेम जितना गहरा होगा, विश्वासघात पर प्रतिक्रिया उतनी ही तीव्र। यह उस पति का चेहरा है जो उदासीन नहीं हो सकता। परमेश्वर की पवित्रता उनके प्रेम का विपरीत नहीं, उसका तापमान है।
प्रश्न
"उन पर तरस की दृष्टि न करना" के साथ कोई ईमानदार पाठक सहज नहीं हो सकता, और उसे सहज होना भी नहीं चाहिए। मैं इसे मीठा नहीं करूँगा। पर बाइबल स्वयं इस आदेश को जटिल बनाती है: राहाब बच जाती है और मसीह की वंशावली में आ जाती है, गिबोनी छल से जीवित रहते हैं, मोआबी रूत इस्राएल की दादी बन जाती है। और वचन 22 स्वयं कहता है, "धीरे धीरे", जो तात्कालिक संहार की तस्वीर को ढीला कर देता है। उधर इसी पुस्तक के अन्त में वही दंड इस्राएल पर घोषित होता है, यानी यह जातिवाद नहीं था। फिर भी हिंसा हिंसा रहती है। मैं यहाँ रहस्य स्वीकार करता हूँ, और उस क्रूस की ओर देखता हूँ जहाँ परमेश्वर ने न्याय दूसरों पर नहीं, स्वयं पर उठा लिया।
श्रोता
जिन्होंने यह पहली बार सुना, वे विजेता नहीं थे। वे गिनती में थोड़े, बिना भूमि के, चालीस साल से तम्बुओं में रहने वाले लोग थे, जिनके सामने दीवारों वाले नगर थे। वचन 17 उनका असली भीतरी वाक्य पकड़ता है: "मैं उनको कैसे देश से निकाल सकूँगा?" यह विजय-उन्माद नहीं, भय है। और जब बाद की पीढ़ियाँ यही अध्याय देश के भीतर बैठकर पढ़ती थीं, तब सात जातियाँ लगभग मिट चुकी थीं, पर उनकी अशेरा-लाठें हर पहाड़ी पर खड़ी थीं। सुलैमान की विदेशी पत्नियों ने ठीक वही किया जिसकी चेतावनी वचन 4 देता है। उनके कानों में यह अध्याय युद्ध-नीति से ज़्यादा घरेलू प्रश्न था: किसके साथ खाओगे, किससे ब्याह करोगे, किसके देवता की चाँदी घर लाओगे।
चिंतन
वचन 7 कहता है कि चुनाव का कारण आपकी योग्यता नहीं; आप अपने जीवन में किस जगह अब भी परमेश्वर के सामने अपनी "गिनती" पेश करते हैं?
आपके घर में कौन सी वस्तु, आदत या सम्बन्ध ऐसा है जिसकी मूर्ति आपने तोड़ दी, पर जिसका सोना आपने रख लिया?
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Deuteronomy 7 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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व्यवस्थाविवरण 7 का क्या अर्थ है?
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व्यवस्थाविवरण 7 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
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Deuteronomy 7 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
उनकी वेदियों को गिरा देना, उनके लाठों को तोड़ डालना... और उनकी खुदी हुई मूरतों को आग में जला देना।" चार काम, और किसी में आधा छोड़ने की गुंजाइश नहीं। परमेश्वर जानता है कि जो चीज़ खड़ी रह जाती है, वह एक दिन फिर पूजी जाती है। तेरे मन में भी कुछ है जिसे तूने तोड़ा तो है, पर जलाया नहीं? उसी राख को तू फिर जोड़ लेगा।
पिता, तूने मुझे अपना कहकर चुना, यह सोचकर मन भर आता है। जब मैं खुद को छोटा और बेकार समझता हूँ, तब याद दिला कि तेरी नज़र में मैं तेरी अपनी निज संपत्ति हूँ। मुझे ऐसे जीने दे कि यह पहचान मेरे हर कदम में दिखे।
तो भी उनसे न डरना, वरन् जो कुछ तेरे परमेश्वर यहोवा ने फ़िरौन से और सारे मिस्रियों से किया है वह तुझे स्मरण रहे।" डर का इलाज यहाँ कोई नया चमत्कार नहीं, बल्कि पुरानी याद है। इस्राएल के सामने बड़ी जातियाँ थीं, और परमेश्वर कहता है, पीछे मुड़कर देख। तू भी सोच, जिसने तुझे पिछली बार निकाला था, क्या वह आज कमज़ोर हो गया?
सात जातियों को, जो तुझ से बड़ी और सामर्थी हैं" (व्यवस्थाविवरण 7:1)। ध्यान दे, परमेश्वर ने वादे की भूमि को खाली नहीं छोड़ा था। जिस जगह वह तुझे ले जा रहा है, वहाँ तुझसे बड़े लोग पहले से बैठे हैं। पर देख, निकालने का काम तेरे हाथ में नहीं, उसके हाथ में है। तू छोटा है, यह कोई बाधा नहीं, यही तो उसकी सामर्थ्य दिखने की जगह है।
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