बाइबल व्याख्या

रोमियों 12:1

बाइबल
यह वचन Kingdom Grace Fellowship द्वारा समर्पित है· KGF-INDIA

पाठ

पौलुस गिड़गिड़ाता है, आदेश नहीं देता। ग्यारह अध्यायों तक परमेश्वर की दया का वर्णन करने के बाद वह कहता है: "इसलिए हे भाइयों, मैं तुम से परमेश्वर की दया स्मरण दिलाकर विनती करता हूँ।" और विनती क्या है? यह कि तुम अपने शरीर, अपनी हड्डियाँ और हाथ और थकी हुई पीठ, वेदी पर रख दो। पर एक अजीब वेदी पर, क्योंकि यह बलिदान मरता नहीं: "जीवित, और पवित्र, और परमेश्वर को भावता हुआ बलिदान।" मन्दिर में जानवर कटकर चढ़ता था; यहाँ मनुष्य साँस लेते हुए चढ़ता है। और पौलुस इसी को, धूप और भजन को नहीं, "तुम्हारी आत्मिक सेवा" कहता है।

मूल बात

ध्यान दीजिए कि आधार क्या है: दया, माँग नहीं। पौलुस पहले कुछ नहीं माँगता, वह याद दिलाता है। परमेश्वर ने पहले दिया, और अब जो उत्तर आता है वह चुकौती नहीं, उत्तर है। यही सुसमाचार का व्याकरण है: अनुग्रह पहले, समर्पण बाद में, कभी उल्टा नहीं।

और समर्पण किसका? शरीर का। आत्मा का नहीं, भावनाओं का नहीं, रविवार के एक घंटे का नहीं। जिस संसार में पौलुस लिख रहा था, वहाँ बहुतों को लगता था कि शरीर एक बोझ है जिससे आत्मा को छुटकारा चाहिए। पौलुस उसी शरीर को उठाकर वेदी पर रख देता है और कहता है: परमेश्वर यही चाहते हैं। जो आप खाते हैं, जहाँ आपके पैर जाते हैं, जिसे आपके हाथ छूते हैं, आपकी नींद, आपका काम, आपकी कामवासना, आपका पैसा कमाने वाला शरीर। उपासना रसोई और दफ़्तर तक फैल जाती है, वरना वह उपासना नहीं।

जोड़ने वाला सूत्र

वेदी की भाषा संयोग से नहीं आई। लैव्यव्यवस्था में बलिदान का पूरा तर्क यही था: पशु मरता है ताकि उपासक जीता रहे। पौलुस उस तस्वीर को उलट नहीं देता, वह उसे पूरा करता है। मसीह एक बार मरे, और अब उपासक वेदी पर जीवित चढ़ता है। यही वह "दया" है जिसकी याद पौलुस दिला रहा है: ग्यारह अध्यायों में उसने दिखाया कि परमेश्वर ने अधर्मी को धर्मी ठहराया, यहूदी और अन्यजाति दोनों को एक ही करुणा के नीचे समेटा। इस्राएल को कहा गया था कि वह याजकों का राज्य हो; अब वह बुलाहट उन साधारण रोमी विश्वासियों तक पहुँचती है जिनमें कई दास थे, जिनके शरीर पर कानूनन किसी और का हक़ था। उन्हीं शरीरों को पौलुस परमेश्वर की वेदी पर रखने को कहता है।

दर्पण

तो सवाल यह नहीं रहता कि आप परमेश्वर के बारे में क्या मानते हैं, बल्कि यह कि आपका शरीर कल सुबह सात बजे क्या करेगा। आप प्रार्थना में बहुत कुछ सौंप देते हैं, पर अपना कैलेंडर नहीं सौंपते। अपनी थकान किसी को नहीं दिखाते क्योंकि दिखाना कमज़ोरी लगती है। अपने शरीर से या तो शर्मिंदा रहते हैं, आईने के सामने उसकी शिकायत करते हैं, या चुपचाप उस पर गर्व करते हैं और उसे ही अपनी पहचान बना बैठे हैं। रात को फ़ोन की नीली रोशनी में जो आप देखते हैं, दफ़्तर में जिस तरह आप अपने अधीनस्थ से बात करते हैं, घर में पत्नी या पति के शरीर को जिस नज़र से छूते हैं, पौलुस कह रहा है कि उपासना वहीं होती है या बिल्कुल नहीं होती। और जीवित बलिदान की दिक्कत यही है: वह वेदी से रेंगकर उतर आता है, रोज़।

आज रात सोने से पहले खड़े होकर, हथेलियाँ खोलकर, अपने शरीर के उस एक हिस्से का नाम ज़ोर से लीजिए जिस पर आपको सबसे ज़्यादा शर्म या सबसे ज़्यादा घमंड है, और कहिए: "यह जीवित बलिदान है, यह आपका है।"

एक बारीकी

जिसे अनुवाद में "आत्मिक सेवा" कहा गया है, उसके पीछे यूनानी शब्द है लात्रेइया, और यह मन्दिर का शब्द है। याजक जो करता था, वही लात्रेइया है: वेदी की सेवा, चढ़ावे का काम। पौलुस यह शब्द जानबूझकर चुनता है। साथ जुड़ा विशेषण ऐसा है जिसका अर्थ है "समझ के अनुरूप", यानी जो तर्कसंगत है, जो दया को देखने के बाद एकमात्र समझदार प्रतिक्रिया है। दोनों मिलकर एक धक्का देते हैं: आपका रोज़मर्रा का शरीर मन्दिर की सेवा है, और इसे चढ़ाना कोई धार्मिक अतिवाद नहीं, बल्कि हिसाब-किताब की सबसे सीधी बात है। अगर वह दया सच है, तो यह जवाब सामान्य बुद्धि है।

शास्त्र की गूँज

रोमियों 6 में पौलुस पहले ही कह चुका है कि अपने अंगों को पाप के हथियार बनाकर मत सौंपो, बल्कि परमेश्वर को सौंप दो। बारहवाँ अध्याय उसी बात को विनती में बदल देता है: जो सिद्धांत था, वह अब घुटने टेककर माँगी गई चीज़ है। और अगली आयत बताती है कि यह बलिदान स्थिर नहीं, चलता रहता है: "और इस संसार के सदृश्य न बनो; परन्तु तुम्हारी बुद्धि के नये हो जाने से तुम्हारा चाल-चलन भी बदलता जाए।" समर्पण एक पल की घटना नहीं, एक दिशा है। कुरिन्थुस की कलीसिया को वह याद दिलाएगा कि शरीर पवित्र आत्मा का मन्दिर है; यहाँ वह एक कदम और जाता है, शरीर मन्दिर भी है और चढ़ावा भी।

मुख्य पात्र

इस आयत का केंद्र वह परमेश्वर हैं जिन्हें मनुष्य का शरीर "भावता" है। यह छोटा शब्द नहीं। वे किसी निराकार श्रद्धा से संतुष्ट नहीं होते, और न ही मरे हुए, कुचले हुए समर्पण से। उन्हें जीवित चीज़ चाहिए, साँस लेती हुई, नाम वाली, पसीने वाली। और ध्यान दीजिए कि वे माँगते नहीं, वे पहले दया दिखाते हैं और फिर अपने प्रेरित के मुँह से विनती करते हैं। यह वह परमेश्वर हैं जिनके पास अधिकार पूरा है पर जो ज़बरदस्ती नहीं करते, जो गिड़गिड़ाना अपनी गरिमा के नीचे नहीं समझते। जिसने मसीह में अपने आपको नहीं रोका, वह अब आपसे आपका रोज़ का शरीर माँगता है, और उसे पाकर प्रसन्न होता है।

मनन के प्रश्न

आपके शरीर का कौन सा काम, जो आप रोज़ करते हैं, आपने कभी उपासना नहीं समझा, और उसे उपासना मानने से क्या बदलेगा?

अगर "परमेश्वर की दया" आपके लिए सिर्फ़ एक सही सिद्धांत है और स्मरण नहीं, तो इस आयत की विनती बोझ लगेगी। आप पिछली बार कब उस दया को ठोस रूप में याद कर पाए थे?

Romans में और गहराई से जानें

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Romans: An Introduction and Commentary

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Romans 12:1 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

रोमियों 12:1 का क्या अर्थ है?
पौलुस गिड़गिड़ाता है, आदेश नहीं देता। ग्यारह अध्यायों तक परमेश्वर की दया का वर्णन करने के बाद वह कहता है: "इसलिए हे भाइयों, मैं तुम से परमेश्वर की दया स्मरण दिलाकर विनती करता हूँ।" और विनती क्या है? यह कि तुम अपने शरीर, अपनी हड्डियाँ और हाथ और थकी हुई पीठ, वेदी पर रख दो। पर एक अजीब वेदी पर, क्योंकि यह बलिदान मरता नहीं: "जीवित, और पवित्र, और परमेश्वर को भावता हुआ बलिदान।" मन्दिर में जानवर कटकर चढ़ता था; यहाँ मनुष्य साँस लेते हुए चढ़ता है। और पौलुस इसी को, धूप और भजन को नहीं, "तुम्हारी आत्मिक सेवा" कहता है।
रोमियों 12:1 किस विषय में है?
और समर्पण किसका? शरीर का। आत्मा का नहीं, भावनाओं का नहीं, रविवार के एक घंटे का नहीं। जिस संसार में पौलुस लिख रहा था, वहाँ बहुतों को लगता था कि शरीर एक बोझ है जिससे आत्मा को छुटकारा चाहिए। पौलुस उसी शरीर को उठाकर वेदी पर रख देता है और कहता है: परमेश्वर यही चाहते हैं। जो आप खाते हैं, जहाँ आपके पैर जाते हैं, जिसे आपके हाथ छूते हैं, आपकी नींद, आपका काम, आपकी कामवासना, आपका पैसा कमाने वाला शरीर। उपासना रसोई और दफ़्तर तक फैल जाती है, वरना वह उपासना नहीं।
रोमियों 12:1 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
तो सवाल यह नहीं रहता कि आप परमेश्वर के बारे में क्या मानते हैं, बल्कि यह कि आपका शरीर कल सुबह सात बजे क्या करेगा। आप प्रार्थना में बहुत कुछ सौंप देते हैं, पर अपना कैलेंडर नहीं सौंपते। अपनी थकान किसी को नहीं दिखाते क्योंकि दिखाना कमज़ोरी लगती है। अपने शरीर से या तो शर्मिंदा रहते हैं, आईने के सामने उसकी शिकायत करते हैं, या चुपचाप उस पर गर्व करते हैं और उसे ही अपनी पहचान बना बैठे हैं। रात को फ़ोन की नीली रोशनी में जो आप देखते हैं, दफ़्तर में जिस तरह आप अपने अधीनस्थ से बात करते हैं, घर में पत्नी या पति के शरीर को जिस नज़र से छूते हैं, पौलुस कह रहा है कि उपासना वहीं होती है या बिल्कुल नहीं होती। और जीवित बलिदान की दिक्कत यही है: वह वेदी से रेंगकर उतर आता है, रोज़।
रोमियों 12:1 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
जिसे अनुवाद में "आत्मिक सेवा" कहा गया है, उसके पीछे यूनानी शब्द है लात्रेइया, और यह मन्दिर का शब्द है। याजक जो करता था, वही लात्रेइया है: वेदी की सेवा, चढ़ावे का काम। पौलुस यह शब्द जानबूझकर चुनता है। साथ जुड़ा विशेषण ऐसा है जिसका अर्थ है "समझ के अनुरूप", यानी जो तर्कसंगत है, जो दया को देखने के बाद एकमात्र समझदार प्रतिक्रिया है। दोनों मिलकर एक धक्का देते हैं: आपका रोज़मर्रा का शरीर मन्दिर की सेवा है, और इसे चढ़ाना कोई धार्मिक अतिवाद नहीं, बल्कि हिसाब-किताब की सबसे सीधी बात है। अगर वह दया सच है, तो यह जवाब सामान्य बुद्धि है।
रोमियों 12:1 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
इस आयत का केंद्र वह परमेश्वर हैं जिन्हें मनुष्य का शरीर "भावता" है। यह छोटा शब्द नहीं। वे किसी निराकार श्रद्धा से संतुष्ट नहीं होते, और न ही मरे हुए, कुचले हुए समर्पण से। उन्हें जीवित चीज़ चाहिए, साँस लेती हुई, नाम वाली, पसीने वाली। और ध्यान दीजिए कि वे माँगते नहीं, वे पहले दया दिखाते हैं और फिर अपने प्रेरित के मुँह से विनती करते हैं। यह वह परमेश्वर हैं जिनके पास अधिकार पूरा है पर जो ज़बरदस्ती नहीं करते, जो गिड़गिड़ाना अपनी गरिमा के नीचे नहीं समझते। जिसने मसीह में अपने आपको नहीं रोका, वह अब आपसे आपका रोज़ का शरीर माँगता है, और उसे पाकर प्रसन्न होता है।
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Romans 12 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

धन्यवाद संपादकीय पर पद 17

पिता, धन्यवाद कि आपने हमें बदला लेने के बोझ से छुड़ाया। आपका वचन सिखाता है, "बुराई के बदले किसी से बुराई न करो," और यही हमारे मन की शांति बनता है। धन्यवाद कि आप हमें वह करने की शक्ति देते हैं जो सब लोगों के सामने भला है।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 3

पिता, मुझे अपने बारे में सच्ची समझ दे। न इतना बड़ा समझूँ कि दूसरों को छोटा कर दूँ, न इतना कम कि तेरा दिया हुआ भूल जाऊँ। जो विश्वास तूने मुझे सौंपा है, उसी नाप से चलना सिखा, संयम और नम्रता के साथ।

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